आधुनिक भारत के महान अवतार महावतार बाबाजी जो ईश्वरीय कार्य के लिए सहस्राब्दियों से आज भी जीवित हैं

आपको आश्चर्य होगा कि इस पृथ्वी पर और खासकर भारत के उत्तर में हिमालय में स्थित बद्रीनाथ की गुफाओं में पिछले सहस्राब्दियों से एक महामानव आज भी स्थूल शरीर के रुप में हमारे बीच विद्यमान है, जो महावतार बाबाजी के नाम से जाने जाते हैं। महावतार बाबाजी का सबसे पहला परिचय महान आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानन्द जी ने 1946 ई. कराया था, जब उन्होंने इसकी सबसे पहली चर्चा “ ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” में की।

आपको आश्चर्य होगा कि इस पृथ्वी पर और खासकर भारत के उत्तर में हिमालय में स्थित बद्रीनाथ की गुफाओं में पिछले सहस्राब्दियों से एक महामानव आज भी स्थूल शरीर के रुप में हमारे बीच विद्यमान है, जो महावतार बाबाजी के नाम से जाने जाते हैं। महावतार बाबाजी का सबसे पहला परिचय महान आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानन्द जी ने 1946 . कराया था, जब उन्होंने इसकी सबसे पहली चर्चा ऑटोबायोग्राफी ऑफ योगी में की।

आप इसका हिन्दी अनुवादयोगी कथामृत में भी पढ सकते हैं। योगी कथामृत में उन्होंने महावतार बाबाजी के बारे में जो भी कुछ संस्मरण लिखे हैं, वे अमिट है और अध्यात्म से जुड़े लोगों के बीच रोंगटे खड़े कर देते हैं, स्थिति ऐसी है कि योगी कथामृत में लिखे महावतार बाबाजी के संस्मरण को पढ़ते ही सामान्य मनुष्य दिव्य लोकों की सैर करने लगता है और स्वयं को आध्यात्मिक अनुभूति से अनुप्राणित करने लगता है।

आम तौर पर भारत में ज्यादातर संतों को बाबाजी ही कहकर बुलाया जाता है, पर ये बाबाजी वो बाबाजी नहीं। ये महावतार बाबाजी है, जो स्थूल शरीर या इस पृथ्वी से आबद्ध नहीं है, बल्कि ईश्वरीय इच्छा से वे इस पृथ्वी पर एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यरत है। परमहंस योगानन्द जी के अनुसार उनके गुरु  स्वामी युक्तेश्वर गिरि ने बाबाजी के बारे में कहा था कि बाबाजी की आध्यात्मिक अवस्था मानवी आकलन शक्ति से परे है। जैसे अवतारों पर सृष्टि के कोई नियम लागू नहीं होते, उनका शुद्ध शरीर प्रकाश की मूर्ति मात्र होता है, उस पर प्रकृति का कोई ऋण नहीं होता, यहीं बात महावतार बाबाजी पर भी लागू होता है।

योगी कथामृत में बताया गया है कि संन्यास आश्रम के पुनर्घटक एवं अद्वितीय तत्वज्ञानी जगदगुरु आदि शंकराचार्य, तथा सुप्रसिद्ध मध्ययुगीन संत कबीर को उन्होने योग की शिक्षा दी थी और बाद में 19वीं शताब्दी के उनके मुख्य शिष्य लाहिड़ी महाशय को यह क्रिया योग की दीक्षा मिली, जिन्होंने लुप्त क्रिया योग विद्या का पुनरुद्धार किया। महावतार बाबाजी के बारे में बताया जाता है कि वे जनसाधारण की स्थूल दृष्टि से ओझल रहते हैं और जब वे चाहे, अपनी इच्छानुसार अदृश्य होने की सामर्थ्य रखते हैं।

इन कारणों से तथा साधारणतया वे अपने शिष्यों को अपने विषय में गुप्तता रखने का आदेश देते है। महावतार बाबाजी के बारे में लाहिड़ी महाशय बताते है कि जब भी कोई श्रद्धा के साथ बाबाजी का नाम लेता है, उसे तत्क्षण आध्यात्मिक आशीर्वाद प्राप्त होता है। महावतार बाबाजी के बारे में बताया जाता है कि अगर कोई उनके परिवार या जन्मस्थान के बारे में पता लगाना चाहे, तो उसे निराशा ही हाथ लगेगा, वे विश्व की तमाम भाषाओं में बात करने का सामर्थ्य रखते है, पर ज्यादातर वे हिन्दी बोलना पसन्द करते है

