वाह रे कविता लिखनेवाले IAS और वाह रे ऐसों को महिमामंडित करनेवाले संपादकों, थोड़ा शर्म भी है या बेच दिये

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आप IAS/IPS लोकसेवक है, जनप्रतिनिधि नहीं। आप लोगों को जो आपके सेवाकाल में कभी-कभी जनप्रतिनिधि होने का कीड़ा काट लेता हैं न, वहीं आपके लिए काल हो जाता है और जब वह काल अपना रौद्र रुप दिखाता है, तो आप उससे सबक न लेकर, उस समय का भी लाभ उठाने का प्रयास करने लगते हैं, जिसका नतीजा होता है कि उस वक्त काल आपके अपनों को भी कब अपना ग्रास बना लेता है, या उन्हें नंगा करना शुरु करता है, पता ही नहीं चलता।

26 मार्च 2021 के प्रभात खबर का प्रथम पृष्ठ का दृष्य, जिसमें आइएएस अविनाश को महिमामंडित करने की कोशिश की गई।

उदाहरण आज ही का देख लीजिये, रांची से प्रकाशित करीब-करीब सारे अखबार/चैनल व पोर्टल एक रांची में ही रह रहे आइएएस अविनाश कुमार द्वारा सोशल साइट पर लिखी कविता को आधार बनाकर, एक गलत को सही ठहराने में लग गये। समाचार है कि अविनाश कुमार के एक भाई है, अमिताभ कुमार। जो उत्तरप्रदेश में आइपीएस है, जिन्हें योगी सरकार ने जबरिया अवकाश प्रदान कर दिया है। जैसे ही अमिताभ कुमार को जबरिया अवकाश दिया गया।

अमिताभ कुमार ने अपने लखनऊ स्थित अवकाश पर अपने स्वभावानुसार जबरिया अवकाश का पर्चा साट दिया, तथा इसके माध्यम से लोगों का इमोशनल सपोर्ट पाने का प्रयास शुरु कर दिया। अब अमिताभ के इस कार्य से कितने लोग इमोशनल सपोर्ट के लिए आगे निकलें, पता नहीं। लेकिन झारखण्ड में रह रहे उनके भाई अविनाश कुमार ने तो अपने भाई की शान में एक कविता ही लिख डाली, जिसको यहां के महान पत्रकारों ने मार्मिक कविता कह अपने-अपने यहां स्थान दे दिया,साथ ही अविनाश कुमार का महिमामंडन भी कर दिया। अब हमारा सीधा सवाल हैं, अविनाश कुमार को महिमा मंडित करनेवाले अखबारों से, कि इस अखबार में छपे अविनाश कुमार के बारे में क्या ख्याल है…

पांच अगस्त 2018 का प्रभात खबर का प्रथम पृष्ठ, जिसमें झारखण्ड के आइएएस की करतूतों के बारे में ब्यौरा दिया गया है, जिसमें आइएएस अविनाश की महान कृतियों का भी बखान किया गया हैं।

भाई आपलोगों ने ही तो पांच अगस्त 2018 को छापा था, तो क्या वो खबर झूठी थी, जरा देखिये 1993 के बैच अविनाश कुमार की चल-अचल संपत्तियों के बारे में क्या लिखा है… और अंदाजा लगाइये कि ये आइएएस कितने महान है? प्रभात खबर ने तो अपने पोर्टल www.prabhatkhabar.com में पांच अगस्त 2018 को जो लिखा था, वो आपके सामने हैं…

पांच अगस्त 2018 का प्रभात खबर डॉट कॉम का प्रथम दृश्य

“झारखंड के ग्रामीण विकास विभाग के सचिव अविनाश कुमार को चश्मा से लेकर कार तक गिफ्ट में मिला है। वहीं, निबंधन विभाग के महानिदेशक ए मुत्थु कुमार को सिर्फ एक साल में ससुराल से 90 लाख रुपये कीमत की जमीन और फ्लैट गिफ्ट सेटलमेंट में मिला है। इसकी कीमत अभी करोड़ों रुपये आंकी गयी है।

पांच अगस्त 2018 का प्रभात खबर डॉट कॉम का द्वितीय दृश्य

अविनाश कुमार ने संपत्ति के ब्योरे में शादी में कई गिफ्ट दिये जाने का जिक्र किया है। शादी में उनको मामा ससुर से कार मिली थी। उन्होंने कई अचल संपत्ति जन्मदिन पर मिलने का जिक्र किया है। शादी और शादी की सालगिरह पर श्री कुमार को उनके साला और ससुर ने माइक्रोवेव, सोफासेट, सोनी का एलसीडी, डिजिटल कैमरा, स्टील का अलमीरा, छोटा फ्रीज, स्टडी टेबल, एसी, लैपटॉप गिफ्ट किया था।

