धर्म

आओ छठ मनाएं पर कैसे?

आओ छठ मनाएं, पर कैसै? क्या अखबार पढ़कर या चैनल देखकर या बेसिर-पैर के छठगीतों को सुनकर, या नेताओं द्वारा स्वयं के पापों को धोने के लिए चलाये जा रहे छठसामग्रियों का दान लेकर, फैसला आपको करना है… ऐसा नहीं कि आप पहली बार छठ कर रहे है, आपके पहले भी लोगों ने छठ किया है, आनेवाले समय में भी लोग छठ करेंगे, पर जब भाव न होकर, छठव्रत बाह्याडंबर और पाखंड का शरण ले लें तो फिर वह छठ, छठ नहीं रह जाता, उसका खामियाजा छठ करनेवाले ही नहीं, बल्कि उसमें शामिल होनेवाले लोगों को भी उठाना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार जब घर में आग लगेगा, तो उस घर में रहनेवाले सभी व्यक्तियों को वह आग झुलसाने का काम करेगा, जब ठंड का मौसम आयेगा तो वह ठंड का मौसम केवल एक व्यक्ति को नहीं प्रभावित करता, बल्कि वहा रहनेवाले सभी व्यक्तियों को प्रभावित करेगा।

सुनीता की नई-नई शादी हुई है। उसे ससुराल आये हुए मात्र सात महीने हुए है। पता चला कि वह छठ कर रही है। मैंने सुनीता से पूछा कि सुनीता बताओ कि तुम छठ क्यों कर रही हो ? उसने कहा – बस यूं ही। मैंने पूछा – बस यूं ही, का क्या मतलब?  यूं ही तो कोई कुछ करता नहीं और कोई भी कुछ काम करता है, तो उसके पीछे एक लक्ष्य होता है। सुनीता के पास मेरे सवाल का जवाब नहीं था। सुनीता के सास-ससुर से जब मैने यहीं सवाल पूछा कि सुनीता छठ क्यों कर रही है? उनका जवाब था कि उसका मन था, करने को, मैने कह दिया – करो और सारे सामान ला दिये, वह अब छठ कर रही है, अच्छा लग रहा है, हम बिहार के है तो ऐसे भी बिहार का पहचान छठ है।

कल की ही बात है, चुटिया थाना के ठीक सामने हिन्दुस्तानी क्लब द्वारा छठव्रतियों के लिए छठ की सामग्रियां बांटी जा रही थी। छठ की सामग्रियां बांटनेवाले सभी नवयुवक थे, उनके मन में छठ व्रत और छठव्रतियों के प्रति गजब की श्रद्धा देखने को मिल रही थी। उन नवयुवकों के हृदय में उमड़ रही भक्ति स्पष्ट रुप से बता रहा था कि वे छठ के भाव को समझ रहे थे। दूसरी ओर एक-दो को छोड़कर ज्यादातर लोग वहां ऐसे पहुंचे हुए थे, जिनके पास किसी चीज का अभाव नहीं था, वे बाजार से जाकर इन सामग्रियों को आराम से खरीद कर भगवान भास्कर को अर्घ्य दे सकते थे, पर हमारे समाज में मुफ्त की सामग्री लेने की जो नई परंपरा की शुरुआत हुई है, जो मुफ्त के सामान लेने की लालची प्रवृत्ति को जो प्रार्दुभाव हुआ है, वह सही मायनों में जो सही में गरीब लोग है, उनके सपनों को तार-तार कर रख दिया है।

आश्चर्य तो हमें तब हुआ, कि इसी जगह जब एक मोटरसाइकिल पर सवार एक युवक के साथ आई युवती, उन छठ सामग्री बांट रहे युवकों के पास छठसामग्री का मांग करने आ गई, उन नवयुवकों ने कहा कि आपने छठ सामग्री लेने के लिए पहले से रजिस्ट्रेशन कराया था, वह बोली – नहीं, तब उन नवयुवकों ने कहा कि हमें खेद हैं कि हम आपको छठसामग्री उपलब्ध नहीं करा सकते, क्योंकि यहां ये सब उन्हीं का है, जो पहले से निबंधन करा चुके है। जो युवती छठ सामग्री की मांग करने आई थी, हम दावे के साथ कह सकते है कि वह किसी भी प्रकार से गरीब नहीं दीख रही थी कि वह एक सूप-दौरा या फल नहीं खरीद सकें।

