आत्मनिरीक्षण तो विपक्ष के साथ-साथ उप-सभापति हरिवंश को भी करना चाहिए वैंकेया जी, कि क्या वे किसानों की बद्दुआ झेल पायेंगे?

राज्यसभा में हुई कल की घटना को लेकर राज्यसभा के सभापति एवं भारतीय जनता पार्टी के नेता वैकेया नायडू कुछ भी फैसला सुना दें, पर उनके फैसले ने कृषि विषयक मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनके मंत्रिमंडल में शामिल सभी मंत्रियों-नेताओं, यहां तक की उपसभापति के मन में चल रही मोदी भक्ति को भी उजागर कर दिया है, साथ ही यह भी सिद्ध कर दिया कि हरिवंश की नजर उपसभापति से भी बड़े एवं उपर के पद पर है और वे वहां तक किसी भी तरीके से पहुंचने के लिए बड़ी ही सावधानी से कदम बढ़ा रहे हैं।

राज्यसभा में हुई कल की घटना को लेकर राज्यसभा के सभापति एवं भारतीय जनता पार्टी के नेता वैकेया नायडू कुछ भी फैसला सुना दें, पर उनके फैसले ने कृषि विषयक मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एवं उनके मंत्रिमंडल में शामिल सभी मंत्रियों-नेताओं, यहां तक की उपसभापति के मन में चल रही मोदी भक्ति को भी उजागर कर दिया है, साथ ही यह भी सिद्ध कर दिया कि हरिवंश की नजर उपसभापति से भी बड़े एवं उपर के पद पर है और वे वहां तक किसी भी तरीके से पहुंचने के लिए बड़ी ही सावधानी से कदम बढ़ा रहे हैं।

कल की घटना ने हरिवंश को नरेन्द्र मोदी के बहुत ही निकट लाकर खड़ा कर दिया है, ये सभी को गिरह पार लेना चाहिए, और नरेन्द्र मोदी निःसंदेह उनको आगे चलकर बहुत बड़ा पद देंगे, जिसकी कल्पना अभी किसी ने नहीं की होगी, क्योंकि नरेन्द्र मोदी की एक सबसे बड़ी गुण या अवगुण कह लीजिये, जो उनकी भक्ति में स्वयं को समिधा के रुप में परोस देता है, वे उसकी हर मनोकामना पूरी कर देते हैं। इसलिए विद्रोही24 की ओर से आनेवाले समय में एक बहुत बड़े पद के लिए हरिवंश को अग्रिम विशेष बधाई।

कल की घटना ने पत्रकार से उपसभापति बने हरिवंश का भी चेहरा उजागर कर दिया है, और वैंकेया नायडू ने जिस प्रकार विपक्ष के नेताओं को ये कहा कि वे आत्मनिरीक्षण करें, कि उन्होंने कल क्या किया? हम उनके ही नीचे कार्य करनेवाले उप-सभापति को भी कहेंगे कि वे भी आत्मनिरीक्षण करें कि उन्होंने पत्रकार से नेता बनकर अब तक देश हित में क्या-क्या किया?

आत्मनिरीक्षण केन्द्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी करना चाहिए, जिन्होंने कल अपने बयान में कहा कि “मैं खुद किसान हूं, मैं किसानों की परेशानियों को समझता हूं, ये सरकार भी किसानों की परेशानी को समझती है, केन्द्र सरकार ऐसा कोई भी कदम नहीं उठाएगी, जिससे कि किसी भी तरह से किसानों का नुकसान हो।” राजनाथ सिंह का यह डॉयलॉग फिल्मी संवाद लेखक डा. राही मासूम रजा, कादर खान, सलीम-जावेद को भी फेल कर दे रहा है।

