नवरात्र मनाएं, पर अखबार पढ़कर या चैनल देखकर नहीं…

नवरात्र आज से प्रारंभ हो गया। जो महाशक्ति को मानते हैं, जिनकी वो आराध्य हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे कृपया अखबार पढ़कर या चैनल देखकर नवरात्र न मनाएं, क्योंकि आजकल के अखबारों और चैनलों में ज्यादातर लम्पटों की आर्टिकल अथवा प्रवचन कब्जा जमा चुकी है, जिससे आपकी नवरात्र में आध्यात्मिकता की पुट कम और बाह्याडंबर और पाखंड का जमावड़ा ज्यादा हो जा रहा हैं, जिससे आपकी भक्ति प्रभावित हो जा रही हैं।

नवरात्र आज से प्रारंभ हो गया। जो महाशक्ति को मानते हैं, जिनकी वो आराध्य हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे कृपया अखबार पढ़कर या चैनल देखकर नवरात्र न मनाएं, क्योंकि आजकल के अखबारों और चैनलों में ज्यादातर लम्पटों की आर्टिकल अथवा प्रवचन कब्जा जमा चुकी है, जिससे आपकी नवरात्र में आध्यात्मिकता की पुट कम और बाह्याडंबर और पाखंड का जमावड़ा ज्यादा हो जा रहा हैं, जिससे आपकी भक्ति प्रभावित हो जा रही हैं।

मां जगत जननी हैं। उनसे कुछ भी छुपा नहीं हैं, अगर आप यह समझ रहे हैं कि अखबारों और चैनलों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर मां को प्रसन्न कर लेंगे तो आप समझ लीजिये, ये कदापि संभव नहीं। मां को प्राप्त करने के लिए, जानने के लिए, आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, बाह्याडंबर या पाखंड की जरुरत नहीं, सिर्फ भाव की जरुरत हैं।

जरा देखिये जगद्गुरु शंकराचार्य को कि वे क्या कह रहे है –

न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो

न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।

न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं

परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्।।

मां! मैं न मन्त्र जानता हूं, न यन्त्र, अहो! मुझे स्तुति का भी ज्ञान नहीं है। न आवाहन का पता है, न ध्यान का। स्तोत्र और कथा की भी जानकारी नहीं है। न तो तुम्हारी मुद्राएं जानता हूं और न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता है, परंतु एक बात जानता हूं, केवल तुम्हारा अनुसरण – तुम्हारे पीछे चलना। जो कि सभी क्लेशों को – समस्त दुख-विपत्तियों को हर लेनेवाला है।

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया

विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्या च्युतिरभूत।

तदेतत् क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे

कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।

सबका उद्धार करनेवाली कल्याणमयी माता! मैं पूजा की विधि नहीं जानता, मेरे पास धन का भी अभाव है, मैं स्वभाव से भी आलसी हूं तथा मुझसे ठीक-ठाक पूजा का सम्पादन हो भी नहीं सकता, इन सब कारणों से तुम्हारे चरणों की सेवा में जो त्रुटि हो गई हैं, उसे क्षमा करना, क्योंकि कुपुत्र का होना संभव हैं, किन्तु कहीं भी कुमाता नहीं होती।

जगद्गुरु शंकराचार्य के मुख से महाशक्ति के लिए निकले ये श्लोक और उसके भावार्थ बताते हैं कि महाशक्ति जगत् जननी को क्या चाहिए? वह सिर्फ भाव की भूखी होती हैं। आपने कितना उनके प्रति ध्यान लगाया, याद किया, ये देखती हैं। आपने अपने धन तथा बाह्याडंबर का कितना प्रदर्शन किया, उस ओर तो उनका ध्यान ही नहीं जाता। आपने कितने विद्वानों को बुलाकर कैसे दुर्गा पाठ कराया?  इस पर भी उनका ध्यान नहीं जाता, पर जैसे ही भक्त के हृदय में उनके प्रति सुंदर भाव जग जाते हैं, मां उक्त भक्त को अपने शरण में लेकर, उसके समस्त कष्टों को हर लेती है।

यह मैं इसलिए लिख रहा हूं कि नवरात्र आते ही, कई अखबारों व चैनलों में नाना प्रकार के कथित विद्वानों का प्रार्दुभाव हो जाता हैं, जो विभिन्न प्रकार से अंधविश्वासों और पाखंडों को बढ़ावा दे जाते है, जिससे भक्ति खत्म और अंधविश्वास तथा पाखंड का प्रदर्शन प्रारंभ हो जाता हैं, जिसकी जितनी आलोचना की जाय कम हैं।

अखबारों में नाना प्रकार की विसंगतियां परोसी जाने लगती हैं, मां को ये फूल पसंद हैं, मां को ये फल पसंद हैं, मां को लाल रंग पसंद हैं, मां को रसगुल्ले पसंद हैं, मां को हलवा पसंद हैं, यानी जितने प्रकार के विद्वान, उतने ही प्रकार की पूजा। एकरुपता कहीं नहीं और इनमें केवल एक ही बात देखने को मिलती हैं कि कथित विद्वानों का समूह मां के भक्तों के बीच अपनी विद्वता की धमक दिखाते हुए अपनी धर्म की दुकानदारी और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में लग जाते है, जो धर्म का विकृत स्वरुप हैं।

अरे भक्ति क्या हैं?  जरा एक प्रसंग देखिये। कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस खाने के बहुत शौकीन थे। एक बार रामकृष्ण परमहंस बिना मां को भोग लगाए खाने बैठ गये। रामकृष्ण परमहंस की पत्नी शारदा ने कहा कि बिना मां को भोग लगाए, आप सारा भोग खा जाओगे। रामकृष्ण परमहंस ने तुरंत जवाब दिया कि पहले यह भोग खाकर तो देख लूं कि कैसा बना हैं? क्योंकि मां को भोग लगाना है, वह स्वादिष्ट हैं या खानेयोग्य हैं या नहीं, यह कैसे पता लगेगा?  यह हैं भक्ति और यह है भक्ति की पराकाष्ठा। तभी तो रामकृष्ण परमहंस जैसा दूसरा कोई हुआ ही नहीं और न होगा। शबरी के बेर की भी बात तो वहीं थी, वह अपने राम को जूठे बेर थोड़े ही खिलाना चाहती थी, वह तो मीठे बेर खिलाना चाहती थी, उसे तो सिर्फ यहीं पता था कि उसके आराध्य उसके घर आयेंगे और मीठे बेर खायेंगे। ऐसी भक्ति को अपने मन में लाइये, नवरात्र मनाइये।

दुर्गा पाठ करिये अथवा श्रीरामचरितमानस का पाठ करिये, अपने हृदय में भक्ति का, ध्यान का अखण्ड दीप जलाइये, नवरात्र मनाइये। मैं दावे के साथ कहता हूं कि ऐसी भक्ति पर ही मां जगतजननी इतनी प्रसन्न हो जायेंगी कि आप स्वयं देखेंगे कि नवरात्र की समाप्ति होते-होते मां के अद्भुत आशीर्वाद से आप अनुप्राणित हो जायेंगे।

Krishna Bihari Mishra

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