J&K में PDP से अलग हो भाजपा ने की अपनी सेहत ठीक करने की असफल कोशिश

अगर जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ्ती शासन से भाजपा खुद को अलग नहीं करती, तो समझ लीजिये, भाजपा जम्मू-कश्मीर से ही नहीं, बल्कि पूरे देश से समाप्त हो जाती, क्योंकि जो भाजपा के वोटर हैं या जो भाजपा के नये-नये वोटर बने हैं या जो भाजपा को वोट देकर कुछ खुशफहमी पाल रखे थे, वे निरन्तर जम्मू-कश्मीर में घट रही घटनाओं से सर्वाधिक मायूस थे।

अगर जम्मू कश्मीर में महबूबा मुफ्ती शासन से भाजपा खुद को अलग नहीं करती, तो समझ लीजिये, भाजपा जम्मू-कश्मीर से ही नहीं, बल्कि पूरे देश से समाप्त हो जाती, क्योंकि जो भाजपा के वोटर हैं या जो भाजपा के नये-नये वोटर बने हैं या जो भाजपा को वोट देकर कुछ खुशफहमी पाल रखे थे, वे निरन्तर जम्मू-कश्मीर में घट रही घटनाओं से सर्वाधिक मायूस थे। खासकर जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेनाओं पर की जा रही पत्थरबाजी, आईएसआईएस, पाकिस्तानी आईएसआई व वहां के दहशतगर्द लोगों की दखलंदाजी ने जम्मू-कश्मीर के हालात को पूरी तरह बिगाड़ दिये हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ में कश्मीर को लेकर प्रस्तुत रिपोर्ट, हाल ही में पत्रकार शुजात बुखारी व औरंगजेब की नृशंस हत्या ने तो केन्द्र सरकार की कार्यशैली पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। शायद यहीं कारण रहा कि लाख झूठ बोलने के बावजूद की जम्मू-कश्मीर में स्थिति सामान्य हैं, भारत की जनता तथा वहां रह रहे स्थानीय निवासियों ने केन्द्र सरकार पर विश्वास नहीं किया। इधर दिन-प्रतिदिन कश्मीर को लेकर भाजपा की गिरती साख ने भी यह त्वरित निर्णय लेने को उसे मजबूर किया कि अब महबूबा से खुद को अलग कर लेने में ही उसकी भलाई है।

जम्मू-कश्मीर की बिगड़ती हालात ने तो वहां के पीडीपी के विधायकों के भी पसीने छुड़ा दिये हैं, कश्मीर के ही विभिन्न इलाकों से विधायक बने ये पीडीपी के विधायक अपने ही इलाके में अकेले घुमने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं, वहीं हाल भाजपा के विधायकों का था, ये भी अपने जम्मू के इलाके में अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे थे। कहा तो, भाजपा ने लोगों को यह विश्वास दिलाया था कि वे कश्मीर से पलायन कर गये कश्मीरी पंडितों को बसायेंगे, वहां कश्मीरी पंडितों को बसाना तो दूर, वहां ऐसा माहौल भी नहीं बना सकें कि एक पर्यटक भी जम्मू-कश्मीर के पर्यटन का आनन्द भी ले सकें। हाल ही में दक्षिण भारत के एक पर्यटक की पत्थरबाजों ने जो पत्थर मारकर हत्या की, उसका उदाहरण सभी के समक्ष है।

जम्मू-कश्मीर में सेना की गाड़ियों पर हमले, सेना व अर्द्धसैनिक बलों के टुकड़ियों पर हमले, आंतकियों की मदद, ये कुछ उदाहरण है, जिसका जवाब न तो भाजपा के पास है और न ही केन्द्र सरकार के पास। ऐसे भी अब अगले साल यानी आठ महीने के बाद लोकसभा के चुनाव होंगे, ऐसे हालात में जम्मू-कश्मीर की वर्तमान स्थिति भाजपा के लिए सुखद संकेत नहीं दे रहे हैं, ये भाजपा के लोग भी समझ गये होंगे, ऐसे में अब महबूबा मुफ्ती के बाद राज्यपाल शासन के दौरान, वहां की स्थिति में क्या बदलाव आता है? इसी पर भाजपा का सेहत पता चलेगा। फिलहाल भाजपा के वरिष्ठ नेता राम माधव ने पीडीपी से खुद को अलग करने की बात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के हवाले से कर दी, पर भाजपा, मोदी और शाह को पता नहीं कि भारत की जनता जम्मू-कश्मीर और वहां सैनिकों के उपर हुए जानलेवा हमले को लेकर भाजपा को माफ करने के मूड में इस बार नहीं हैं।

Krishna Bihari Mishra

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