जिन्होंने महावतार बाबाजी को देखा, उनका कहना है कि वे दिखने में 25 वर्ष के युवक जैसे दिखते है, उनका गौरवर्ण, मध्यम कद काठी, काले नेत्र तथा शांत प्रकृति के हैं। परमहंस योगानन्द के अनुसार उनके संस्कृत शिक्षक स्वामी केवलानन्द जी ने हिमालय में बाबाजी के साथ कुछ समय बिताया था। केवलानन्दजी ने परमहंस योगानन्दजी को बताया था कि महावतार बाबा जी एक स्थान पर नहीं बैठते, वे सामान्य लोगों की तरह पैदल चलते रहते है, इस दौरान उनके साथ एक छोटी सी शिष्य मंडली भी रहती है, जिसमें विदेशी भी शामिल है

केवलानन्द जी ने परमहंस योगानन्दजी को बताया था कि जब वे किसी स्थान को छोड़ते तो अपने शिष्यों को कहते कि डेरा डण्डा उठाओ और इसका आशय होता कि अब यहां से निकल कर दूसरी जगह चल देना है। ऐसे तो महावतार बाबाजी के बारे में योगी कथामृत में बहुत सारी बाते लिखी है, जो एक से बढ़कर एक है, जिनकी कथाओं में डूबते चले जायेंगे, पर केवलानन्द जी द्वारा परमहंस योगानन्द जी को बताई एक घटना यहा उद्धृत करना जरुरी समझता हूं।

एक बार महावतार बाबाजी अपने शिष्यों के साथ कही बैठे थे, तभी एक अपरिचित का आगमन हुआ, उसने कहा कि मैं जान चुका हूं कि आप महावतार बाबाजी है, आप से अनुरोध है कि मुझे आप शिष्य के रुप में स्वीकार करें। महावतार बाबाजी ने उसके इस अनुरोध का कोई जवाब नहीं दिया, तभी उस अपरिचित ने कहा कि अगर आप मुझे शिष्य के रुप में नहीं स्वीकार करेंगे, तो मैं इस पर्वत से कूद कर जान दे दूंगा। महावतार बाबाजी ने कहातो कूद पड़ो। फिर क्या था, अपरिचित ने छलांग लगा दी।

बाबाजी ने अपने शिष्यों को उक्त अपरिचित का शरीर लाने का आदेश दिया। अपरिचित का शरीर महावतार बाबाजी के पास लाया गया और फिर महावतार बाबाजी ने उसे जीवित कर दिया, जीवित होते ही अपरिचित महावतार बाबाजी के चरणों में लोट गया। बाबाजी ने तब उस अपरिचित को मुस्कुराते हुए कहा था कि अब तुम शिष्य बनने के अधिकारी हो गये हो। इसके साथ ही वह अपरिचित महावतार बाबाजी की मंडली में भी शामिल हो गया।

महावतार बाबाजी की खासियत है कि उन्हें प्रारम्भ से ही अपने जीवन की सभी अवस्थाओं का पूर्ण ज्ञान है, बाबाजी के लिए भूत, वर्तमान या भविष्य का पता लगाना कोई सामान्य बात नहीं। जिन लाहिड़ी महाशय को उन्होंने क्रिया योग की दीक्षा दी थी, उन्होने अपने योग बल के द्वारा ही लाहिड़ी महाशय को दानापुर से रानीखेत स्थानान्तरण करवा दिया था, जहां रानीखेत पहुंचते ही महावतार बाबाजी ने उन्हें अपने पास बुलाया और उनके पुनर्जन्म की कथा सुना दी और यह भी बताया कि वे पूर्व जन्म में कहां और किसके पास थे?

नया जन्म लेने के बाद पूर्व जन्म की घटनाओं को पूरी तरह से भूल चूके लाहिड़ी महाशय पर जैसे ही महावतार बाबाजी ने कृपा की, लाहिड़ी महाशय को यह जानते देर नहीं लगी कि जहां वे बैठे हैं, ये पूर्व जन्म में उनका प्रिय स्थान था, और सामने बैठे गुरु देव उनके अनन्य है, फिर क्या था? लाहिड़ी महाशय को महावतार बाबाजी ने क्रिया योग की दीक्षा दी, फिर लाहिड़ी महाशय के द्वारा यह क्रिया योग युक्तेश्वर गिरि के पास आया और फिर परमहंस योगानन्द जी ने उक्त क्रिया योग को जनजन तक पहुंचाया।

आज महावतार बाबाजी का अवतरण दिवस है, यह अवतरण दिवस सामान्य दिवस नहीं, बल्कि क्रिया योग के उद्धारकर्ता, तथा अपने शिष्यों के प्रति अनुराग रखनेवाले तथा विश्व के समस्त लोगों के कल्याण के लिए सहस्राब्दियों से जीवात्माओं को सत्य मार्ग पर ले चलने के लिए जीवन धारण करनेवाले महावतार बाबाजी का है, इसलिए आज महावतार बाबाजी को आप जितना स्मरण करें, उनका ध्यान करें, ये आपके लिए और आध्यात्मिक उन्नति के लिए फायदेमंद ही सिद्ध होगा

Krishna Bihari Mishra

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