अब न बुलकी चलेगी, न तेजस्वी, न राबड़ी, लालू को अपने राजनीतिक सोच में परिवर्तन लाना ही होगा…

कल की ही बात है, बेचारे लालू प्रसाद रांची न्यायालय में हाजिरी लगाने आये थे, इसी बीच पटना में चल रहे राजनीतिक गहमागहमी के बीच वे पत्रकारों से मिले। पत्रकारों को भी खुब हंसाया और कुछ गंभीर बातें भी कहीं। हंसी-हंसी में गंभीर बाते यह थी, जब उन्होंने नीतीश पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “एगो लइकी थी बुलकी, जहां देखे चूड़ा-दही, वहीं जाकर हुलकी” बात में दम है, पर जब आप स्वयं भ्रष्टाचार में डूबे हो,

कल की ही बात है, बेचारे लालू प्रसाद रांची न्यायालय में हाजिरी लगाने आये थे, इसी बीच पटना में चल रहे राजनीतिक गहमागहमी के बीच वे पत्रकारों से मिले। पत्रकारों को भी खुब हंसाया और कुछ गंभीर बातें भी कहीं। हंसी-हंसी में गंभीर बाते यह थी, जब उन्होंने नीतीश पर कटाक्ष करते हुए कहा कि “एगो लइकी थी बुलकी, जहां देखे चूड़ा-दही, वहीं जाकर हुलकी” बात में दम है, पर जब आप स्वयं भ्रष्टाचार में डूबे हो, यहीं नहीं अपनी संतानों को भी भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ डूबा चुके हो, तो फिर इतनी सुंदर बातें भी आपके कंठ से निकलने के बाद धराशायी हो जाती है। क्या भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए?  क्या किसी भी नेता को उसे लूट की पूरी छूट मिल जानी चाहिए?  क्या नेता भी आम आदमी की तरह होता है?  क्या नेताओं को लाज, हया, शर्म इन सभी को गंगा में बहा देना चाहिए?  ये कुछ सवाल ऐसे है, जिस पर चर्चा होनी चाहिए।

चिन्तन करें लालू क्योंकि बिहार को बर्बाद करने में लालू सर्वाधिक जिम्मेदार

आज की ही खबर है कि बिहार में नीतीश को सत्ता संभालते ही विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी हो गये और विधानपरिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी हो गई। ये क्या मजाक है?  क्या राजद में लालू, राबड़ी, तेज, तेजस्वी, मीसा के अलावे कोई ऐसा नेता नहीं, जो महत्वपूर्ण पदों पर दिखाई पड़े। राजद के टिकट से बने विधायकों और सांसदों से तो कुछ आशा करना ही बेकार है, ये तो जो लालू और राबड़ी कहेंगे, बस जी-हुजूरी करेंगे, क्योंकि इन सांसदों व विधायकों के शरीर में रीढ़ की हड्डी नहीं होती।

लालू प्रसाद को खुद भी चिन्तन करना चाहिए कि 1990 के लालू और 2017 के लालू में आकाश-जमीन का अंतर क्यों आ गया?  एक समय था जब लालू के खिलाफ बिहार की जनता एक शब्द भी सुनना नही चाहती थी, पर आज वहीं बिहार की जनता लालू के साथ नहीं है, सिर्फ यादव जाति को छोड़कर। कमाल है, लालू आज खुब नीतीश के खिलाफ बयानबाजी कर रहे है। उन्हें प्रवचन दे रहे है, पर यहीं लालू प्रसाद दो दिन पहले तक नीतीश के प्रति मौन व्रत रखे हुए थे, शायद वे इस परिस्थिति का इंतजार कर रहे थे और जैसे ही ये परिस्थितियां आई, उनके हाथ नीतीश को हत्या के आरोप का प्राथमिकी का छाया-प्रति भी मिल गया। डायलॉगबाजी शुरु हो गई। जरा लालू की डायलॉगबाजी देखिये…

