जिस गुरु ने लेना सीख लिया, वह गुरु कैसा?

आप रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु और उनके परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द को तो जानते ही होंगे, जिन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिनका रामकृष्ण मिशन आज भी बिना विवाद के मानवमात्र की सेवा कर रहा है, जिन्होंने परतंत्र भारत में रहकर शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में बताया था कि भारत क्या है, उसकी शक्ति क्या है?

सर्वप्रथम, गुरु पूर्णिमा के अवसर पर, मैं उन अंसख्य गुरुओं को नमन करता हूं, जिनके हृदय में राष्ट्र धड़कता था, राष्ट्र धड़कता है। जिन्होंने अपने प्रयासों से राष्ट्र के प्रति सम्मान और राष्ट्र के लिए कुछ भी कर गुजरने की भावनाओं को अपने शिष्यों में संचार किया।

मैं नमन करता हूं, उन महान ऋषियों की परम्परा को जीवित रखनेवाले स्वामी योगानन्द, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द जैसे ऋषियों का, जिन्होंने भारत में राष्ट्रीयता व आध्यात्मिकता के बीज बोए, तथा दूसरे देशों में भी भारत का पताका लहराया।

नमन कबीर, तुलसी, नानक, रविदास, बुद्ध, महावीर जैसे महान गुरुओं का, जिनका आज विकल्प कहीं ढूंढने को नहीं मिलता, जो कल भी थे और आज भी जीवित है। कहा भी जाता है – कीर्तियस्य स जीवति।

भारत इन्हीं जैसे ऋषियों के जन्मभूमि और कर्मभूमि का नाम है, जिन्होंने राष्ट्र को दिया, लिया नहीं। ये ही भारत के सच्चे गुरु कहलाने के अधिकारी है, दूसरा कोई हो भी नही सकता।

मैं नमन करता हूं, उन महान आध्यात्मिक गुरुओं जैसे वशिष्ठ, विश्वामित्र, अगस्त्य, भृगु, पराशर, धौम्य, संदीपनि, भास्कराचार्य, कणाद, चरक, चाणक्य आदि महान आत्माओं को जिनके कारण ही भारत की कीर्ति दूर-दूर तक फैली है।

कौन है गुरु, गुरु कौन हो सकता है?

स्पष्ट है – जो अपने शिष्यों के अंदर बैठे अंधकार को प्रकाश से भर दें, वह गुरु है।

क्या आज का शिक्षक गुरु हो सकता है?

शिक्षक, कभी गुरु हो ही नहीं सकता। शिक्षक सिर्फ शिक्षा दे सकता है, उसकी शिक्षा शिष्य के हृदय को आलोकित कर देगी अथवा उसके जीवन को प्रकाशमय बना देगी, ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि आज के शिक्षक में चरित्र का अभाव है, इसलिए जिसमें चरित्र ही नहीं, उसमें आध्यामिकता के पुट कहां से आयेंगे? और जो आध्यात्मिक है ही नहीं, जिसने स्वयं को जाना ही नहीं, वो अपने शिष्यों को कैसे जानेगा?

कैसे होते है गुरु?

