अपराध

वरिष्ठ पत्रकार अन्नी अमृता की कलम से… जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो आम लोग क्या करें? एक महिला होने के नाते इस घटना ने मुझे बहुत ही लज्जित और सशंकित कर दिया है कि राज्य की पुलिस चौकियां ऐसी हैं?

झारखंड के सरायकेला के कांदरबेड़ा के पुनर्वास कॉलोनी की गरीब आदिवासी मजदूर महिला पर कपाली पुलिस ओपी में पुलिसकर्मियों द्वारा बुरी तरह पिटाई करने के आरोप के मुद्दे पर सत्ता और विपक्ष के बड़े और पावरफुल नेताओं की चुप्पी हैरान और विचलित करने वाली है। जिन आदिवासियों भाई-बहनों के नाम पर अलग झारखंड बना, वहां एक गरीब आदिवासी महिला कथित तौर पर सरायकेला के कपाली पुलिस ओपी (मिनी थाना) में पुलिसकर्मियों द्वारा इतनी बुरी तरह पिटी जाती है कि चोट की तस्वीरें हृदय को छलनी कर दें।

एसपी ने आरोपी पुलिसकर्मियों को निलंबित किया, मगर चांडिल थाना की हिम्मत देखिए कि पीड़िता के परिवार के गुहार के बावजूद चांडिल थाने में मामला दर्ज नहीं किया गया। मजबूरन पीड़िता के भाई ने एसपी से लिखित शिकायत की। आखिर किसी थाने को ऐसी हिम्मत कहां से आती है? मिली ताजा जानकारी के अनुसार रांची से कुछ लोग आए और पीड़िता को लेकर सरायकेला एसटी थाने में ले जाकर शिकायत दर्ज करवाए हैं। यानि एक एफआईआर को लेकर इतनी मशक्कत हो रही है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि आगे क्या खाक कार्रवाई होगी?

घटना (15जून) के अगले दिन (16जून) सोशल मीडिया और कुछ न्यूज वेबसाइट्स में मामला उजागर होने के बाद सरायकेला एसपी ने आरोपी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। मगर जिस महिला के शरीर के विभिन्न हिस्सों में मार पीट की गई हो, क्या महज निलंबन से न्याय होगा? मुझे यह लिखते हुए भी शर्म आ रही है कि शरीर के जिन हिस्सों में चोट है, वहां मारने के लिए तो कपड़े भी हटाए गए होंगे, तो क्या मुझे आगे लिखने की जरूरत है कि इस तरह की घटना में किन धाराओं के तहत मामला दर्ज होना चाहिए और क्या कार्रवाई होनी चाहिए? मगर जो हो रहा है, जो नजर आ रहा है, वहां लीपा पोती और मैनेज की कोशिश दिख रही है। ये मैं नहीं, स्वयं पीड़िता के भाई ने एसपी को लिखे शिकायत पत्र में बताया है कि उनलोगों के साथ क्या हो रहा है।

मुख्यमंत्री जी, अगर आपके नेतृत्व में अबुआ राज में ये हो रहा है, तो यह बहुत शर्मनाक है। आप कृपया ऐसा न होना सुनिश्चित करें और कड़ी से कड़ी कार्रवाई करें। झारखंड बीजेपी आपलोग धर्म और जाति में ही उलझे रहिए। इस तरह के महत्वपूर्ण मुद्दों पर कुछ मत करिए। विपक्ष का रोल हमलोग हैं न करने के लिए, हैं न हमलोग, पुलिस से लड़ने के लिए, सिस्टम से लड़ने के लिए… जी हजूरी की जगह जनता के मुद्दे उठाने के लिए… पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता तो हैं ही सूली पर लटकने के लिए और आम जनता है, पिसने और पिटने के लिए…

