कुछ अच्छी बातें अपने दुश्मनों से भी सीख ली जाये, तो क्या हर्ज है? पर क्या भाजपा विरोधी पार्टियां सीख पायेंगी?

भाजपा ने एक बार फिर अकेले 303 सीटें जीतकर सिद्ध कर दिया, कि उसकी ग्राह्यता पूरे देश में अब भी प्रभावी है, कुछ इलाकों में जहां ग्राह्यता नहीं थी, वहां पर भी भारी भरकम जीत ने सारे रिकार्डों को ध्वस्त कर दिये। हमें याद है, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार बने और संसद में विश्वास मत को लेकर बहस हुए, तो एक स्वर से सभी ने अटल बिहारी वाजपेयी की प्रशंसा की थी पर उनकी पार्टी भाजपा को सांप्रदायिक बताते हुए, उनकी कटु आलोचना भी की थी।

भाजपा ने एक बार फिर अकेले 303 सीटें जीतकर सिद्ध कर दिया, कि उसकी ग्राह्यता पूरे देश में अब भी प्रभावी है, कुछ इलाकों में जहां ग्राह्यता नहीं थी, वहां पर भी भारी भरकम जीत ने सारे रिकार्डों को ध्वस्त कर दिये। हमें याद है, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार बने और संसद में विश्वास मत को लेकर बहस हुए, तो एक स्वर से सभी ने अटल बिहारी वाजपेयी की प्रशंसा की थी पर उनकी पार्टी भाजपा को सांप्रदायिक बताते हुए, उनकी कटु आलोचना भी की थी।

पर उसी में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने सदन में अपनी बात रखते हुए कहा था कि हम विपक्षियों को अब चिन्तन करने की आवश्यकता है, अब भाजपा को अगर सांप्रदायिक कहते हैं तो यह उन भारतीय मतदाताओं का अपमान है, जिन्होंने भाजपा को वोट किया, क्योंकि इतनी तादाद में मतदाताओं का भाजपा पर विश्वास करना, इस बात का घोतक हैं कि भारत का मतदाता भाजपा को अब सांप्रदायिक नहीं मानता, पर उस समय चंद्रशेखर की बात आई और चली गई, लेकिन अब भी कोई भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी कहता है, तो निःसंदेह इसमें अब कहने में कोई गुरेज नहीं कि वह भारतीय मतदाताओं को भी सांप्रदायिक बना रहा है।

इस पार्टी में भी अन्य पार्टियों की तरह बहुत अच्छे-अच्छे नेताओं की एक शृंखला हैं, जिन्होंने देश को अपने ढंग से सेवाएं दी, और लोकप्रिय रहे, जिनमें आप पं. दीन दयाल उपाध्याय, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, मनोहर पर्रिकर, निर्मला सीतारमण आदि नेताओं के नाम तो ले ही सकते हैं। हां, हम यहां बात कर रहे थे, भाजपा में पनप रही कुछ अच्छाइयों की जिससे अन्य पार्टियां बहुत कुछ सीख सकती है, खासकर वो पार्टियां जो बनाई ही गई हैं, अपने परिवारों की सुरक्षा और नेतागिरी के नाम से आजीविका को सृदृढ़ करने के लिए, जैसे मुलायम सिंह यादव की पार्टी समाजवादी पार्टी, लालू यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल, डीएमके, वर्तमान कांग्रेस आदि।

इन पार्टियों की विशेषता है कि जहां ये परिवार से हटे कि पार्टी सदा के लिए समाप्त, लेकिन भाजपा में ऐसा नहीं है। भाजपा में एक परिवार के लोग टिकट ले सकते हैं, चुनाव जीत सकते हैं, पर वे पार्टी के अध्यक्ष बन जायेंगे या प्रधानमंत्री बन जायेंगे, या जब तक जिन्दा रहेंगे, वे अपने पदों पर विराजमान रहेंगे, ऐसा संभव नहीं हैं, एक नियत समय पर उन्हें स्वयं अपने पद को तिलांजलि देनी होगी और अगर वे खुद नहीं माने तो उनको बाहर का रास्ता दिखा जायेगा, अगर कोई ये सोचता है कि वर्तमान के नरेन्द्र मोदी या अमित शाह जैसे आज भाजपा में दिख रहे हैं, आगे भी दिखेंगे, ऐसा कम से कम इस पार्टी में संभव नहीं।

हाल ही में जब लाल कृष्ण आडवाणी को गांधीनगर से टिकट नहीं मिला तो कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी ने बहुत ही गंदी टिप्पणी की थी, पर न तो लालकृष्ण आडवाणी ने और न ही नरेन्द्र मोदी ने कुछ ऐसे बयान दिये, जिससे यह पता चलता हो कि दोनों के विचारों में कोई मतभेद हो, और जब पीएम नरेन्द्र मोदी दुबारा सत्ता में आये और जिस प्रकार आडवाणी के घर जाकर उनके चरण-स्पर्श किये तो सभी को एक प्रकार से जवाब मिल गया कि भाजपा में गुरु-शिष्य की परम्परा कैसी है? पता चल गया उन लोगों को भी, जब डा. मुरली मनोहर जोशी ने मोदी को अपने घर लडडू खिलाये, यह कहकर कि चलो हमलोगों ने जो बीज बोए, वो अब फल देने लगा हैं।

सवाल उठता है जब एक ही झटके में भाजपा के दिग्गज नेता को हटाने की बात आती है, लोग आराम से हटते हैं, कोई चूं नहीं बोलता, पर अन्य दलों में क्या यही परम्परा है? सुमित्रा महाजन, करिया मुंडा, अरुण जेटली, सुषमा स्वराज एक-एक कर हट रहे हैं, कोई स्वेच्छा से तो कोई भाजपा के नीतियों के कारण, पर कोई ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं कर रहा, वो भी अपनी पार्टी के खिलाफ, जहां उन्होंने स्वयं का उत्कर्ष देखा, चलते बने, पर अन्य दलों में क्या होता है, उधर टिकट मिला नहीं, और इधर पार्टी विरोधी बयान प्रारंभ। भाजपा में भी शत्रुघ्न सिन्हा, अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा जैसे लोगों ने अन्य दलों की परम्पराओं का भाजपा में बीजारोपण करने की कोशिश की, पर क्या हुआ, उन्हें खुद पता है?

इसलिए भाजपा के बारे में सभी को यह मालूम होना चाहिए कि यह किसी व्यक्ति विशेष की पार्टी नहीं हैं, यह संघ की एक राजनीतिक इकाई है, जहां देश-सेवा सर्वोपरि हैं, जहां व्यक्ति-पूजा की कोई अहमियत नहीं, आपको जब तक सेवा का मौका मिला, सेवा करिये, और जब आदेश आया तो निकल चलिए, वह भी बिना चिल्लम-पो के, अगर चिल्लम-पो करेंगे, तो खुद समाप्त हो जायेंगे, भाजपा को कुछ नहीं होगा। काश ये विचारधारा का प्रादुर्भाव सभी दलों में होता, तो कितना अच्छा होता, निःसंदेह उस दल और देश दोनों का भला होता, पर ऐसा संभव हैं क्या? काश देश के सभी राजनीतिक दल, भाजपा के अंदर पनप रही, इस प्रकार की क्वालिटी को अपनाते और देश को एक नई दिशा देते। पर यहां ऐसा संभव होगा, हमें नहीं दिखता।

Krishna Bihari Mishra

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