वो इसलिए कि जब आप किसान हो, किसानों की परेशानी को समझ रहे हो, तो रक्षा मंत्री बनकर क्या कर रहे हो? इसके पूर्व गृह मंत्री बनकर देश को क्या दे दिये? अगर आप सही में किसान हो तो जाओ हल उठाओ, ट्रेक्टर पकड़ो, खेत जोतो, धान, आलू उगाओ। ये क्या करोड़ों- अरबों की सिर्फ जमीन पकड़ के कहते हो कि आप किसान हो। जमीन तो आपके ही सजातीय हरिवंश के पास भी है, जरा आप ही बता दो कि उन्होंने कितनी बार कोई फसल उगाने के लिए कुदाल पकड़ी है? हम भी बेकार आपलोगों से इस प्रकार के सवाल पुछ रहे हैं, क्योंकि आप तो नेता हो, नेता तो झूठ बोलने के लिए ही पैदा होते हैं, तथा अच्छी कमाई कर के अपने सात पुश्तों की व्यवस्था करने के लिए कार्य करते हैं।

आज जो पंजाब-हरियाणा के किसान कृषि बिल को लेकर संशकित हैं, सड़कों पर उतरे हैं, वो ऐसे ही नहीं उतरे हैं, उनका उतरना बताता है कि इस कृषि बिल से किनका भला और किनका नुकसान होनेवाला है? रही बात देश के अन्य किसान सड़कों पर नहीं उतरे, तो सच्चाई यह भी है कि देश में आज तक किसान सड़कों पर अपनी जायज मांगों के लिए उतरे ही नहीं है, क्योंकि उन्हें तो खाद, बीज, सिंचाई में ऐसा उलझा के मार डाला गया है, कि वे आंदोलन क्या करेंगे? रही बात उपर से इन्हें भगवान ने मार डाला है, क्योंकि पर्याप्त जमीन तो उनके पास खेती के लायक भी नहीं, वे तो दूसरे की जमीन पर बंटाई लेकर खेती करते हैं, और सारी जमीन राजनाथ सिंह व हरिवंश जैसे जमीदारों के बीच आकर अटक जाती है।

याद रखिये। देश के किसान मजबूर है, पर मूर्ख नहीं है, वे जानते है कि सरकार जो भी आयेगी, उनके गर्दन पर ही चाकू चलायेगी। भले ही कृषि बिल से किसानों की दुर्दशा मिट जायेगी का आप गोलगप्पे बेंचे, पर जिस प्रकार आपके द्वारा की गई नोट बंदी, जीएसटी और लॉक डाउन के बाद मजदूरों की सड़कों पर मौत लोगों ने देखीं हैं, उनका अंदेशा गलत नहीं है कि आनेवाले समय में कृषि जगत पर कारपोरेट का कब्जा हो जायेगा और बचे-खुचे मजदूर-किसान की जीवन लीला भी समाप्त हो जायेगी।

सारी शक्तियां गुजरात के तथाकथित गुजरात के महान पूंजीपतियों तक सिमट जायेगी। जैसे देश के पीएम-गृहमंत्री  गुजरात के, ठीक उसी प्रकार सारे धन गुजरात के उद्योगपतियों तक सिमट जायेंगे, फिर देश के सारे लोग इनकी मुठ्ठी में बंद होकर सांस लेंगे और सांस छोड़ेंगे।ऐसी दर्दनाक आनेवाली परिस्थितियों को देख अगर संसद में विपक्ष ने वोट बंटवारे की मांग की तो क्या गलत किया? राज्यसभा के उपसभापति से विपक्ष ने कृषि बिल पर क्या मांग की थी?

