रांची में सहायक पुलिसकर्मियों का आंदोलन राजनीति का शिकार, विपक्ष-सत्तारुढ़ दल आमने-सामने

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कल जिन सहायक पुलिसकर्मियों की मोराबादी मैदान में पिटाई हुई थी। उस पर कल से राजनीति भी शुरु हो गई। राज्य की प्रमुख विपक्षी दलों के साथ-साथ सत्तारुढ़ दल इस मुद्दे को लेकर आमने-सामने है। सत्तापक्ष का साफ कहना है कि वो सहायक पुलिसकर्मियों की उचित व लोकतांत्रिक तरीके से मांगी जानेवाली हर मांगों को सहानुभूति पूर्वक विचार करने को तैयार है, पर कानून को हाथ में लेने की जो प्रवृत्ति हैं, उसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने इस मुद्दे पर भाजपा नेताओं द्वारा की जा रही राजनीति की भी कड़ी आलोचना की है।

आज बड़ी संख्या में भाजपा के विधायकों की एक टीम मोराबादी मैदान पहुंची और आंदोलनकारियों से बातचीत की। इन भाजपा विधायकों का कहना था कि वे सहायक पुलिसकर्मियों की मांगों से सहमत हैं, और वे इस मुद्दे पर सरकार को सदन में घेरेंगे, जबकि कांग्रेस एवं झामुमो का कहना है कि भाजपा विधायकों को पहले अपने पूर्व की सरकार के चरित्र का भी आकलन करना चाहिए। झामुमो का कहना है कि 15 नवम्बर को पारा टीचरों और उसी दिन समाचार संकलन कर रहे पत्रकारों के साथ रघुवर सरकार का क्या रवैया था, उसे जनता आज तक नहीं भूली है।

झामुमो ने कहा कि राज्य सरकार स्वयं सहायक पुलिसकर्मियों के आंदोलन को लेकर सजग थी, उनकी मांगों को हल करने के प्रयास में लगी थी, लेकिन भाजपाइयों ने सहायक पुलिसकर्मियों के आंदोलन को हवा दे दी, जिसकी परिणाम कल दिखाई पड़ा, जब सहायक पुलिसकर्मी आपे से बाहर हो गये और बैरिकेडिंग को तोड़ने का प्रयास कर दिया। जिसको लेकर पुलिस को लाठी चार्ज करनी पड़ी।

आज राज्य सरकार के एक मंत्री मिथिलेश ठाकुर भी सहायक पुलिसकर्मियों से मिलने के लिए मोराबादी मैदान पहुंचे तथा उनकी बातें सुनी। राजनीतिक पंडितों की मानें तो सहायक पुलिसकर्मियों के आंदोलन पर जल्द विराम लग सकता है, बशर्ते उनका आंदोलन राजनीति का शिकार न हो, अगर राजनीति का शिकार होता है, तो इसमें घाटा न तो सत्तापक्ष को हैं और न ही विपक्ष को, घाटा सहायक पुलिसकर्मियों को ही होगा, जो पिछले एक सप्ताह से अपनी मांगों को लेकर मोराबादी मैदान में डटे हैं।

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