धर्म

अपने हृदय को आश्रम बनाइये, जहां प्रेम, शांति, ध्यान हो, जहां आप मौन रहकर, ईश्वर के साथ खुद को एकाकार कर सकेः स्वामी चैतन्यानन्द गिरि

परमहंस योगानन्द जी कहा करते थे कि अपने हृदय को आप आश्रम बनाओ, जहां प्रेम हो, शांति हो, ध्यान हो, जहां आप मौन रहकर, ईश्वर के साथ खुद को एकाकार कर सको। उक्त बातें आज रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए योगदा भक्तों के बीच स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने कही।

उन्होंने कहा कि आश्रम एक ऐसा स्थान है, जहां लोग सांसारिक अवस्थाओं से दूर रहकर स्वयं को जानने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा कि क्या जरुरत है, आपको ईश्वर को पाने के लिए हिमालय जाने की, आप अपने हृदय को ही हिमालय बना दीजिये, फिर हिमालय जाने की आवश्यकता ही नहीं होगी। भगवान कृष्ण तो साफ कहते हैं कि मुझे स्मरण करो और अपने कर्म को करते रहो।

चैतन्यानन्द गिरि ने कहा कि कुछ लोग अपने हृदय को बाजार बना लेते हैं और नाना प्रकार के लेन-देन करते रहते हैं। कुछ लोग अपने हृदय को कचहरी बना लेते हैं और दूसरों के दोषों पर ध्यान देते रहे हैं। कुछ लोग अपने हृदय को कारागार बना लेते हैं और भय मोहादि में पड़कर उस कारागार में स्वयं को डाले रहते हैं। कुछ लोग अपने हृदय को गोदाम बना लेते हैं और उसमें अपने पुरानी स्मृतियों को संजो कर उसमें खोए रहते हैं। ऐसा जो भी करते हैं, वे सारे गलत लोग हैं, क्योंकि वे ऐसा कर स्वयं को विभिन्न प्रकार के बंधनों में बांधे रखते हैं। इससे उनका कभी भला नहीं होता।

उन्होंने कहा कि इसलिए परमहंस योगानन्द जी बार-बार कहा करते थे कि हृदय को परम आनन्द का स्थान बनाइये, आश्रम बनाइये। ईश्वर ने जो हमें डयूटी दी है, उसे पूरा करने में कोई बुराई नहीं। लेकिन इस डयूटी के दौरान ईश्वर को भूल जाने में बुराई अवश्य है। उन्होंने कहा कि इन्द्रियों को सुख बाहरी चीजों से मिलता है। इसलिए हम ईश्वर को बाहर में ढूंढते हैं। जबकि ईश्वर बाहर में नहीं, अंदर में हैं।

उन्होंने कहा कि आप कहेंगे कि जब ईश्वर अंदर में हैं तो लोग मंदिर में क्यों जाते हैं? मंदिर में इसलिए जाते है कि मंदिर ईश्वर का पावर स्टेशन है। जहां से आप ईश्वरीय शक्ति प्राप्त करते हैं। उनका स्पन्दन प्राप्त करते हैं। मंदिर जाकर उन शक्तियों को प्राप्त करना-स्पन्दन प्राप्त करना और उसे समय-समय पर संग्रहित करना ईश्वर प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने कहा कि हम ईश्वर को क्यों भूल जाते हैं, उसका मूल कारण हमारा काम, क्रोध, मद, लोभ आदि से बंधे रहना। जिस दिन हम इस पर विजय प्राप्त कर लेते हैं। हम ईश्वर की ओर बढ़ने लगते हैं। युक्तेश्वर गिरि कहा करते थे कि हमे आठ बंधनों से मुक्त होना ही पड़ेगा, ये आठ बंधने हैं, जो हमें ईश्वर से दूर करती है। वो घृणा, लज्जा, भय, शोक व आत्माभिमान आदि है।