जनता से,

एसपी को लिखे शिकायती पत्र को देखिए और एक गरीब आदिवासी महिला की आवाज बनिए… फैसला तो अदालत करेगी कि कौन सही है और कौन गलत, पर यहां तो आवाज ही दबाई जा रही है, घटना के संबंधित थाने में मामला ही दर्ज नहीं किया गया। मैनेज का खेल चल रहा है। आप सोचिए, अगर वाकई आदिवासी महिला को आरोपी तीनों पुलिसकर्मियों ने इस कदर शरीर के विभिन्न हिस्सों में पीटा है कि एक महिला की गरिमा और लज्जा को को देखते हुए तस्वीरें साझा नहीं की जा सकती, तो क्या मात्र निलंबन ही न्याय है? आइए देखते हैं सिलसिलेवार ढंग से कि कैसे मुझे और जनता को इस घटना की सूचना मिली और कैसे क्या क्या हुआ? आखिर पूरा मामला है क्या…

16 जून की सुबह मेरे मोबाइल में चांडिल के पत्रकार सह सामाजिक कार्यकर्ता विश्वरूप पंडा का मैसेज और पीड़िता अल्पना महाली का वीडियो व फोटो आता है, जिसे देखकर मैं अवाक और द्रवित हो जाती हूं। एक महिला के शरीर के विभिन्न हिस्सों की विचलित करने वाली तस्वीरें मुझे झकझोर रही थीं। इतनी बेरहमी से किसने मारा होगा?  विश्वरूप पंडा ने बताया कि पीड़िता आदिवासी महिला अल्पना महाली एक आप्रवासी मजदूर है, जो दूसरे राज्य में मजदूरी करके अपना और परिवार का गुजारा करती है।

वह अपनी सहेली कपाली थाना क्षेत्र की तस्कीन खानम के लापता होने के मामले में आरोपी बनाई गई थी और पूछताछ के लिए कपाली ओपी में उसे बुलाया गया था। पीड़िता ने अपने वीडियो में पूरी जानकारी देते हुए बताया था कि वह इस मामले में सहयोग कर रही थी और अपना काम छोड़कर पुलिस के कहने पर 15 जून की शाम पांच बजे के बाद कपाली ओपी पहुंची जहां थाने में मौजूद कपाली ओपी प्रभारी (तत्कालीन व फिलहाल निलंबित) धीरंजन कुमार, मोहम्मद मुखलेसुर रहमान (सहायक उप-निरीक्षक) और कंचन (कांस्टेबल) ने सहेली के बारे में पूछते हुए बुरी तरह उसकी पिटाई की।

पीड़िता ने वीडियो में बताया कि पहले वह और उसकी सहेली साथ भाग चुके थे, लेकिन अब काफी समय से वह बाहर काम कर रही है और सहेली के लापता होने के विषय में कुछ नहीं जानती है। फिर भी पुलिसकर्मियों ने उसकी पिटाई की और कहा कि ये तो अभी ट्रेलर है, पिक्चर बाकी है। अगले दिन दस बजे आने को कहकर रात साढे दस बजे पीड़िता को छोड़ दिया। जब पीड़िता घर आई तब सूचना मिलने पर पत्रकार विश्वरूप पंडा और अन्य लोग उसके घर पहुंचे और फिर उसके वीडियो बयान को एसपी, पत्रकारों समेत अन्य लोगों को भेजा।

मैंने और बड़ी संख्या में अन्य लोगों ने इस विषय को सोशल मीडिया पर उठाया, ‘आजाद मजदूर’ ने लगातार प्रमुखता से छापा। मैंने वीडियो और फोटोग्राफ्स एसपी और राज्य की डीजीपी को उनके मोबाइल पर भेज दिया। राज्य की डीजीपी भी एक महिला हैं और सरायकेला की एसपी भी एक महिला हैं। उन्होंने देर न करते हुए तत्काल तीनों आरोपी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया। एसपी के निर्देश पर एसडीपीओ ने मामले की कमान ली, पीड़िता को एमजीएम अस्पताल जमशेदपुर लाया गया और वहां उसका बयान लिया गया।

इस मामले को लेकर पीड़िता के परिजनों और स्थानीय लोगों ने चांडिल थाने जाकर एफआईआर दर्ज कराने की कोशिश की, लेकिन अंधेरगर्दी देखिए कि मामला दर्ज नहीं किया गया। तब जाकर पीड़िता के भाई ने सरायकेला की एसपी निधि द्विवेद्वी को शिकायत पत्र लिखकर न्याय की गुहार लगाई। शिकायत के अनुसार पुणे (महाराष्ट्र) में प्रवासी मजदूर के रुप में कार्यरत उनकी बहन अल्पना महाली एक गुमशुदा लड़की के मामले में कपाली पुलिस द्वारा फोन करके बुलाने पर कानून का सम्मान करते हुए अपने खर्चे पर पुणे से आई और जांच में सहयोग किया।

