शशांक के अध्यक्ष बनने के बाद भाजपा के कई ‘युवा हृदय सम्राट’ सदमे में, परिवारवाद का नया भाजपा संस्करण आने से पार्टी के कई युवा कार्यकर्ता अचंभे में…
एक जमाना था जब कांग्रेस और भाजपा के बीच एक बुनियादी फर्क बताया जाता था। भाजपा के नेता सुबह से शाम तक कांग्रेस को परिवारवाद के नाम पर घेरते थे। मंच से लेकर सोशल मीडिया तक यही दावा होता था कि भाजपा में कार्यकर्ता आगे बढ़ता है और कांग्रेस में परिवार। लेकिन लगता है कि समय बदल गया है और अब झारखंड भाजपा में भी ‘परिवारवाद का भाजपा संस्करण’ आकार लेने लगा है!
दिल्ली में पूरी भाजपा में जनरेशनल शिफ्ट की चर्चा चल रही है। युवा चेहरों को आगे लाने की बात हो रही है और झारखंड से भी युवा नेताओं के नाम मांगे जाते रहे हैं। लेकिन मजेदार बात यह है कि पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता युवा कार्यकर्ताओं की सूची बनाने के बजाय अपनी-अपनी फैमिली लिस्ट तैयार करने में ज्यादा व्यस्त दिखाई दे रहे हैं।
रांची के एक केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि झारखंड में ऐसा कौन-सा युवा नेता है, जिसे आगे बढ़ाया जाना चाहिए, तो बताया जाता है कि जवाब सुनकर वहां मौजूद लोगों को शायद अपनी राजनीतिक शब्दावली ही बदलनी पड़ी। “सेठ जी” ने पूरे झारखंड में एक ही युवा नेता खोज निकाला—अपने सुपुत्र! “ऐश्वर्य” ऐसा कि पूरे राज्य में फैला हुआ बताया गया, प्रतिभा ऐसी कि सीधे ‘युवा हृदय सम्राट’ का ताज तैयार!
मंत्री जी ने उत्साह में तस्वीरों का पूरा एलबम भी खोल दिया—कहीं माननीय सांसद पिताजी की जगह बेटा फीता काट रहा है, कहीं पिताजी के साथ महामहिम राज्यपाल से मुलाकात, कहीं मैराथन में गुब्बारे उड़ाते हुए, तो कहीं होली में गुलाल उड़ाते हुए। अब सवाल यह है कि जब इतने सारे सार्वजनिक कार्यक्रमों में कैमरा पहले से मौजूद है, तो फिर संगठन में पद के लिए चुनाव, सदस्यता, संघर्ष, बूथ का काम और वर्षों की कार्यकर्ता यात्रा जैसी पुरानी परंपराओं की जरूरत ही क्या है? फोटो है, पिता जी सांसद हैं और मंच उपलब्ध है—युवा नेतृत्व तैयार है! चर्चा तो यहां तक है कि अगर कोई कार्यकर्ता “चीकू जी” को प्रणाम करना भूल जाए, तो युवा हृदय की धड़कन थोड़ी तेज हो जाती है।
उधर जमशेदपुर वाले महान वैश्य हृदय सम्राट पूर्व मुख्यमंत्री जी भी पीछे क्यों रहें? बेटे को राजनीतिक रूप से ‘सेटल’ करने की कोशिशों के बाद अब बहू को युवा मोर्चा की कमान दिलाने की कवायद करने लगे। रांची के एक पूर्व राज्यसभा सांसद भी दिल्ली में अपने वकील पुत्र को ‘युवा हृदय सम्राट’ बनाने की मुहिम में बताए जाते हैं। लोहरदगा के एक पूर्व एमएलसी भी अपने पुत्र को लंबे राजनीतिक ‘अज्ञातवास’ से बाहर निकालकर युवा मोर्चा की कुर्सी तक पहुंचाने की कोशिश में लग गए थे।
अब बेचारा सामान्य भाजपा कार्यकर्ता असमंजस में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि झारखंड में इतने सारे ‘युवा हृदय सम्राट’ कब पैदा हो गए? और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन युवा हृदय सम्राटों की लोकप्रियता का पता उनके पिताओं को तो है, लेकिन पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता और जनता अभी तक इससे अनजान क्यों हैं?
कार्यकर्ता वर्षों तक बूथ पर पसीना बहाए, पोस्टर लगाए, कार्यक्रम करे, लाठी खाए, संगठन के लिए समय दे और फिर जब पद की बारी आए तो पता चले कि युवा नेतृत्व पहले से ही पारिवारिक पैकेज में बुक है! और अब एक नई चर्चा भी सुनाई दे रही है—जो नेता वर्षों से अपने बेटों-बेटियों को ‘सेटल’ करने में लगे थे, वे अब खुद को ‘सेटल’ करने की चिंता में हैं। क्योंकि ऊपर से नीचे तक अगर संगठन की नई कमेटी में अपनी जगह ही सुनिश्चित नहीं हुई, तो फिर परिवार की राजनीतिक विरासत आगे कैसे चलेगी?
कड़वी नसीहत बस इतनी है कि राजनीति में पिता का नाम दरवाजा खुलवा सकता है, लेकिन जनता के दिल में जगह नहीं दिला सकता। संगठन कोई पारिवारिक लॉकर नहीं है, जिसमें नेता अपने बच्चों के लिए कुर्सियां जमा कर दें। कार्यकर्ता की तपस्या को अगर परिवारों की पैरवी से कुचला गया, तो फिर मंच पर परिवारवाद के खिलाफ भाषण देना केवल राजनीतिक हास्य बनकर रह जाएगा। नेता पुत्र होना अपराध नहीं है, लेकिन केवल नेता पुत्र होना योग्यता भी नहीं है और जिसे कार्यकर्ता पहचानता नहीं, जनता जानती नहीं, संघर्ष ने तपाया नहीं—उसे सिर्फ पिता की सिफारिश से ‘युवा हृदय सम्राट’ बनाना संगठन नहीं’, संगठन के साथ खुला मजाक है।