सवाल है कि क्या छठ व्रत करने के लिए सचमुच पैसों की जरुरत है?  क्या बिना सुप-दौरा के, बिना दिया-बाती के, बिना फल और ठेकुआ आदि के छठव्रत संपन्न नहीं हो सकता। उत्तर है – एक दम हो सकता है, क्योंकि भगवान भास्कर न तो सुप-दौरा, न तो फल-फूल की मांग करते है, वे तो सिर्फ ये देखते है कि भक्त का भाव क्या है? और उस भाव को अर्पण करने के लिए सिर्फ उनके ध्यान की आवश्यकता होती है और ध्यान के लिए, हमें नहीं लगता कि इन सभी बाह्य सामग्रियों की कोई आवश्यकता नहीं।

ज्यादा जानकारी के लिए, आप उन बुढ़े-पुरनियों को देखिये, जब छठ के पहले या दूसरे दिन अर्घ्य देने के पूर्व, वे भगवान भास्कर के मुख की ओर दोनों हाथ जोड़कर, आंखे मूंदे, विभिन्न जलाशयों में ध्यान लगाये खड़े होते हैं, अब आप बताइये कि किसी भी जलाशयों या नदियों में भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के समय खड़े होने पर, ध्यान लगाने पर, कितने पैसे खर्च होते है?  अरे अगर ईश्वर ने आपको धन-धान्य से संपन्न किया तो कंजूसी मत करिये और जब कुछ नहीं दिया तो सिर्फ एक लोटा पानी अर्घ्य देने के लिए इस्तेमाल करिये और लीजिये आपकी पूजा संपन्न। ऐसा किसने कहा कि अमीरों की पूजा सफल होती है और गरीबों की नहीं। किसने कहा कि केवल सूप से ही अर्घ्य दिया या दिलाया जाता है। ऐसी कोई बातें, इस पूजन से जुड़ी नहीं। मैंने तो देखा है कि कई लोग जो अर्घ्य नहीं देते, व्रत नहीं रखते, केवल व्रतियों की सेवा करने से ही वह पुण्य प्राप्त कर लेते है, जिसकी संभावना ही नहीं रहती।

भगवान तो सिर्फ भाव देखते है, पूजा का भाव, स्वच्छता का भाव, अपने और पराये में भेद मिट जाने का भाव, एक दूसरे के प्रति आनन्द देने का भाव, समाज में विषमता के मिट जाने का भाव, राष्ट्र व समाज के लिए कुछ करने का भाव, अपने बेटे-बेटियों में अंतर को खो देने का भाव यहीं सब तो ईश्वर देखते हैं, जो इन भावों के परीक्षा में पास कर गया, और केवल एक लोटे जल से ही अपने भाव को भगवान भास्कर के सामने परिलक्षित कर दिया तो लीजिये, उसका व्रत सफल नहीं तो समझते रहिये कि आपने छठव्रत किया या क्या किया?

मैने तो देखा है कि हजारों-लाखों खर्च करने के बावजूद लोग घाटों पर पहुंचकर तुच्छ घाटों के लिए लड़ जाते हैं, कुछ तो आज के दिन भी अपनी गंदी नजरों से बहुत कुछ निहार रहे होते हैं? कुछ तो सेवा भाव को नजरंदाज कर खुद की सेवा कराने के इच्छुक होते हैं, वह भी ये मन में भाव रखकर कि उन्होंने छठ किया हैं, अगर ऐसे भाव हैं, तो भला हो उनका जो ऐसी भाव रखकर छठ कर रहे होते हैं।