एनडीटीवी, शानदार पत्रकारिता के लिए तुम्हारा अभिनन्दन

क्या है पत्रकारिता, क्या पत्रकारिता नेताओं के बयान के आगे नतमस्तक होने का नाम है? क्या पत्रकारिता बेवजह के हिन्दू-मुस्लिम डिबेट कराने का नाम है? क्या पत्रकारिता नेताओं के गोद में बैठकर, उनके दाढ़ी के बाल गिनने का नाम है?

क्या है पत्रकारिता, क्या पत्रकारिता नेताओं के बयान के आगे नतमस्तक होने का नाम है? क्या पत्रकारिता बेवजह के हिन्दू-मुस्लिम डिबेट कराने का नाम है? क्या पत्रकारिता नेताओं के गोद में बैठकर, उनके दाढ़ी के बाल गिनने का नाम है? क्या पत्रकारिता नेताओं के चरणवंदन कर राज्यसभा की सीट स्वयं के लिए सुरक्षित करने का नाम है? या उन असंख्य लोगों के आंखों से आंसू पोछने का नाम है, जो विभिन्न समस्याओं से जूझ रहे हैं या संघर्ष कर रहे हैं।

आज जिस चैनल को खोलिये तो वह चैनल नेताओं के चरणवंदन, हिन्दू-मुस्लिम डिबेट, चिल्लानेवाले एंकरों और चिल्लानेवाले नेताओं का वार्ता प्रसारित करता हुआ दिखेगा, कुछ चैनल तो लगता है कि जनता को डराने के लिए ही पैदा लिये हैं, बेसिर-पैर के समाचार-डिबेट तो यहां रोज देखने को मिलेंगे, पर आम जनता जिन समस्याओं से जूझ रही हैं, वह यहां देखने को नहीं मिलेगा, पर खुशी इस बात की है कि एनडीटीवी ने भारतीय दर्शकों के बीच कुछ नया करने का प्रयास किया है, जिसका लाभ भारतीय जनता को मिल रहा है।

पिछले कुछ दिनों से मुझे एनडीटीवी का प्राइम टाइम, जो रात्रि के नौ बजे प्रसारित होता है, देख रहा हूं। ऐसे तो रवीश कुमार का जवाब नहीं, भारत के टॉप समाचार प्रस्तुत करनेवालों में से प्रथम स्थान पर है, चाहे उन्हें कोई कितना भी गालियों से क्यों न नवाज दें? इसे तो स्वीकार करना ही पड़ेगा। इन दिनों वे प्रतिदिन युवाओं की मनोदशा तथा रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे युवाओं की समस्याओं को लेकर प्राइम टाइम प्रसारित कर रहे हैं।

हम आपको बता दे कि आज तक किसी ने भी युवाओं की बेरोजगारी और उनकी नौकरी के लिए किये जा रहे संघर्ष पर ध्यान ही नहीं दिया था, जिसके कारण युवाओं में नाराजगी बढ़ती जा रही थी और युवाओं की यह नाराजगी चैनलों के प्रति भी था, पर इन दिनों एनडीटीवी के प्राइम टाइम में चल रही युवाओं की समस्याओं को लेकर प्रसारित समाचार युवाओं में एक नई शक्ति का संचार किया है।

युवाओं को लग रहा है कि अब उनकी बात सुनी जा रही है, स्थिति यह है कि ढेर सारे पत्रों व नई तकनीक के माध्यम से एनडीटीवी तक देश के युवा अपनी समस्याएं पहुंचा रहे हैं, और एक नये माहौल का जन्म हो रहा है। ये युवा अब एनडीटीवी देखते है, तथा बेकार की हिन्दू-मुस्लिम वाली डिबेटों से दूर हो रहे हैं, तथा अपनी नौकरी, अपने परिवार और समाज तथा देश को नये आइनों से देख रहे है।

जब रवीश कुमार कहते है कि चाहे अब जो हो जाये, यहां प्राइम टाइम में हिन्दू-मुस्लिम डिबेट नहीं चलेगा, जब चलेगा तो युवाओं की समस्याओं को लेकर ही समाचार चलेगा, उनकी परेशानी, उनकी समस्या, एनडीटीवी के प्राइम टाइम की प्राथमिकता होगी, तो युवाओं को रवीश कुमार के इस बातों पर भरोसा भी होता है।

कमाल की बात है, कि जो युवा देश के प्राण है, आत्मा है, उन्हीं की समस्याओं को यहां नजरंदाज किया जाता रहा और उनकी मूल समस्याओं पर किसी का ध्यान ही नहीं रहा, जबकि हर घर के प्रत्येक परिवार में युवा एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं। बहुत कम ही लोगों को पता था कि कि विभिन्न राज्यों के अंतर्गत चलनेवाले लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग तथा केन्द्र की कर्मचारी चयन आयोग, बैंकिंग सेवा, रेलवे तथा डाक सेवा में किस प्रकार की नौकरियां देने में धांधली बरती जा रही हैं, और इन धांधलियों के शिकार होकर हमारी युवा पीढ़ी किस प्रकार अपने भविष्य को संकट में डाल रही है।

खुशी इस बात की है कि अब एनडीटीवी के माध्यम से पूरा देश युवाओं की इन समस्याओं से अवगत ही नहीं, बल्कि युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को उत्सुक हो रहा है, इसमें कोई दो मत नहीं कि रेलवे ने जिस प्रकार ग्रुप डी की बहाली में धांधलियां शुरु की, पांच सौ रुपये फीस तथा आइटीआइ को इसमें जोड़ा था, उस पर अंकुश लगाने में एनडीटीवी की प्रमुख भूमिका रहीं।

सचमुच रवीश कुमार जी, मैं आपसे मिला नहीं हूं, और न मिलने की आवश्यकता समझता हूं, आप जहां है, बेहतर काम कर रहे हैं, बेहतर पत्रकारिता कर रहे हैं, इससे उन युवाओं को भी लाभ हो रहा हैं, जो इस पत्रकारिता क्षेत्र में आना चाहते है, वे आपसे जरुर सीख कर अपने जीवन को बेहतर बना रहे होंगे। आपका हृदय से आभार।

Krishna Bihari Mishra

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