  • नीतीश ढोंगी है।
  • बेदाग बाबू ने बिहार को विनाश कर दिया।
  • मैं तिलक-टीका लगाकर राज करने को कहा, वो भस्मासुर निकल गया।
  • नीतीश 302 का खुद आरोपी है।
  • कंबल ओढ़कर घी पीता है। स्वयं कभी चुनाव नहीं लड़ा।
  • शराबबंदी कहीं नहीं है बिहार में, होम डिलीवरी होता है।
  • नीतीश के कफन में झोला है।
  • मैं शंकर बाबा और नीतीश भस्मासुर।

ऐसे भी लालू बयानबाजी के लिए भारतीय राजनीति में वर्षों से जाने जाते है। अगर आडवाणी और लालू दोनों एक जगह हो, तो भारतीय मीडिया सबसे पहले लालू के पास दौड़ेंगी, क्योंकि लालू जनता की डिमांड है और ये डिमांड उनकी गंवई शैली के कारण है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि लालू में अगर दो बातें नहीं होती, तो वे भारतीय राजनीति के सिरमौर होते, पर ये उनका दुर्भाग्य है कि वे दो बातों से उपर उठ ही नहीं सके। वो है – धृतराष्ट्र के जैसा परिवार प्रेम और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबना। विश्व में कही भी लोकतंत्र है, अगर उस लोकतंत्र में कोई भी जीवंत नेता, अगर परिवार प्रेम में धृतराष्ट्र बनने की कोशिश या भ्रष्टाचार में लिप्त होने का प्रयास किया, वह राजनीति में शीर्ष पर होते हुए भी, उसका जल्द अवसान हो गया। यह ध्रुवसत्य है, इसे कोई काट नही सकता।

नेता और जनता के परिवार प्रेम में अंतर

नेता और जनता के परिवार प्रेम में आकाश-जमीन का अंतर होता है। आम जनता के लिए परिवार ही सब कुछ होता है, वह इससे उपर नहीं सोच सकता, पर नेता के लिए उसके अपने परिवार से बढ़कर, उसके लिए जनता ही परिवार हो जाता है, क्योंकि वह नेता है। कुछ लोग कहते है कि दुनिया में कौन नहीं है, जो अपने परिवार से प्यार नहीं करता, या परिवार के लिए धन इकट्ठा नहीं करता। ये बात सत्य भी है, पर ये संवाद बोलनेवाले को मालूम होना चाहिए कि यह संवाद नेता पर लागू नहीं होता, ये जनता के लिए है। नेता जिस दिन परिवार मोह में फंसा, फिर वह राज्य को रसातल में ले जायेगा, यह भी ध्रुवसत्य है। उसका उदाहरण भी भारत में कई है, जिन-जिन नेताओं ने परिवारवाद को आगे बढ़ाया, वे जिंदा रहते, मरे हुए प्रतीत हो रहे है, और जिसने देश के लिए परिवार का मोह त्यागा, वे मरणोपरांत भी, वंदनीय है, प्रशंसनीय है, जैसे – एपीजे अब्दुल कलाम। कलाम साहब राष्ट्रपति पद पर रहते हुए भी, जो उन्होंने मिसाल कायम की, आज कलाम साहब भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद के बाद, भारत में सर्वाधिक प्रशंसनीय है।

लालू प्रसाद को यह स्वीकार करना होगा, कि उन्होंने परिवार के प्रति जो मोह बनाया, वह उनके लिए भी शर्मनाक रहा और बिहार जैसे गरीब राज्य के लिए भी। लालू बताये कि वे इतने वर्षों से सक्रिय राजनीति में रहकर बिहार के लिए क्या किया? क्या राजनीति राबड़ी के प्रति समर्पण का नाम है? क्या राजनीति बेटे-बेटियों के प्रति समर्पण का नाम है? क्या राजनीति भ्रष्टाचार में डूबकर अकूत संपत्ति इकट्ठा करने का नाम है?  क्या राजनीति बेशर्म बनने का नाम है? अगर आपके अनुसार यहीं करने का नाम है, तो ये सभी आपको मुबारक।

Krishna Bihari Mishra

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