AGM के नाम पर लाखों फूंक देंगे, पर किसी नीरज या रवि की बीमारी में एक फूंटी कौड़ी खर्च नहीं करेंगे

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धनबाद प्रेस क्लब ने कल धनबाद क्लब में एजीएम की मीटिंग की। मीटिंग में धनबाद के कथित मूर्धन्य व वरिष्ठ पत्रकारों को भी बुलाया गया था। जिन्हें मंच पर बिठाया गया। कीमती शॉलों से उन्हें नवाजा गया। उन्हें बेशकीमती बुके देकर उनका मान बढ़ाया गया। इस मीटिंग में सुस्वादु भोजन का भी प्रबंध था, जिसमें मुर्गा भी शामिल था, जिसका सभी ने रसास्वादन किया और फिर अपने स्वभावानुसार सभी एक दूसरे को अलविदा कह अपने-अपने घरों की ओर चल दिये।

अब सवाल उठता है कि एजीएम की मीटिंग क्या इसीलिए होती है कि खाओ-पीओ ऐश करो या इसमें ऑडिट रिपोर्ट/आय-व्यय का लेखा-जोखा भी आप प्रस्तुत करेंगे, अपने कार्यों का ब्यौरा भी देंगे, अथवा अपने ही संगी-साथी जो किसी संकट से गुजर रहे हैं, उनके लिए आपने क्या किया? इसका भी ठोस प्रमाण देंगे।

लेकिन ऐसा कुछ वहां दिखा ही नहीं, जिन्हें भाषण देना था, उन्होंने खूब दिया, कहां कि ये मारा-वो मारा, लेकिन सच्चाई क्या है, वो मैं आपको बता दे रहा हूं। धनबाद के ही आवाज अखबार में काम करनेवाला नीरज एआइजी हास्पिटल हैदराबाद में जिंदगी और मौत से जूझ रहा है, जिसका लीवर 65 प्रतिशत तक खराब हो चुका है, जिसको यथाशीघ्र ऑपरेशन करवाना है, जिसे आर्थिक मदद की सख्त जरुरत है, उस नीरज के लिए इन महान पत्रकारों व मंच पर शॉल ओढ़नेवालों या ओढ़वानेवालों का ध्यान ही नहीं है।

सच्चाई तो यह है कि जितने पैसे शॉल, बूके और खाने में कल खर्च हुए, वो पैसे अगर नीरज तक पहुंच जाते तो उसे बहुत हद तक आर्थिक मदद हो जाती, उसका दुख दूर हो जाता, पर यहां नीरज के बारे में सोचने की फुर्सत किसको है? यही हाल झारखण्ड के एक वरिष्ठ पत्रकार रवि प्रकाश का है, जो कैंसर से जूझ रहे हैं। जो रवि प्रकाश को जानते हैं, वे बिहार-झारखण्ड के पत्रकार रवि को आर्थिक मदद मिले, इसके लिए फेसबुक पर कैंपेन चला रहे हैं, पर उस रवि के लिए भी हमारे ही पत्रकारों के बीच आर्थिक मदद करने को लोग खड़े होने को तैयार नहीं।

जब भी संकट आयेगा तो सीधे ये नेता के द्वार पहुंचेंगे, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो हम अपने लोगों पर फिजूल खर्ची में पैसे खर्च करते हैं, उसे हम उचित जगहों पर खर्च करें, ताकि कोई पत्रकार आनेवाले समय में कम से कम आर्थिक संकट के कारण उसकी जिंदगी तबाह होने से बच जाये।

ये जो हर बात पर मुफ्तखोरी का काम जो हमलोग करते हैं, कि मुफ्त में किसी से खाने का पैसे ले लिया, मुफ्त में कोई क्लब ले लिया, मुफ्त में किसी से किट या शॉल का प्रबंध कर लिया और कार्यक्रम संपन्न करा लिये। इन सब से कब मुक्ति पायेंगे? क्या हम पत्रकार इतने दरिद्र है कि अपने लिए हम एक बेहतर माहौल तैयार नहीं कर सकते।

सच्चाई यही है कि पत्रकार धनबाद का हो या रांची का, प्रेस क्लब रांची का हो या धनबाद का, हर जगह यही माहौल है और जब तक यह माहौल रहेगा, आपकी इज्जत दो कौड़ी की ही रहेगी, क्योंकि भिखमंगों को कही इज्जत मिली है क्या? आज भी वक्त है, उनके घर में दीये जलाने की कोशिश करिये, जिनके घर का दिया आर्थिक संकट के कारण बुझने की कगार पर है। नहीं तो, समझ लीजिये, आप जिस प्रकार का काम कर रहे हैं, ईश्वर आपको कभी माफ नहीं करेगा।

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