रामटहल जितायेंगे, रामटहल ही हरायेंगे, संजय सेठ PM मोदी के सहारे तो सुबोध भगवान व जनता के भरोसे

6 मई को रांची में मतदान है, भाजपा के संजय सेठ और कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय में यहां जबर्दस्त भिड़ंत है। पिछले कई वर्षों से भाजपा के टिकट पर रांची का प्रतिनिधित्व कर चुके निर्वतमान सांसद रामटहल चौधरी ने हालांकि त्रिकोणात्मक संघर्ष करने की कोशिश की हैं लेकिन अगर आप जनता से पूछे कि यहां किसका किसके साथ भिड़ंत हैं, तो वे दो का ही नाम लेंगे, भाजपा के संजय सेठ और दूसरे में कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व गृह मंत्री सुबोधकांत सहाय का।

6 मई को रांची में मतदान है, भाजपा के संजय सेठ और कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय में यहां जबर्दस्त भिड़ंत है। पिछले कई वर्षों से भाजपा के टिकट पर रांची का प्रतिनिधित्व कर चुके निर्वतमान सांसद रामटहल चौधरी ने हालांकि त्रिकोणात्मक संघर्ष करने की कोशिश की हैं लेकिन अगर आप जनता से पूछे कि यहां किसका किसके साथ भिड़ंत हैं, तो वे दो का ही नाम लेंगे, भाजपा के संजय सेठ और दूसरे में कांग्रेस के प्रत्याशी पूर्व गृह मंत्री सुबोधकांत सहाय का।

राजनैतिक पंडितों की मानें तो निवर्तमान सांसद राम टहल चौधरी ने भाजपा नेताओं की धड़कन बढ़ा दी हैं, क्योंकि वे जो भी वोट लायेंगे, वो भाजपा का ही होगा। सूत्र बताते है कि राम टहल चौधरी का अपने समुदाय में अच्छा खासा वर्चस्व हैं, अगर उन्होंने वोट काटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा दी, तो भाजपा को दिक्कत हो सकती है और सुबोधकांत सहाय के लिए यहीं चीज फायदे का हो जायेगा।

कुछ राजनीतिक पंडित यह भी कहते है कि चूंकि इस बार कुर्मी समुदाय के कुछ नेताओं का वर्चस्व महागठबंधन में बढ़ा है, और चूंकि महागठबंधन ने सुबोधकांत सहाय को समर्थन दे रखा है, तो सिल्ली जैसे इलाकों में जहां झामुमो का वर्चस्व अधिक है, वहां से सुबोधकांत सहाय को अच्छा खासा समर्थन मिल सकता है, क्योंकि इन इलाकों में आजसू का वर्चस्व अब उतना नहीं रहा, जिसका फायदा भाजपा को मिल सकता था।

इधर राम टहल चौधरी ने अपनी ओर से खूब मेहनत कर रखी है, हालांकि कुछ इलाकों में उनका जबर्दस्त विरोध भी हुआ, पर वे इन सबसे दूर, अपने इलाके में जहां उनके चाहनेवालों की संख्या अधिक हैं, उन्होंने अपना दिमाग लगा दिया है, और वे उन इलाकों से अच्छा खासा वोट प्राप्त कर सकते हैं, जो वोट कभी भाजपा का हुआ करता था और अगर राम टहल चौधरी का अपने इलाके में जादू नहीं चला तो यहीं स्थिति भाजपा के लिए फायदेमंद भी हो सकती है।

राजनैतिक पंडितों की मानें तो कांके में जनता द्वारा जबर्दस्त विरोध मुख्यमंत्री रघुवर दास का भी हुआ था, जब वे संजय सेठ के लिए वोट मांगने के लिए रोड शो कर रहे थे, ऐसे भी रांची जैसे इलाके में मुख्यमंत्री रघुवर दास का वो इमेज नहीं हैं, जो इमेज भाजपा में ही अर्जुन मुंडा का है। लोग कहते है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास और अर्जुन मुंडा के इमेज में सबसे बड़ा भारी अंतर यह है कि अर्जुन मुंडा भाजपा कार्यकर्ताओं के दिलों में राज करते है, जबकि रघुवर दास के लिए ऐसा नहीं है, वे जब जैसा, तब तैसा का व्यवहार करते हैं।