जरा एक कहानी सुनिये। महाराज रघु का शासन चल रहा है। वहां वरतन्तु अपने शिष्यों को ज्ञानार्जन करा रहे है, तभी दीक्षांत समारोह के दौरान वरतन्तु अपने सारे शिष्यों को दीक्षा देने के बाद अपने-अपने घर को लौटने को कह रहे है, उसी समय वरतन्तु के पास कौत्स पहुंचता है। वह कहता है – गुरु जी, मैं आपको गुरु दक्षिणा देना चाहता हूं। आप हमसें गुरु दक्षिणा के रुप में क्या लेना चाहेंगे? वरतन्तु ने कहा कि चूंकि तुमने अपनी सेवा से गुरु को कृतार्थ कर दिया है, इसलिए तुम्हारी सेवा ही गुरु दक्षिणा हो गयी, फिर भी कौत्स मानने को तैयार नहीं, ज्यादा जोर डालने पर, वरतन्तु क्रुद्ध होकर कौत्स से एक लाख स्वर्ण मुद्रा की मांग कर देते है। बेचारा गरीब कौत्स इतनी स्वर्ण मुद्राएं कहा से लायेगा, सोच में पड़ जाता है, उसके बाद वह अत्यंत विनयपूर्वक अपने गुरु से कहता है कि वह उनको एक लाख स्वर्ण मुद्रा अवश्य देगा और यह कहकर गुरु को प्रणाम कर निकल पड़ता है। वह अपने गुरु को दिये गये वचन पुरा करने के लिए महाराज रघु के दरबार में जाता है, पर महाराज रघु की दशा देखकर वह विचलित हो जाता है, क्योंकि महाराज रघु के पास कुछ भी नहीं, अगर कुछ है भी तो मिट्टी के पात्र, क्योंकि कुछ दिन पहले ही उन्होंने राजसूय यज्ञ करने के दौरान अपना सर्वस्व दान दे दिया था और स्वयं राजा होकर भी संन्यासियों की तरह जीवन-यापन कर रहे थे। अचानक रघु की नजर, वरतन्तु के शिष्य कौत्स पर पड़ती है, वे आने का कारण पुछते है। कौत्स रघु की स्थिति देख कुछ कहना नहीं चाहते है, पर रघु तो रघु ठहरे, वे याचना करते है। महाराज रघु को मालूम हो जाता है कि कौत्स उनसे एक लाख स्वर्ण मुद्रा की इच्छा से उनके दरबार में आये है, तभी महाराज रघु ने संकल्प लिया कि वे कौत्स की इच्छा की पूर्ति के लिए कुबेर पर चढ़ाई करेंगे। कुबेर को जब इसकी भनक मिली, तो उन्होंने अपनी सारी संपत्ति महाराज रघु के खजाने में रखवा दिया। जब महाराज रघु को इस बात की जानकारी मिली कि स्वयं कुबेर ने उनके खजाने में अकूत संपत्ति रखवा दी है, वे सारा का सारा धन कौत्स को भेंट करते है और कौत्स उतना ही लेते है, जितनी की उन्हें आवश्यकता है और फिर वे उस धन को अपने गुरु वरतन्तु को सौंपते है। ऐसे होते है – गुरु और ऐसे होते है शिष्य। आजकल न तो वरतन्तु जैसे गुरु है और न ही कौत्स जैसा शिष्य। यहीं कारण है कि आज भारत भी भारत नहीं है।

ऐसी कई कहानियां है। आप रामकृष्ण परमहंस जैसे गुरु और उनके परम शिष्य स्वामी विवेकानन्द को तो जानते ही होंगे, जिन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जिनका रामकृष्ण मिशन आज भी बिना विवाद के मानवमात्र की सेवा कर रहा है, जिन्होंने परतंत्र भारत में रहकर शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में बताया था कि भारत क्या है, उसकी शक्ति क्या है? आप स्वामी विरजानन्द सरस्वती जैसे नेत्रहीन गुरु और स्वामी दयानन्द जैसे परम शिष्य को जानते ही होंगे, कि कैसे नेत्रहीन गुरु ने अपने प्रिय शिष्य स्वामी दयानन्द के हृदय को आलोकित कर दिया था और फिर कैसे स्वामी दयानन्द ने भारत की आत्मा को झकझोरा? आर्य समाज की स्थापना की और देश में एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। आपने स्वामी योगानन्द जी का नाम जरुर सुना होगा, जिनके गुरु श्री श्री स्वामी श्रीयुक्तेश्वर गिरि जी ने, उन्हें इस प्रकार, उनके जीवन को आलोकित किया कि स्वामी योगानन्द की संस्था योगदा सत्संग सोसाइटी आफ इंडिया और विदेशों में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप संपूर्ण मानव जाति को एक नयी राह दिखा रहा है।

गुरु सिर्फ देता है, लेता नहीं

गुरु दीपक के समान होता है, जैसे दीपक सिर्फ प्रकाश फैलाता है, ठीक उसी प्रकार गुरु अपने शिष्यों के अंदर छुपी अज्ञानता को निर्मल भाव से दूर करने का प्रयास करता है, उससे कुछ लेता नहीं, बल्कि निरंतर देता रहता है। क्या कोई बता सकता है कि गंगा किससे क्या लेती है?  वृक्ष किससे क्या लेता है?