लेकिन तमाम नियमो को ताक पर रखकर कपाली ओपी में बुलाकर उसे शारीरिक प्रताड़ना दी गई। गंभीर चोट, अत्यधिक दर्द और मानसिक आघात की हालत में उसे एमजीएम में भर्ती होना पड़ा। भाई के पत्र में जिन पुलिसकर्मियों का जिक्र है, उसे डीजीपी के आदेश पर एसपी ने पहले ही निलंबित कर दिया है।

शिकायत पत्र के अनुसार पीड़िता के शरीर पर प्रत्यक्ष चोट के निशान होने के बावजूद आरोपियो को बचाने का प्रयास किया जा रहा है। चांडिल थाना ने केस दर्ज करने से मना कर दिया। शिकायतकर्ता के अनुसार पुलिस का यह रवैया झारखंड पुलिस मुख्यालय के निर्देश का खुला उल्लंघन है, जिसमें कहा गया है कि संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर बिना किसी बहाने तुरंत प्राथमिकी दर्ज करनी चाहिए। ऐसा न करने पर पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई होगी।

भाई ने अपने शिकायत पत्र में यह भी आरोप लगाया कि पीड़िता के परिवार पर दबाव डालने के लिए 21जून 2026 की रात 10 से 11 बजे के बीच चांडिल के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी शिव कुमार कुछ अन्य पुलिसकर्मियों के साथ अचानक एमजीएम अस्पताल पहुंचे, जहां अल्पना महाली इलाजरत थी। परिवार ने आशंका जताई है कि मुख्य उद्देश्य उन पर दबाव बनाना था कि वे लोग कार्रवाई की मांग न करें। भाई ने एसपी से मांग की है कि बीएनएस 2023 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 की सुसंगत धाराओं के तहत तत्काल प्राथमिकी दर्ज की जाए।

साथ ही, मामले की जांच कपाली ओपी या चांडिल थाने से दूर किसी  स्वतंत्र और निष्पक्ष अधिकारी को सौंपने, अस्पताल की सीसीटीवी फुटेज व स्टेशन डायरी को सुरक्षित रखने की मांग की गई है। शिकायत की प्रतिलिपियां देश की महामहिम राष्ट्रपति, झारखंड के राज्यपाल, मुख्यमंत्री, केन्द्रीय राष्ट्रीय जनजाति आयोग, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और झारखंड की डीजीपी समेत कुल 30 उच्च अधिकारियों व संगठनों को जरुरी कार्रवाई हेतु भेजी गई हैं।

हो सकता है, जब तक आप ये रिपोर्ट पढें तब तक सरायकेला के एसटी थाने में एफआईआर हो चुकी हो, लेकिन सवाल अब भी ही है कि क्या इस मामले में आरोपी पुलिसकर्मियों पर निलंबन से आगे कोई कार्रवाई होगी या एक गरीब आदिवासी महिला के लिए सत्ता और विपक्ष की तरफ से कोई आवाज न निकलने पर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की सदस्य आशा लकड़ा ने मामले की जानकारी मिलते ही संज्ञान लिया है. देखना है कि क्या कार्रवाई होती है।

अंत में,

क्या झारखंड एक ऐसा राज्य बन गया है जहां शाम को किसी महिला को थाने में बुलाया जाता है, महिला के शरीर पर इतने चोट के निशान के बावजूद आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी नहीं होती क्योंकि आरोपी पुलिसकर्मी है और पीड़िता एक गरीब आदिवासी महिला है? क्या किसी नेता, पुलिस पदाधिकारी या रसूखदारों के साथ ऐसा करना संभव है? अगर ऐसा हो भी जाए तो क्या तब भी ऐसी लीपा पोती होती? ऐसी राजनीतिक चुप्पी होती? जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं तो आम लोग क्या करें? एक महिला होने के नाते इस घटना ने मुझे बहुत ही लज्जित और सशंकित कर दिया है कि राज्य की पुलिस चौकियां ऐसी हैं?

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