आनन्द हमारे साधना की सहज अवस्था है, नियमित रुप से साधना में लगे रहिये, ईश्वर से बार-बार कहिये कि मुझे आपके सिवा कुछ भी नहीं चाहिये – ब्रह्मचारी सौम्यानन्द

आनन्द हमारे साधना की सहज अवस्था है। नियमित रुप से साधना में लगे रहिये। स्थितप्रज्ञ बनिये। दुख और सुख ये दोनों जिंदगी में आती रहेंगी, उसके बाद भी आप हर अवस्था में समभाव में बने रहिये। किसी भी अवस्था में स्वयं को विचलित होने न दें। हमेशा ईश्वर से कहिये कि मुझे आपके सिवा और कुछ भी नहीं चाहिए, देना हैं तो सिर्फ आप अपनी चेतना दीजिये, बस इतने में ही आपका भला हो जायेगा। यह बातें आज योगदा सत्संग मठ में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने कही।

उन्होंने धर्म के मूलस्वरुप, उसके सिद्धांत और रहस्यों से लोगों को परिचय कराया। ऐसे भी आज का विषय भी धर्म-विज्ञान को लेकर केन्द्रित था। मूल रुप से धर्म के तकनीकी पक्ष को उन्होंने बताने की कोशिश की और समय-समय पर दृष्टांतों के सहारे उन्होंने सभी का ज्ञानवर्द्धन किया। ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने इसी दौरान एक सुंदर कहानी लोगों के बीच में रखी। उन्होंने जॉन की कहानी सुनाकर बता दिया कि कैसे किसी भी व्यक्ति की पहली और अंतिम इच्छा क्या होती हैं या क्या होनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि एक जॉन नामक युवा था, उसे पेट की बीमारी थी। पेट की बीमारी के कारण वो जीवन को ठीक से नहीं जी सका। मरणोपरांत उसने ईश्वर से शिकायत करते हुए कहा कि अगले जन्म में स्वास्थ्य ठीक देना। ईश्वर ने बात मान ली और अगले जन्म में उसे बेहतर स्वास्थ्य देकर धरती पर भेज दिया। इधर जॉन को स्वास्थ्य तो ठीक रहा, लेकिन धन की कमी उसे जिंदगी भर सालती रही। उसने फिर ईश्वर से कहा कि अगले जन्म में मुझे धन की कमी नहीं रहे, इसकी व्यवस्था कर देना। ईश्वर ने फिर धन की भी व्यवस्था कर दी।

धन के बाद उसने ईश्वर से कहा कि अगले जन्म में मुझे अच्छी पत्नी भी देना, ताकि जिंदगी ठीक ढंग से चल सकें। ईश्वर ने उसे अगले जन्म में अच्छी सुंदर पत्नी दे दी। लेकिन वो जल्दी ही चल बसी। जॉन ने फिर ईश्वर से शिकायत की कि वो सुंदर पत्नी देने के साथ-साथ उसकी लंबी आयु हो, इसका भी प्रबंध करें। ईश्वर ने अगले जन्म में पत्नी दे दी और उसकी आयु भी लंबी कर दी।

लेकिन आयु लंबी होने से उसकी पत्नी के शरीर पर समय आने पर झूर्रियां पड़ने लगी और उसका शक्ल बदलने लगा। फिर उसने अपने हिसाब से जिंदगी को जीने की कोशिश की, लेकिन जिस आनन्द की खोज में वो बार-बार ईश्वर से जिस चीज की मांग कर रहा था, वो आनन्द देने के बजाय उसके जीवन में परेशानियां खड़ी कर रही थी। अंत में, उसे ज्ञान आया और उसने ईश्वर से कहा कि उसे अब और कुछ नहीं चाहिए, उसे केवल आप (ईश्वर) चाहिये।

ब्रह्मचारी सौम्यानन्द ने कहा कि दुनिया का हर व्यक्ति हर चीज में ईश्वर को ही ढूंढने का प्रयास करता है, क्योंकि हर मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति ही है। ईश्वर क्या है? तो ईश्वर का एक नाम हिन्दू धर्म-शास्त्रों में सत्+चित्त+आनन्द यानी सच्चिदानन्द है। वो आनन्द की ही प्रतिमूर्ति हैं। सच्चाई यही है कि हम सभी को आनन्द चाहिए, हम दुख से परे रहना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि आज भी योगदा से जुड़ा व्यक्ति साधना के दौरान यही कहता है कि “मैं आनन्द से आया हूं, आनन्द में रहता हूं और उस दिव्य आनन्द में विलीन हो जाउंगा।” यह सत्य भी है।

