भाई वाह, मंत्री रेलवे सैलून का बेवजह इस्तेमाल करे तो ठीक, और विभागीय अधिकारी करें तो गलत

जब रेलवे का कोई अधिकारी या कर्मचारी गलत करें तो उस पर अनुशासनात्मक/विभागीय कार्रवाई हो जाये और विभागीय मंत्री करें, तो वह सदाचार हो जाये, उस मंत्री के उक्त कार्य को यह कहकर प्रतिष्ठित किया जाये कि अरे मंत्री है, उसे इतना तो हक बनता ही है। बार-बार पं. दीन दयाल उपाध्याय की सादगी का ढोल पीटनेवाली और मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पं. दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन कर देनेवाली पार्टी के मंत्रियों का मंत्री बनने के बाद की उनकी जीवन शैली देखिये…

जब रेलवे का कोई अधिकारी या कर्मचारी गलत करें तो उस पर अनुशासनात्मक/विभागीय कार्रवाई हो जाये और विभागीय मंत्री करें, तो वह सदाचार हो जाये, उस मंत्री के उक्त कार्य को यह कहकर प्रतिष्ठित किया जाये कि अरे मंत्री है, उसे इतना तो हक बनता ही है। बार-बार पं. दीन दयाल उपाध्याय की सादगी का ढोल पीटनेवाली और मुगलसराय जंक्शन का नाम बदलकर पं. दीन दयाल उपाध्याय जंक्शन कर देनेवाली पार्टी के मंत्रियों का मंत्री बनने के बाद की उनकी जीवन शैली देखिये…

खुद ही जब भाजपा सत्ता में आई तो इसने रेलवे विभाग के अधिकारियों को सैलून से यात्रा करने पर यह कहकर विराम लगाया कि जब ये सामान्य यात्रियों की तरह यात्रा करेंगे तब इन्हें पता चलेगा कि लोगों को क्या दिक्कते होती है? और फिर वे इसमें सुधार का प्रयास करेंगे, पर क्या मंत्रियों पर यही चीज लागू नहीं होती, क्या हरदम आदर्शवाद की बात करनेवाली और बात-बात में कांग्रेस को भ्रष्टाचार की गंगोत्री कहनेवाली पार्टी बता सकती है कि उसके केन्द्रीय रेलवे राज्य मंत्री मनोज सिन्हा 8 अक्टूबर को रांची किसलिए आये थे?

क्या वे रेलवे के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए रांची आये थे या भाजपा शासित राज्य झारखण्ड व छतीसगढ़ सरकार द्वारा संपोषित हिन्दुस्तान अखबार के कार्यक्रम में शामिल होने आये थे और जब भाजपा शासित राज्यों द्वारा संपोषित हिन्दुस्तान अखबार के कार्यक्रम में उन्हें शामिल ही होना था, तो उन्होंने सैलून का इस्तेमाल क्यों किया? वे अन्य विकल्पों का भी सहारा ले सकते थे।

सूत्र बताते है कि दरअसल, केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा का सैलून पटना हटिया एक्सप्रेस से गोमो से लगकर राची पहुंचा था, उसके पहले उनका सैलून क्षिप्रा एक्सप्रेस से गोमो जंक्शन पहुंचा था, जिसमें वे सवार थे। आम तौर पर रेलवे का कार्यक्रम होता और वे सैलून का इस्तेमाल करते तो बात समझ में आ सकती थी, कि चलो उन्होंने सैलून का इस्तेमाल विभागीय कार्यों के लिए किया, पर एक ऐसा कार्यक्रम जो भाजपा शासित राज्यों द्वारा आयोजित था, जो आम तौर पर अखबारों को खुश करने के लिए ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जाते है, जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे को खुश करने का प्रयास करते हैं, ऐसे कार्यक्रम में आने और सैलून के इस्तेमाल की जरुरत क्यों?

ये तो वही बात हो गई, यानी मंत्री करें तो सदाचार और विभागीय अधिकारी करें तो भ्रष्टाचार। ज्ञातव्य है, कि कई रेल मंडलों में कई ऐसे अधिकारी जो सैलून का इस्तेमाल विभागीय कार्य के लिए न कर, अपने फायदे के लिए किये हैं, उन पर रेलवे गाज गिरा चुका है, पर मंत्री जी पर गाज कौन गिरायेगा?

Krishna Bihari Mishra

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Wed Oct 10 , 2018
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