मां, बच्चे और खिलौनेवाला

बहुत दिनों के बाद खिलौने बेचनेवाला, बहुत सारे गुब्बारों और उससे बने कई आकृतियों को लेकर अपने मुहल्ले में आया था। उसकी निगाहें सिर्फ और सिर्फ बच्चों को ढूंढ रही थी, क्योंकि उसका व्यापार बच्चों की चाहत पर ही तो टिका था। वह एक बांसुरी अपने होठों में लिए कुछ ध्वनि निकाल रहा था, संदेश साफ था कि बच्चे उसके बांसुरी से निकले ध्वनियों को सुने और घर के बाहर निकले।

बहुत दिनों के बाद खिलौने बेचनेवाला, बहुत सारे गुब्बारों और उससे बने कई आकृतियों को लेकर अपने मुहल्ले में आया था। उसकी निगाहें सिर्फ और सिर्फ बच्चों को ढूंढ रही थी, क्योंकि उसका व्यापार बच्चों की चाहत पर ही तो टिका था। वह एक बांसुरी अपने होठों में लिए कुछ ध्वनि निकाल रहा था, संदेश साफ था कि बच्चे उसके बांसुरी से निकले ध्वनियों को सुने और घर के बाहर निकले।

कई घरों में हमने देखा कि बांसुरी की आवाज सुनते ही बच्चों में खलबली मच गई। वे बाहर की ओर आने को मचलने लगे थे, जो छोटे थे, खुद निकल नहीं सकते थे, अपनी मां को तंग करने लगे, अंत में न चाहते हुए भी मां को बच्चों के लिए निकलना ही पड़ा और लीजिये बच्चों ने अपनी जिद के आगे मां से वो काम करवा लिये, जिसे मां नहीं चाहती थी।

मां के आंचल में पैसे नहीं थे, फिर भी वो चाहती थी कि बच्चों के उसकी पसन्द को दिलवा दी जाये,फिर वो घर में गई, अपने पति के पॉकेट टटोले, जरुरत के मुताबिक पैसे हाथों में आ गई, फिर क्या था, चेहरे पर मुस्कान आ गई, बच्चों को उनके मनोरंजन का सामान मिलने के आसार बढ़ गये। थोड़ा तोल-मोल हुआ, खिलौनेवाले ने एक गुड्डा निकालकर बच्चे की मां के हाथ में थमा दिया और छोटे से बच्चे के हाथ में जैसे ही मां ने पकड़ाया, मां और बच्चे की चेहरे की मुस्कान देखते बन रही थी। दोनों को लगा कि उन्हें दोनों जहान मिल गया।

मैं भी सोच रहा था कि अगर मेरे सामने मेरी पोती होती, तो मैं भी इस आनन्द के सागर में गोते लगा ही देता, क्योंकि आनन्द ही तो ईश्वर का दुसरा नाम है। इधर खिलौनेवाले ने दूसरी ओर देखना शुरु किया। नये-नये घर बन रहे थे, उसने सोचा कि इन घरों में अभी परिवार नहीं होंगे, फिर भी उसे क्या सुझा, उसने सोचा, जब यहां तक आ ही गये, तो थोड़ा और देख लेते हैं, क्या फर्क पड़ता है।

फिर उसने होठों पर बांसुरी रखी, मधुर धुन निकाले, देखा कि निर्माणाधीन घर से छोटे-छोटे कदमों को आगे की ओर बढ़ाते बच्चों का झूंड निकल गया,  उधर इन बच्चों की मां डांटते-डपटते बाहर निकली, उधर मत जाओ, गंदगी है, पांव में लग जायेगी, पर बाहर आकर बच्चों की अंगूलियां तो एक जगह आकर स्थिर हो गई थी।

मां ने देखा, बच्चे अंगूलियों के इशारे से कुछ बता रहे थे, मां ने समझ लिया, बच्चों को कुछ चाहिए, उसने तुरन्त खिलौनेवाले से उस मछली के दाम पूछे, खिलौनेवाले ने बीस रुपये दाम बताये। मां ने कहा कि क्या थोड़ा दाम कम नहीं हो सकता। खिलौनेवाले ने महंगाई की दुहाई दी, लीजिये बात बन गई, मां ने बीस रुपये थमाये, बच्चों को मछली मिल गई और बच्चे खिलानेवाले को बाय-बाय कहकर विदा किया, कहा – फिर आइयेगा, जब मछली पुरानी हो जायेगी तो हम नई मछली लेंगे। मां और खिलौनेवाले बच्चे की इन बातों को सुनकर आनन्दित हो उठे। खिलौनेवाला मुस्कुराते हुए, दूसरे मुहल्ले की ओर निकल गया।

Krishna Bihari Mishra

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क्या हम सही में अच्छे नागरिक हैं, हमें सरकार की गलतियों पर अंगूली उठाने का हक हैं?

Mon Oct 5 , 2020
जरा सोचियेगा, ये जरुरी भी है, हम हर बात में सरकार और नेताओं की गलतियां ढूंढ लेते हैं, उन्हें भला-बुरा कहने से नहीं चूकते, हर गलतियों के लिए उन्हें जवाबदेह ठहरा देते है, पर क्या हमने कभी सोचा कि क्या हमें सरकार की गलतियों पर अंगूली उठाने का हक है, वह भी तब जब हम खुद गलतियों को करने में कोई कसर नहीं छोड़ते? यह हम इसलिए कह रहे है कि अभी पूरा विश्व कोरोना के चपेट में हैं और उससे बचने के लिए तरह-तरह के नुस्खों पर अमल कर रहा है।

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