उन्होंने कहा कि संसार का हर व्यक्ति दुख से निवृत्ति और दुख से दूर रहना चाहता है। हर व्यक्ति चाहे वो आध्यात्मिक पथ पर हो अथवा न हो, सभी आनन्द चाहते हैं। उन्होंने इसे एक दृष्टांत के माध्यम से योगदा भक्तों को समझाया। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति ट्रेन से कही जा रहा था। तभी उसने देखा कि एक छोटा सा बच्चा ट्रेन में मैली-कुचली कपड़े पहने, जैसी-तैसी झाड़ू से बॉगी को साफ करने में लगा था। उस व्यक्ति ने उस बच्चे को अपने पास बुलाकर पुछा कि क्या तुम स्कूल जाते हो।

उसने कहा – नहीं, स्कूल जाने से क्या होगा? उस व्यक्ति ने कहा कि तुम पढ़ोगे तो बड़े आदमी बनोगे। बच्चे ने कहा – कि उससे क्या हो जायेगा? उस व्यक्ति ने कहा कि खुब पैसे कमाओगे। बच्चे ने कहा कि पैसे कमाने से क्या होगा? उस व्यक्ति ने कहा कि तुम सुख शांति से रहोगे। बच्चे ने कहा कि वो तो आज भी सुख शांति से ही रहता है। इसमें अलग से कौन सी बात हो गई। वो व्यक्ति बच्चे के जवाब से हैरान रह गया।

सौम्यानन्द ने कहा कि सुख शांति बाह्य आवरणों या भौतिक सुख सुविधाओं वाली वस्तुओं से नहीं आती, वो तो अंदर छुपी है। आप उसे कैसे देख रहे हैं या अनुभव कर रहे हैं। यह आप पर निर्भर करता है। लेकिन याद रखे यहां सुख-शांति और परमानन्द में बहुत ही अंतर है। सुख-शांति की तुलना आप परमानन्द से नहीं कर सकते। आनन्द हमारा परम लक्ष्य है, जबकि सुख-शांति हमारा परम लक्ष्य कभी हो ही नहीं सकता।

उन्होंने कहा कि एक आत्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी आनन्द की तलाश में ही जीवन लीला समाप्त करने की चेष्टा करता है। लेकिन उसे नहीं पता कि जिस आनन्द की तलाश में वो अपनी जीवन-लीला समाप्त कर रहा है, उसे ऐसा करने से भी प्राप्त नहीं होगी,  क्योंकि जब भी उसे नया जीवन मिलेगा, फिर से उसे वहीं से वो जीवन प्रारंभ करना होगा, जहां से वो छोड़कर आया था।

सौम्यानन्द ने कहा कि बहुत लोगों को गलतफहमी होती है कि वो आनन्द में हैं। पर सही आनन्द, जैसे – शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शांति सिर्फ धार्मिक व्यक्ति को ही प्राप्त होती है, पर हर धार्मिक जैसा दिखनेवाला व्यक्ति भी धार्मिक नहीं होता। धार्मिक होने के लिए आपको हर प्रकार के इन्द्रिय सुख और भौतिक सुखों पर विजय प्राप्त करना होगा। जो सिर्फ और सिर्फ साधना से ही संभव है। उन्होंने कहा कि जैसे ही हम इन्द्रिय सुख और भौतिक सुखों से खुद को समायोजित कर लेते हैं। हम भगवान से दूर हो जाते हैं। परम आनन्द से दूर हो जाते हैं।

उन्होंने कहा कि धर्म चर्चा का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि धर्म ईश्वर को पाने का विषय होना चाहिए। हम प्रभु से अलग नहीं हैं। प्रभु के सारे गुण हमारे में निहित है। बस हमें उनके जैसे जीने के प्रयास करने चाहिये। चूंकि हम हर चीजों को आइटेन्टिफाइ करना शुरु कर देते हैं, इसलिए हमें दुख होता है। अगर हम हर चीज ईश्वर और उनके प्रेम पर छोड़ दें तो फिर हम उनके निकट हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि याद रखें, हमें किसी भी दुख से निकलने, निबटने की शक्ति, हमारी आध्यात्मिक क्षमता पर निर्भर करती है, किसी दूसरे पर नहीं।