मेरे अतिप्रिय मित्र अरुण श्रीवास्तव जिनकी आज पांचवीं पुण्यतिथि है…
अरुण श्रीवास्तव मेरे अतिप्रिय मित्र थे। आज ही के दिन वे सदा के लिए इस भू-लोक से प्रस्थान कर गये थे। जो लोग उन्हें जानते हैं। वे यह भी जानते हैं कि वे मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत थे। वे अपने सामने किसी को भी उदास देखना पसन्द नहीं करते थे। कोशिश करते थे कि उनके साथ जो भी जुड़ा है, वो हमेशा मुस्कुराता रहे। उनके चेहरे पर तो ऐसे भी हल्की मुस्कान सदैव विद्यमान रहती थी।
वे जब भी मुझे देखते, कहते सर चला जाये, बहुत हो गया काम, अब काम को दीजिये विश्राम, समर्पण का भाव हृदय में उमड़ता चला जा रहा है और इस प्रकार एक-दो व्यक्ति को और ले लेते और समर्पण हो जाता। काम के प्रति निष्ठा, किसी भी काम को समय से पूर्व संपन्न कर देने की कला, काम में कहीं भी कोई गलती न हो, यहां तक की कहीं बिंदी तक नहीं छूट जाये, ये सब अगर सीखना हो तो उनसे सीखा जा सकता था।
अपने दोस्तों के प्रति सुंदर भाव, उनके प्रति कुछ कर गुजरने का भाव, संकट में पड़े दोस्तों के लिए हद से गुजर जाना, उनकी सामान्य आदतों में थी। उन्हें आज तक किसी से ऊंची आवाज में बाते करते नहीं देखा। हालांकि उनकी सरलता का कई लोगों ने फायदा उठाया, पर वे जानते थे कि फलां व्यक्ति उनकी सरलता का फायदा उठा रहा है, उन्हें कष्ट पहुंचा रहा है, फिर भी ये सब देखकर, वे मुस्कुरा देते।
कई ऐसे लोग भी मैंने इस दौरान देखे, जिनको इन्होंने मुक्तकंठ से सहायता की। लेकिन जिसे उन्होंने सहायता की, उसने उन्हें धोखा दिया। हालांकि ये सब देखकर मुझे गुस्सा आता था। पर वे कहते, क्या करियेगा, ये भी एक जीवन का पार्ट है। कई अधिकारियों को इस दौरान हमने देखा कि वे भी उनकी सरलता का फायदा उठाएं तो जरुर पर जब उनकी ओर से इस सरलता का फल देने को कहा गया, तो उनमें से ज्यादा लोग मुकर गये, पर उन्हीं में से कुछ आज भी ऐसे अधिकारी है, जो अरुण श्रीवास्तव को भूले नहीं।
मैंने जब अरुण जी से कहा कि क्या मैं उनकी कुछ मदद करुं। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि नहीं, देखते हैं, सामनेवाला कितना मुझे कष्ट दे सकता हैं। ऐसे थे – अरुण श्रीवास्तव। मेरे जीवन में कई मित्र आये। परंतु मेरे जीवन में अगर मित्र के रुप में किसी ने प्रभाव डाला तो वे सिर्फ अरुण श्रीवास्तव थे। जब हम घर बना रहे थे, तो एक नेता के पास मैं कर्ज मांगने के लिए गया। उस नेता ने हामी तो भरी। लेकिन मदद नहीं की। मैंने अरुण श्रीवास्तव से कहा कि मुझे फिर से कर्ज चाहिए।
यहां ‘फिर से’ कर्ज शब्द का इसलिए उपयोग कर रहा हूं, क्योंकि मैंने उनसे पहले ही एक बड़ी राशि कर्ज के रुप में ले चुका था। उन्होंने कहा ठीक है मिल जायेगा। मैंने फिर उनसे कहा कि मैंने फलां नेता के पास कर्ज मांगने गया था। उसने कहा कि देंगे, पर नहीं दिया। अरुण जी ने कहा कि जिस नेता के पास गये थे, वहां आपको नहीं जाना चाहिए था। मैं हूं ना। मिल जायेगा। मैंने कहा कि मैं तो आपसे फिर से कर्ज मांगने इसलिए नहीं आ रहा था कि एक बड़ी राशि तो आप दे चुके थे।
फिर से मांगने की आपसे हिम्मत नहीं थी। उनका कहना था कि मित्रता में ये सब नहीं देखा जाता। उन्होंने जल्द ही अपने छोटे भाई के हाथों पैसे दिलवा दिये। आज भी जब मैं अपने घर को देखता हूं, तो उनका हमारे घर में दिया गया कंट्रीब्यूशन याद दिलाता है। मैं अपने बच्चों को भी कहा हूं कि वो कभी अरुण जी को नहीं भूलें, क्योंकि उन्होंने एक बहुत बड़ी राशि कर्ज के तौर पर दी थी। जो आजकल कोई नहीं दे सकता। हम सपरिवार अपने प्रिय मित्र अरुण श्रीवास्तव जी को हृदय से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। वे जहां भी रहे, प्रसन्न रहे। हम अपनी कृतज्ञता उन्हें ज्ञापित करते हैं।