अगर रांची के शहरी मतदाताओं की बात करें, तो वह साफ कहता है कि वो न तो मुख्यमंत्री रघुवर दास का चेहरा देखकर भाजपा को वोट करेगा और न ही उनके द्वारा किये जा रहे तथाकथित विकासात्मक कार्य को देखकर वोट करेगा, क्योंकि रघुवर दास के द्वारा रांची के मतदाताओं को निराशा ही हाथ लगी है, न तो यहां कोई ढंग की सड़क हैं, न बिजली है, न पानी है, न ये शहर लगता है कि राजधानी है।

ये तो पीएम मोदी हैं, जिनको देखकर हमलोग इस बार भाजपा को वोट करेंगे, नहीं तो सीएम रघुवर दास जैसे लोगों के लिए तो यहां सब के दरवाजे बंद हैं। लोग तो साफ कहते है कि विधानसभा का चुनाव आने दीजिये, बाहर का रास्ता नहीं दिखा दिया रघुवर दास को, तो हम रांची के मतदाता नहीं।

उधर शहर से सटे ग्रामीण इलाकों, मुस्लिम बहुल इलाकों, इसाई बहुल इलाकों, आदिवासी समुदाय तथा कायस्थ समुदायों और सीएम रघुवर से नाराज चल रहे मतदाताओं में सुबोधकांत सहाय की लोकप्रियता बढ़ी हैं। दूसरी ओर महागठबंधन में शामिल झामुमो, झाविमो, राजद और विभिन्न जनसंगठनों द्वारा समर्थन का घोषणा कर दिये जाने से भी सुबोधकांत सहाय का पलड़ा भारी दिख रहा है।

हालांकि सच्चाई यह भी है कि सुबोधकांत सहाय को न तो कांग्रेस के राष्ट्रीय स्तर के नेताओं और न ही राजकीय स्तर पर किसी ने पॉलिटिकल मदद की, सुबोधकांत सहाय ने अपने बल पर स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ताओं, जनसंगठनों से जुड़े नेताओं/कार्यकर्ताओं  तथा आम जनता तथा भगवान भरोसे अपनी  राजनीतिक ताकत दिखाने की कोशिश की, जिसका परिणाम दिख भी रहा है।

कुल मिलाकर देखें, भाजपा के संजय सेठ और कांग्रेस के सुबोधकांत सहाय दोनों आमने-सामने हैं, कल रांची की जनता अपने मतदान का प्रयोग करने के लिए अभी से उतावली है, कोई मोदी के नाम पर वोट करेगा तो कोई बदलाव के नाम पर वोट करेगा, पर वोटों की प्रतिशतता लगता है कि यहां बढ़ेगी, क्योंकि जिस प्रकार से आम जनता में उत्सुकता है, वो बता रही है कि अभी नहीं तो कभी नहीं, कल का रांची का चुनाव भाजपा के विधानसभा का लिटमस पत्र का भी काम करेगा, जिसकी वो जांच 23 मई को करेगी।

पर इतना तय है कि जनता ने मन बना लिया है, किसे दिल्ली इस बार पहुंचाना है और इसका पता कल 11 बजे तक के मतदान के रुझान से ही पता चल जायेगा, तब तक के लिए वोटिंग पर ध्यान दीजिये, और एक सफल मतदाता बनने का संकल्प पूरा करें, हालांकि जिला प्रशासन ने सेल्फी खिंचवा-खिंचवा कर मतदाता पर्ची बंटवाने के काम का ढिंढोरा पिटवा दिया, पर अभी भी कई इलाके हैं, जहां मतदाता पर्ची बंटी ही नहीं, पर जिस प्रकार से मतदाता जागरुक है, वो बता रहा है, कि इसका भी प्रभाव कल नहीं पड़ेगा।

Krishna Bihari Mishra

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