अन्नी अमृता की कलम से… बन्ना गुप्ता बनाम इरफान अंसारी, हजारीबाग में पत्रकार के साथ घटी घटना और कुछ सवाल?
इस दुनिया में कोई परफेक्ट नहीं है, जाहिर है बन्ना गुप्ता जी से भी गलतियां हुईं और आज उनकी जगह इरफान अंसारी स्वास्थ्य मंत्री हैं। मगर, बदला क्या? जनता को क्या मिला, ये तो ईश्वर जाने (क्योंकि कुछ नया, दिख तो नहीं रहा) पर पत्रकारों को डंडा मिल रहा है। बन्ना गुप्ता से संपर्क करना आसान था और पत्रकारों/लोगों द्वारा किसी मरीज या व्यक्ति के लिए मदद मांगने पर व्यक्तिगत तौर पर पहल करके वे मदद उपलब्ध करवा देते थे। वे सिस्टम नहीं सुधार सके, मगर मांगने पर मदद करते थे।
कई लोगों की मदद मैंने सिर्फ उनको व्हाट्सएप या फोन करके करवा दी थी। मुझे याद है कि राज्य के एक वरिष्ठ पत्रकार की बहन की तबियत बहुत खराब हो गई थी और सिर्फ मेरी सूचना पर उन्होंने पहल करके सदर अस्पताल, रांची में बेहतर इलाज की व्यवस्था करवा दी और बहन की जान बच गई। ऐसे मामलों की फेहरिस्त लंबी है। कितने गिनाऊं? आज ये लिखना और दुनिया को बताना जरुरी लगा क्योंकि लगातार मंत्री इरफान अंसारी द्वारा पत्रकारों के साथ गलत व्यवहार और अनर्गल बयानबाजी की खबरें देख-देखकर मन आहत हो चुका है और पुराना जमाना आंखों के सामने घूम रहा है।
झारखंड में स्वास्थ्य का जो सिस्टम ध्वस्त हुआ है, वह एक दिन या किसी एक मंत्री या नेता के कार्यकाल की बात नहीं है। सिर्फ एक व्यक्ति को दोष देकर नहीं बचा जा सकता। सरकारें आईं और गईं और धीरे-धीरे सिस्टम का अस्थिपंजर ढीला होता गया। बेहतर इलाज के लिए दक्षिण भारत जाने वाले जनप्रतिनिधियों और उनके फाइनेंसरों ने कभी ये नहीं सोचा कि आम जनता को इसी राज्य में कैसे उनके अपने गांव/शहर में बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराई जाए। कितने पत्रकार आए, गए, कितने ही पत्रकार स्वास्थ्य विभाग की पोल खोल-खोलकर मशहूर पत्रकार बनते रहे, उनका अनुभव बढ़ता रहा, मगर क्या राज्य में स्वास्थ्य सुविधा अप टू द मार्क हो पाई?
मैंने पूरी जिंदगी ‘ठेले पर सिस्टम’, धूल फांकती एंबुलेंस, ‘लापरवाही से जाती मरीजों की जान’, स्वास्थ्य केंद्रों से डाक्टर नदारद, ‘दवाइयां उपलब्ध नहीं’, ‘ट्रॉमा सेंटर में धूल फांकती मशीनें’ व ‘ICU की सुविधा नहीं’ जैसे ब्रेकिंग न्यूज के साथ दौड़ धूप की। अब नए युवा साथी ऐसी ही खबरें बना रहे। पीढ़ी दर पीढ़ी यही होता रहता है और हालात नहीं बदलते, तो क्या सिर्फ एक नेता को आप दोषी ठहराकर अपना पल्ला झाड़ सकते हैं? अब नया नेता स्वास्थ्य मंत्री है तो क्या परिणाम आया? अब पत्रकार डंडा खा रहे, सवाल उठाने पर नोटिस पा रहे।
पत्रकारों को भी अपने गिरेबां में झांकना ही होगा कि आखिर क्यों कोई नेता कुछ भी बोल रहा है? क्या लिफाफा संस्कृति या गिफ्ट्स वजह है? आज जहां देखिए लोग खुलकर कहते हैं कि फलां पत्रकार ने खबर के लिए या उनकी प्रेसवार्ता को जगह देने के लिए उनसे पांच सौ या हजार लिए। यहां तक कि आलम ऐसा हो गया है कि जो पत्रकार इन सबसे दूर अपना काम करने में लगे हैं, उनको लोग सशंकित होकर देख रहे कि क्या बात है, यह कुछ मांग नहीं रहा या ले नहीं रहा।
अगर पत्रकार चाहते हैं कि उनकी गरिमा बनी रहे तो अपनी कार्य संस्कृति की पड़ताल करें। एक जमाना था जब पत्रकारों को बहुत सम्मान हासिल था। सवाल उठता है कि अब वह सम्मान क्यों नहीं है? अब तो हर व्यक्ति स्वयंभू पत्रकार है। हर किसी के पास स्मार्ट फोन है और उसका सदुपयोग व दुरुपयोग दोनों हो रहा है। ऐसे में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि ‘कौन है पत्रकार? किसे पत्रकार माना जाए? जो लोग यू ट्यूब या न्यूज पोर्टल खोले हैं, वे कैसे अपना जीवन चला रहे हैं, यह भी एक गंभीर प्रश्न है?
