गांधी को जिंदा रहने दीजिये, गांधी ही भारत को बचायेंगे, न कि नाथू राम गोडसे

भारत ही एक ऐसा देश है, जहां राम और रावण दोनों की पूजा होती है। यहां तो महादेव राम के नाम से भी जाने जाते है और रावण के नाम से भी। जरा देखिये, दक्षिण में रामेश्वरम् के नाम से तो झारखण्ड के देवघर में रावणेश्वर के नाम से और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां तो दुर्गा की भी पूजा होती है और कई ऐसे लोग हैं जो महिषासुर की भी पूजा करते हैं, इससे भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता

भारत ही एक ऐसा देश है, जहां राम और रावण दोनों की पूजा होती है। यहां तो महादेव राम के नाम से भी जाने जाते है और रावण के नाम से भी। जरा देखिये, दक्षिण में रामेश्वरम् के नाम से तो झारखण्ड के देवघर में रावणेश्वर के नाम से और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। यहां तो दुर्गा की भी पूजा होती है और कई ऐसे लोग हैं जो महिषासुर की भी पूजा करते हैं, इससे भी किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता और फर्क तब भी नहीं पड़ेगा जब आप गोडसे की आरती उतारेंगे, क्योंकि भारत ही नहीं, भारत के बाद भी जितने देश हैं, वहां भी गांधी के माननेवाले उतने ही हैं, जितने कल थे।

इन दिनों देखने में आ रहा है कि गांधी के खिलाफ नफरत की भावना खूब जमकर फैलाई जा रही हैं। इन दिनों गांधी के विरोध में कई साहित्यिक पृष्ठों को सोशल साइटों में एक सुनियोजित तरीके से फैलाई जा रही हैं, और लोगों को माइन्डवॉश किया जा रहा हैं। पूरे विश्व में ऐसे लोगो की कोई कमी नहीं, जो महान लोगों के कीर्तित्व पर अंगूलियां उठाते हैं, पर बहुत कम ही लोग हैं, जो उनके विचारों से प्रभावित होते हैं।

इन दिनों तो गांधी चुनाव से भी गायब है, क्योंकि गांधी के नाम से वोट नहीं मिलता, गांधी से ज्यादा अम्बेडकर का सदुपयोग एक सुनियोजित राजनीतिक लाभ लेने के लिए इस्तेमाल किया जाता है और अम्बेडकर का शुद्ध राजनीतिक लाभ उठाने के लिए सारी राजनैतिक दल सक्रिय है, इसका लाभ उन्हे कितना मिलता है, ये वे जाने, पर किसी भी महापुरुष का राजनैतिक लाभ के लिए इस्तेमाल हमारे विचार से सही नहीं, क्योंकि उनके विचार समाज व राष्ट्र निर्माण में ज्यादा प्रयुक्त हो, तो वो बेहतर हैं। ऐसे हम आपको बता दें कि गांधी और अम्बेडकर के विचार एक दूसरे से कभी मेल नहीं खाये, पर इसका मतलब यह भी नहीं कि गांधी और अम्बेडकर के नाम पर एक दूसरे से लड़ लिया जाये।

गांधी और अम्बडेकर दोनों हमारे लिए, भारत वर्ष के ऐसे अमूल्य धरोहर हैं, जिनसे भारत को बहुत ही लाभ हुआ हैं, इसे आप नकार नही सकते। गांधी को जानने के लिए, बाजार में बहुत सारी गांधी साहित्य भरी पड़ी है, रिचर्ड एटनबरो ने तो इन पर फिल्म “गांधी” भी बनाई, जो पूरी दुनिया में देखी और दिखाई गई, जिसे लोगों ने काफी पसन्द भी किया।

आम तौर पर गांधी से नफरत वहीं लोग करते हैं, जिन्होंने गांधी के आदर्शों को न तो जानने की कभी कोशिश की और न ही उस तरह से कभी जीने की कोशिश की और न ही उनमें इतना सामर्थ्य  है कि वे गांधी की तरह जी पायेंगे। एक राजकोट के दिवान के बेटे का, सारे ऐशो-आराम छोड़कर, जाड़ा, गर्मी और बरसात में भी एक लंगोटी पहनकर जीवन जीना, कोई सामान्य बात नहीं। विपरीत परिस्थितियों में सत्याग्रह को धारण करना, कोई आसान बात नहीं। उनका सत्याग्रह किसी खास व्यक्ति व समाज या देश के लिए नहीं था, उनका सत्याग्रह तो सब के लिए था।