अगर राज्यसभा का उपसभापति पहले से ही मन बना ले कि उसे प्रधानमंत्री के इशारों पर काम करना है, संसद की बनाई गई नियमों-उपनियमों को ताक पर रखकर ध्वनिमत से बिल पास करा देना हैं तो फिर संसद का सम्मान तो वहीं खत्म हो गया। रही बात कोरोना काल में विपक्ष का हंगामा करना, वेल में आना, उपसभापति को रुलिंग की किताबें दिखाना ये गलत है तो फिर सही क्या है?  अगर कोई उपसभापति विपक्ष की जायज मांगों को भी अनसुना कर दें तो फिर विपक्ष किससे गुहार लगायेगा? ऐसे में हंगामा तो करेगा ही, क्योंकि ये मामला कृषि और किसानों के भविष्य से जुड़ा है।

हरिवंश जिन्होंने कल हंगामा के बीच ध्वनिमत से कृषि विधेयक पास करवा दिया। हरिवंश को यह नहीं भूलना चाहिए कि यही विपक्ष कुछ दिन पहले ही उन्हें उपसभापति पद तक ध्वनिमत से पहुंचाया था, हरिवंश ने सही मायनों में विपक्ष की भावनाओं से खेला है, देश के किसानों के साथ छल किया है, हरिवंश भले ही भाजपा या मोदी अथवा नीतीश के दुलारे हो जाये, पर आनेवाले समय में देश का किसान इन्हें माफ करने से रहा और जब देश के किसानों की बद्दुआ लगती हैं तो आप कितने भी बड़े पद पर क्यों न पहुंच जाओ, शांति नहीं मिलती।

वैंकेया नायडू ने जो आज किया, वो पहले से ही तय था, राजनाथ सिंह ने कल ही क्लियर कर दिया था कि कल जो राज्यसभा में हुआ, उस हंगामें में शामिल लोगों को आज दंडित किया जायेगा। वैंकेया नायडू ने राज्यसभा की कुर्सी संभालते ही तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन, डोला सेन, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, कांग्रेस पार्टी के राजू साटव, रिपुण बोरा, सैयद नासिर हुसैन एवं सीपीआइएम के एलमाराम करीम को एक सप्ताह के लिए निलंबित कर दिया, लेकिन उसके बावजूद ये आठों सांसद सदन से बाहर नहीं गये, हंगामा करते रहे, सूचना है कि उपसभापति ने सदन फिर आधे घंटे के लिए स्थगित कर दिया।

आज की घटना ने एक बात और सिद्ध कर दिया कि राज्यसभा में बहुमत मिलते ही जिस बात का भय था, वो भय अब दिखाई देने लगा है, भाजपा ने अपने विरोधियों की आवाज सदा के लिए बंद करने की ठान रखी है, जो आज दिखा है। हालांकि कल की घटना को लेकर सत्तापक्ष के पक्ष में पूर्व की तरह कई पत्रकार कृषि बिल की जय-जयकार में जुट गये, पर ज्यादातर पत्रकार समझ रहे हैं कि केन्द्र सरकार की इस कृषि विधेयक का किसानों पर बुरा असर पड़ेगा, कृषि सेक्टर में भी कारपोरेट जगत हावी हो जायेगा, फिर अंततः किसान के पास लाचारगी के सिवा कुछ नहीं होगा, ये कुछ नहीं कर पायेंगे।

याद करिये, एक समय था ये जियो वाले तीन महीने तक आपको मुफ्त में सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई थी। आपने लालच में सारे संचार कंपनियों से नाते तोड़ लिये। आज क्या है? आपके मुफ्त में सेवा का उपभोग करने के कारण सारी कंपनियों के हालत पस्त हो गये और आज वहीं जियो आपको 600 रुपये में तीन महीने से भी कम आपको सुविधा प्रदान कर रहा हैं। वह भी सुविधा ढंग की नहीं हैं, पर आपकी मजबूरी है, आप कुछ नहीं कर सकते। आज आपके पास कोई विकल्प भी नहीं कि दूसरे जगह जा सकें, यही हाल कृषि सेक्टर में होगा और ये उदाहरण कोई दुसरा नहीं, बल्कि किसान दे रहा है। ये कृषि विधेयक किसानों की नींद उड़ा देगा, जिंदगी तबाह कर डालेगा, जैसे और सेक्टरों की जिंदगी तबाह हो गई।

Krishna Bihari Mishra

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