इंटरनेट की दुनिया में कुकुरमुत्ते की तरह न्यूज साइटों व यू ट्यूब चैनलों की भरमार हो गई है। आखिर इनकी आय का स्रोत क्या है? सबके तो इतने व्यू नहीं कि महज यू ट्यूब की आमदनी से स्टाफ रखा जा सके और चैनल या साइट चलाया जा सके? तो क्या लोगों के आरोप कि पत्रकार पैसे लेते हैं, यह माना जाए कि यह तरीका विकसित कर लिया गया है। अगर वसूली ही करनी है तो फिर पत्रकारिता की आड़ लेने की क्या जरुरत है, यह भी एक सवाल है।
पत्रकारिता के संस्थानों को भी अपने गिरेबां में झांकना होगा कि आखिर वे कौन से फैक्टर्स हैं, जिनकी वजह से नेता मीडिया के बारे में कुछ भी बोल देते हैं। चूक कहां हो रही है? जनता से एक सवाल। आप क्यों चाहते हैं कि भगत सिंह आपके यहां नहीं बल्कि पड़ोस में पैदा हो। आप चाहते हैं कि पत्रकार आपके मुद्दों के लिए सूली पर लटक जाए, मगर आप अपने विधायक से सवाल नहीं करेंगे। जब चुनाव आएगा तब आप विधायक से काम का हिसाब नहीं लेंगे, बल्कि आप हिंदू-मुस्लिम के आपसी नफरत की घटिया राजनीति के फेरे में पड़कर वोट डालेंगे।
आप इस बात पर विवाद करेंगे कि फलां नेता के परिवार पर फलां नेता ने क्या कहा वगैरह-वगैरह… आप ये नहीं पूछेंगे कि क्यों हमारे शहर में सिर में चोट लगने पर बाहर रेफर किया जाता है? क्यों हार्ट/किडनी/पेट या अन्य बीमारों के इलाज के लिए शहर या राज्य से बाहर जाना पड़ता है? क्यों रिम्स पहुंचते पहुंचते लोग दम तोड़ देते हैं? क्यों स्वास्थ्य सुविधाओं का विकेंद्रीकरण नहीं होता?
जनता के बीच से कोई पूंजीपति मीडिया में पूंजी नहीं लगाता, मगर मीडियाकर्मी से उम्मीद करता है कि वह अपनी और अपने परिवार की परवाह किए बगैर सत्य के लिए प्राणों की बाजी लगा दे। उसे संस्थान सैलरी दे, न दे, पी एफ कटे न कटे, वह आपके सामने सत्य का खुलासा करते रहे, पुल-पुलिया सड़कों की खबरें बना बनाकर दबाव के बल पर सरकारों को मजबूर करें कि वे विकास कार्य करें, मगर उसका जीवन कैसे चले, इस पर समाज में कोई सुगबुगाहट नहीं। याद रखिए, पत्रकारिता कभी मिशन थी, फिर एक समय आया जब प्रोफेशन बनी और आज जनता ही कहती है कि पत्रकार दलाली करते हैं, तो क्या ऐसे माहौल के लिए सरकार और समाज अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं?