उन्होंने कहा कि इन बुराइयों को दूर करने में पूरा जीवन लग जाता है। फिर भी ये बुराइयां दूर नहीं होती। लेकिन जो इन बुराइयों पर विजय प्राप्त कर लेता हैं, वो ईश्वर के निकट पहुंच जाता है। उन्होंने कहा कि शबरी को देखिये, केवल मतंग ऋषि ने सिर्फ यही कहा था कि उसे राम मिलेंगे। केवल राम के मिलने की चाह ने ही शबरी को इस प्रकार से निर्मल बना दिया कि आखिरकार शबरी को राम मिल ही गये।

स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने कहा कि ईश्वर की सबसे बड़ी विशेषता है कि जो भी भक्त उन्हें अपने हृदय में स्थान देता है। ईश्वर उस भक्त को अपने हृदय में स्थान दे देते हैं। भक्त उन्हें जो भी अर्पित करता है, उसे प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं। चाहे भक्त उन्हें पत्र, पुष्प या फल ही आदि क्यों न निवेदित करें। उन्होंने विदुर के घर का एक प्रसंग सुनाया कि कैसे भगवान कृष्ण जब विदूर के घर पहुंचे तो विदुर की पत्नी भगवान के प्रेम में इतनी खो गई कि उन्हें पता ही नहीं चल रहा था कि वो केले फेंक रही हैं और छिलके भगवान के हाथों में थमा रही है और भगवान कृष्ण को देखिये, वे छिलके भी उतने ही प्रेम से ग्रहण कर रहे थे, जितना एक सामान्य व्यक्ति केले को ग्रहण करता है, जबकि छिलका खाने योग्य नहीं होता।

उन्होंने कहा कि हमेशा ध्यान के साथ भक्ति का भाव रखिये। भक्ति सिर्फ श्रद्धा व भाव से विकसित होता है। हमेशा ईश्वर के सान्निध्य में रहिये। भक्ति के लिए भजन का आश्रय लीजिये। इससे ईश्वर के प्रति प्रेम जगता है। हमेशा गुरुजी के द्वारा दी गई पाठमालाओं को पढ़िये। ये पाठमालाएं दरअसल गुरुजी की आशीर्वाद के रूप में हमारे बीच में हैं। गुरुजी ने हमें जो तकनीक बताई है। उन तकनीकों पर ध्यान दीजिये। जैसे ही हम गुरुजी की बताई तकनीकों को अपनाते हैं। हम उच्च अवस्थाओं को प्राप्त करने में लग जाते हैं।

उन्होंने कहा कि इससे श्वास और प्राण पर नियंत्रण होने लगता है। फिर हमारी इन्द्रियां बाहर से भीतर की ओर केन्द्रित होने लगती है, जिसको प्रत्याहार कहा जाता है। जब हम ध्यान करते हैं तो हम अंतर्मुखी होने लगते हैं। जो ईश्वर को पाने के लिए एक अवस्था है। उन्होंने इसी पर एक दृष्टांत दिया। एक व्यक्ति जिसने आत्मसाक्षात्कार प्राप्त कर लिया था। उससे एक विद्वान ने पूछा कि तुम क्या कर रहे हो? आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति ने उत्तर दिया कि वो लकड़ी काट रहा है और पानी भर रहा है। विद्वान ने कहा कि जब तुम आत्मसाक्षात्कार नहीं प्राप्त किये थे, तब भी तुम्हारा यही उत्तर था और आज भी यही उत्तर है। आत्मसाक्षात्कार प्राप्त व्यक्ति ने विद्वान को बताया कि दरअसल जब आत्मसाक्षात्कार जब वो प्राप्त नहीं किया था, तब उसे लगता था कि यही कार्य वो कर रहा है। लेकिन जब आत्मसाक्षात्कार हो गया तो अब लगता है कि यह कार्य वो नहीं, बल्कि ईश्वर कर रहा है। यही अंतर है।

