हेमन्त सरकार ने कहा पहले झारखण्ड के आदिवासी मजदूरों को सम्मान और उन्हें जीने का हक तो दीजिये, फिर आप देखिये क्या होता है?

हेमन्त सरकार ने कहा कि आप झारखण्ड के आदिवासी बहुल इलाकों के आदिवासी मजदूरों को उनका सम्मान और उन्हें जीने का हक तो दीजिये। आप अपने लिए विशेष व्यवस्था कर लेते हैं, और झारखण्ड के आदिवासी मजदूरों को उनके हाल पर छोड़कर, उनके साथ अमानवीय व्यवहार करेंगे, तो यह तो ठीक नहीं।

शायद यही कारण रहा कि जब सीमा सड़क संगठन के अधिकारियों ने भारत-चीन सीमा पर बनाये जा रहे सड़क निर्माण में आ रही बाधाओं को देखते हुए झारखण्ड सरकार से आदिवासी मजदूरों को पुनः भेजने की गुजारिश की, तब सरकार ने बड़ी ही विनम्रता से वो बातें उठा दी, जो आज तक किसी ने नहीं उठाई, हालांकि मजदूरों की समस्या के निदान की बातें तो हर सरकार करती है, पर हेमन्त सरकार ने पहली बार दुखती रग पर हाथ रख द और डायरेक्ट सीमा सड़क संगठन के अधिकारियों के समक्ष वो सारी सवालें रख दी, जो आज तक किसी ने नहीं रखी। सवाल थे —

  • आखिर झारखण्ड के आदिवासी बहुल जिलों से ही मजदूरों की मांग क्यों उठ रही है?
  • ये मजदूर सीमा सड़क संगठन द्वारा कार्य में लाये जायेंगे या इन्हें कांट्रेक्टर के माध्यम से सड़क निर्माण में लगाया जायेगा?
  • इन मजदूरों को आखिर कितने मिनिमम वेज दिये जायेंगे?
  • एक महीने में इनसे कितने दिन काम लिये जायेंगे?
  • हर दिन इनसे कितने घंटे काम लिये जायेंगे?
  • काम के दौरान, इनके एकाउंट में कितने इपीएफ जमा किये जायेंगे?
  • जहां आक्सीजन की कमी है, जहां विपरीत परिस्थितियों में जो लोग काम करते हैं, उनके लिए स्पेशल वेज की क्या व्यवस्था है?
  • गंभीर रुप से बीमार हो गये मजदूरों के लिए क्या आपकी ओर से व्यवस्था की गई है?
  • इन मजदूरों के रहने-ठहरने के लिए क्या व्यवस्था की गई है?
  • मजदूरों के रहने से लेकर साइट तक आने-जाने तक के लिए क्या व्यवस्था की गई है?

हालांकि सीमा सड़क संगठन के वरीय अधिकारियों ने अपनी ओर से झारखण्ड सरकार को संतुष्ट करने की भरपूर कोशिश की, पर राज्य के अधिकारियों का मानना है कि सीमा सड़क संगठन द्वारा भेजे गये पत्र से भी इंटर स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन (रेग्यूलेशन ऑफ इम्पलायमेन्ट एंड कंडीशन ऑफ सर्विस) एक्ट, 1979 की अवहेलना हो रही है, जो गलत है। राज्य सरकार का मानना है कि इन्हीं सभी कारणों से राज्य के आदिवासी मजदूरों को  उनका हक नहीं मिल रहा और वे दयनीय अवस्था में हैं।

सूत्र बताते है कि जब लेह-लद्दाख से जब मजदूरों का दल प्लेन से रांची एयरपोर्ट पर उतरा था, तब कई मजदूरों ने इस बात की शिकायत हेमन्त सरकार से की थी, कि उनका वहां शोषण होता है। जिससे सरकार नाराज थी। हेमन्त सरकार का कहना है कि देश हित में उनकी सरकार और झारखण्ड के लोग किसी भी स्थिति में पीछे हटनेवाले नहीं हैं, फिर भी जो मजदूरों के लिए जायज मांगे हैं, उन्हें उपलब्ध कराने में हमें नहीं लगता है कि किसी को भी दिक्कत हो सकती हैं। ज्ञातव्य है कि कल हेमन्त मंत्रिमंडल में शामिल एक मंत्री के एक बयान से कई लोगों को गलतफहमियां हो गई थी, जिसको लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होनी शुरु हो गई थी, लोग हेमन्त सरकार पर अगूंलिया उठाने लगे थे।

हेमन्त सरकार का कहना है कि सीमा सड़क संगठन को चाहिए कि वो सर्वप्रथम मजदूरों को डायरेक्ट अपने संरक्षण में रखने के लिए एक्ट के तहत खुद को निबंधन करें, साथ ही उसे ही उन मजदूरों के एकाउंट में समुचित राशि उपलब्ध करनी चाहिए, जो आज तक नहीं हुआ है।हेमन्त सरकार का यह भी कहना है कि एक मेमोरेन्डम बीआरओ एवं झारखण्ड सरकार के श्रम विभाग के बीच हस्ताक्षरित होना चाहिए।

जिससे मजदूरों के शोषण को रोका जा सकें, साथ ही कोई कांन्ट्रेक्टर या बिचौलियों के ये मजदूर शिकार न हो, इसकी व्यवस्था हो सके। मजदूरों को हर प्रकार के एलाउंस जैसे डिस्पलेस्समेंन्ट एलाउंस, मेडिकल इंश्योरेन्स तथा अन्य लाभ उन्हें प्राप्त हो सकें। मजदूरों के हित में बीआरओ के समक्ष उठाये गये इन सवालों को लेकर, सभी ने मुक्तकंठ से राज्य सरकार की आज प्रशंसा भी की।