वह तो सिर्फ और सिर्फ देना जानता है। जिस गुरु ने लेना सीख लिया, वह गुरु कैसा? वह तो उसी दिन खत्म हो गया, जब उसके मन में लेने का भाव जाग गया।

तस्मै श्री गुरवे नमः

आजकल मैं देखता हूं कि जैसे ही भारत में 5 सितम्बर यानी शिक्षक दिवस आता है। विभिन्न स्कूलों, कालेजों में इस श्लोक का जमकर दुरुपयोग होता है। वह श्लोक है –

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

शिक्षक कहता है कि गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही शंकर है, गुरु साक्षात् परब्रह्म है, इसलिए गुरुओं को नमस्कार है। जबकि इसका सही अर्थ है – गुरु को ब्रह्मा के समान होना चाहिए, जो शिष्यों में नवजीवन का संचार करें, जैसे ब्रह्मा को सृष्टि का जन्मदाता कहा जाता है। गुरु को विष्णु के समान होना चाहिए, जो अपने शिष्यों में आचरण और चरित्र की शुद्धता करते हुए उसका पालन-पोषण करें,  जैसे विष्णु सारे सृष्टि का पालन-पोषण करते है। गुरु को शंकर के समान होना चाहिए, जो शिष्य के अंदर छुपी सारी बुराइयों को भस्मीभूत कर दें, जैसे शंकर सृष्टि के संहार करने की क्षमता रखते है, और अगर ऐसी सारी खुबियां किसी गुरु में है तो वह साक्षात परब्रह्म है, ऐसे गुरुओं को ही प्रणाम है, पर यहां शिक्षक जो सरकार के टुकड़ों पर पलते है, जिन्हें समाज और राष्ट्र की कोई चिंता नहीं, जो अपने परिवार को ही सर्वोपरि मानकर जीवन खपा देते है और स्वयं को भ्रम में रखते है कि वे राष्ट्र निर्माता है, गुरु बनने का ख्वाब पाल लेते है।

जरा सोचिये।

मैकाले का नाम तो आपने सुना ही होगा। मैकाले ने भारत में क्या देख लिया था कि उसने ब्रिटिश संसद में यह कह दिया कि उसने भारत में रहकर पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक की यात्रा की। उच्चस्तरीय जीवन जीनेवाले लोग मिले, अभावों में रहकर भी लोग शान से जीवन व्यतीत करते है, कहीं कोई चोर या उचक्का नहीं दीखा, ऐसे में अगर हम यह समझे कि हम भारतीयों पर शासन करते है, तो गलत है, क्योंकि भारतीय इस बात को मानते है कि उन पर कोई शासन कर ही नही सकता। ऐसे में उन्हें यह बोध कराना जरुरी है कि उनका धर्म और उनकी संस्कृति, अन्य धर्मों और संस्कृतियों के आगे कुछ भी नहीं और फिर उसने वह कुचक्र रचा, जिसका परिणाम सामने है।

भारत की शक्ति है – उसका अध्यात्म, उसका योग, उसकी उच्च सोच, उसका धर्म और जब तक हम अपने अध्यात्म, योग, उच्च सोच और धर्म के मार्ग को नहीं अपनायेंगे, हम कभी श्रेष्ठता को प्राप्त नहीं कर सकते। आज गुरु पूर्णिमा के दिन, इससे ज्यादा हमें कुछ नहीं कहना, क्योंकि उपनिषद् कहता है – ।।धर्मों रक्षति रक्षितः।।

Krishna Bihari Mishra

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