जरा उनके सत्याग्रह को ऐसे समझिये। वे असहयोग आंदोलन का आह्वान करते हैं। उसी दौरान चौरी-चौरा कांड होता है, और वे असहयोग आंदोलन को वापस लेते है, क्योंकि असहयोग आंदोलन गलत दिशा में जा रहा था, और उसमें हिंसा हो रही थी, और गांधी के आंदोलन मे हिंसा का कोई स्थान ही नहीं था, उस आंदोलन में कई लोग हिंसक घटनाओं के शिकार हो गये। क्या इतना बड़ा और शुद्ध विचार किसी का कोई हो सकता है।

अपने दुश्मन और शत्रुओं का भी हित का कामना, कोई साधारण व्यक्ति नहीं कर सकता, आपका कोई थोड़ा कोई अहित करता हैं, और आप उससे बदला लेने की बात करते हैं, पर वो बदला लेने के सख्त खिलाफ, और अगर कुछ प्राप्त करना हैं तो उसे हिंसा का शिकार न बनाकर, उसके हृदय परिवर्तन करने की विधा अगर कोई जानता था, तो गांधी थे। गांधी के विचार और आदर्श उनके मरणोपरांत बहुत कम लोगों ने ही आत्मसात किया और न ही केन्द्र या राज्य सरकारों ने गांधी के आदर्श और विचारों को शिक्षा के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने की कोशिश की, शायद उन्हें लगता था कि गांधी को पढ़ाने से कहीं वोट बैंक पर खतरा न उत्पन्न हो जाये।

मैं कभी पोरबंदर नहीं गया, और न ही साबरमती आश्रम गया, केवल मोतिहारी गया हूं, वहां जो हमने अनुभव किया, वो हमें बताया कि गांधी बनकर कैसे जीया जाता है, हमारे जीवन में गांधी और कबीर का  बहुत ही प्रभाव है, मैं किसी को बताता नहीं हूं कि मैं गांधीवादी हूं या कबीर के पथ पर चलनेवाला व्यक्ति हूं, क्योंकि मुझे वाद पर विश्वास नहीं, स्वयं गांधी कहा करते थे कि कोई भी वाद आपकी स्वतंत्रता को खत्म कर देता है, आप स्वयं में एक विशिष्ट आत्मा है, आप स्वयं को पहचानिये, और सिर्फ एक देश ही क्या बल्कि संपूर्ण मानवता के लिए काम करिये।

सूर्य, चन्द्र, हवा, आकाश, धरा भला इन पर किसी एक राष्ट्र या एक शासक का कब्जा हो सकता है, कभी नहीं, पर एक व्यक्ति जो सभी से प्रेम करता है, वो सभी का हो जाता हैं, उसे कोई अपनी सीमा में कैद नहीं कर सकता। गांधी तो कहा करते थे, कि वे चाहते है कि उनके देश के सारे दरवाजे और खिड़कियां सभी धर्मों व संस्कृतियों के लिए खुला रहे, पर उन धर्मों व संस्कृतियों के कारण अपने ही धर्म  व संस्कृति के पांव उखड़ जाये, उन्हें मंजूर नहीं था। उनकी देशभक्ति पर भला कौन अंगूली उठा सकता हैं।

ऐसे में गांधी को जानिये, गांधी के मर्म को पहचानिये, गांधी को सामान्य आंखों से नहीं जाना जा सकता है, उन्हें दिल की गहराइयों से जाना जा सकता है, जो गांधी को जान लेगा, वो भारतीय संस्कृति को पहचान लेगा, साध्वी प्रज्ञा के गांधी के खिलाफ दिये बयान के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आया बयान कि उनका मन साध्वी प्रज्ञा को कभी माफ नहीं कर पायेगा, ये तब तक राजनीतिक बयान माना जायेगा, जब तक वह जमीन पर उतरा नहीं दिखेगा।

एक बात और बता देता हूं कि दुनिया की कोई ताकत किसी की विचारधारा को नहीं मार सकती, क्योंकि कोई भी विचारधारा एक स्वतंत्र विचारधारा हैं, जिसके कारण वह जाना जाता है, हमें याद है अलबर्ट आइन्सटीन ने गांधी के विषय में ठीक ही कहा था कि आनेवाले समय में शायद ही कोई गांधी पर विश्वास कर पायेगा कि एक हाड़-मांस से बना हुआ कोई ऐसा व्यक्ति भी धरती पर चलता-फिरता था। आइन्सटीन ने गांधी की मृत्यु पर लिखे संदेश में भी इस बात का उल्लेख किया था कि लोगों की निष्ठा राजनीतिक धोखेबाजी के धूर्ततापूर्ण खेल से नहीं जीती जा सकती, बल्कि वह नैतिक रुप से उत्कृष्ट जीवन का जीवन्त उदाहरण बनकर हासिल की जा सकती है।

Krishna Bihari Mishra

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