स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने कहा कि समझने की कोशिश करिये। भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो अपने हृदय में मुझे धारण कर लेता है। मैं उसे स्वयं धारण कर लेता हूं। इसी पर स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने एक और दृष्टांत सुनाया। एक बार नारद जी को भगवान विष्णु ने पृथ्वी पर भेजा कि वो देखकर आये कि उनका सबसे बड़ा भक्त कौन है? नारद जी जब पृथ्वी पर आये तो वे एक 80 वर्षीय भद्रक नामक वृद्ध के पास पहुंचे। जो तपस्या में लीन था। जब नारद उसके पास पहुंचे। तभी उसकी निद्रा टूटी। नारद ने भद्रक को अपना परिचय दिया। भद्रक ने तुरन्त नारद से कहा कि भगवान से जब वो मिले तो पूछेंगे कि वो कब उन्हें मिलेंगे? इसके बाद नारद एक शराब पीकर मस्त हुए युवक को एक गड्ढे में बल्ली डालते हुए देखा। जो ईश्वर को बार-बार भज रहा था और स्वयं को अपने दुर्गणों के लिए कोस रहा था और ईश्वर से बार-बार विनती कर रहा था कि उसके दुर्गणों को प्रभु दूर करें और अपने कार्य में तल्लीन था। उक्त शराबी युवक ने भी नारद से कहा कि जब वो भगवान से मिले तो जरुर पूछेंगे कि उन्हें भगवान कब मिलेंगे?

नारद जी दोनों से मिलने के बाद विष्णु लोक पहुंच गये और उन दोनों की सारी बातें बता दीं। भगवान विष्णु ने नारद जी से कहा कि वे दोनों को जाकर बता दें कि अभी वे एक सुई की नोंक से लाखों हाथियों को बाहर कर रहे हैं। जैसे ही यह काम संपन्न हो जायेगा। वे दोनों से आकर मिलेंगे। नारद जी, भगवान का उत्तर सुनकर, सबसे पहले भद्रक के पास पहुंचे और भद्रक को भगवान विष्णु की बात बता दी। भद्रक यह सुनकर गुस्से में आ गया और कहने लगा कि उसकी पूरी जिंदगी भगवान को प्राप्त करने में लग गई और अब यह सुनने को मिल रहा है, इससे अच्छा है कि वो भगवान को प्राप्त करने के बजाय इन्द्रिय सुख को प्राप्त करने में खुद को लगा देता और फिर वो सारी तपस्या छोड़कर इन्द्रिय सुख प्राप्त करने में लग गया।

इसके बाद नारद उस शराबी युवक के पास पहुंचे और उसे भगवान विष्णु की बातें बता दी। शराबी युवक बहुत ही प्रसन्न हो उठा। उसने नारद जी से कहा कि जो स्वयं ब्रह्माण्ड नायक हैं। उन्हें सूई के नोक के बीच से लाखों हाथियों को निकालने में कितना समय लगेगा। ये तो उनके बायें हाथ का खेल है। यह सुनकर अतिप्रसन्नचित हो ईश्वर का गुणगान करने लगा। भगवान को भजने लगा। इतना आत्मविभोर हो गया कि वो सुध-बुध खो बैठा। फिर नारद ने क्या देखा कि भगवान विष्णु क्षण भर में ही वहां उपस्थित हो गये और उक्त शराबी युवक को अपना दर्शन दे दिया।

स्वामी चैतन्यानन्द गिरि ने कहा कि उक्त शराबी युवक के सारे दुर्गुण दूर हो गये। वो ईश्वर के साथ एकाकार हो उठा था। ये कथा बताती है कि हमें करना क्या है? इसलिए अपने हृदय को आश्रम बनाइये। जहां, प्रेम, शांति, करुणा, दया, ध्यान का वास हो। जहां आप हो और ईश्वर हो। दूसरा कोई न हो। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपके साथ ईश्वर विराजमान है, अगर नहीं करते तो ईश्वर आप से कोसों दूर हैं।

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