पांच अगस्त 2018 का प्रभात खबर डॉट कॉम का तृतीय दृश्य

एप्पल का आइपैड भी उन्हें वर्ष 2014 में साला ने दिया था। साला ने ही उन्हें 2017 में एप्पल का लैपटॉप दिया था। श्री कुमार के चाचा ने उनके और परिजनों को सन ग्लास और लेडिज पर्स भी गिफ्ट किया था। उनके दोस्तों ने कई वाइन और विदेशी शराब गिफ्ट की है। ससुराल से ही श्री कुमार को 10 पीस कलाई घड़ी मिली थी। साथ ही उनके पास…

-पटना आशियाना टावर में 850 वर्ग फीट जमीन

-पाटलिपुत्रा कॉलोनी में 3402 वर्गफीट की संपत्ति

-देवघर में 2625 वर्ग फीट भूमि

-दानापुर में 16 डिसमिल जमीन

-बरियातू में 16 कट्ठा जमीन

-सीतामढ़ी में तीन कट्ठा जमीन

-लखनऊ में दो बीघा जमीन

-पटना में 1210 वर्ग फीट संपत्ति” भी मौजूद है।

अब सवाल उठता है कि जो लोग झारखण्ड में अविनाश कुमार की गतिविधियों को जानते हैं, वे तो यह भी जानते है कि एक बार जब ये पर्यटन विभाग में थे, तो उन्होंने फिल्म नीति तक बनाने का प्रयास कर दिया था और इसके माध्यम से फिल्मकारों से शूटिंग के नाम पर पर्यटनस्थलों से इतने रुपये वसूलनें का सूची जारी किया था कि फिल्मकार ही गुस्से में आ गये और इन्हें अपना पांव खींचना पड़ा, अपना आदेश निरस्त करना पड़ा था, आज भी इनसे पूछा जाय कि आप 1993 बैच के आइएएस है, आपकी क्या कीर्ति रही हैं, उत्तर होगा – शून्य।

अब रांची के महान पत्रकार व अमिताभ के भाई झारखण्ड के आइएएस अविनाश बताये, देश में लोकतंत्र है या पुलिस तंत्र। पुलिस डिसाइड करेगी कि किसे सलामी दी जाये और किसे नहीं। जब जनता ने मताधिकार का प्रयोग कर अपना जनप्रतिनिधि चुना और वह जनप्रतिनिधि बाद में जाकर कोई मंत्रालय संभालता है, या राज्य का मुख्यमंत्री बनता है, या प्रधानमंत्री बनता है, तो आप से यह कहकर सलामी नहीं देंगे कि वो पूर्व में अपराधी रहा है, वो अपराधी है या नहीं हैं, इसका फैसला न्यायालय करेगी, वो सजा मुकर्रर करेगी, क्या करना है, या क्या नहीं करना, वो तय करेगी कि आप सार्वजनिक सभा में राजनीतिज्ञों की तरह बयानबाजी करेंगे।

भाई अगर आपको राजनीतिज्ञ बनना है तो आपको किसने रोक रखा है, लेकिन आइपीएस/आइएएस बनकर सरकारी सेवा के दौरान हर महीने वेतन भी पायेंगे, सरकारी सुविधा भी पायेंगे और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों पर अपना भड़ास भी निकालेंगे, ये दोनों एक साथ नहीं चलेगा। आपको इन दोनों में से किसी एक को चुनना होगा, और उसके लिए आपको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा, और जब आप इस्तीफा नहीं देंगे तो वहां की सरकार का यह पहला दायित्व हैं कि आपको आपकी सेवा से बर्खास्त करें या जबरन अवकाश प्रदान करें ताकि आप अपनी मन-मुताबिक कार्य कर सकें।

आपको मालूम होना चाहिए कि लोक सेवक और जनप्रतिनिधि में आकाश-जमीन का अंतर होता है, लोक सेवक को प्रशिक्षण दिया जाता है, जन-प्रतिनिधि को प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है, लोक सेवक को प्रशिक्षण के दौरान वह सब बताया जाता है कि उसे करना क्या है और क्या नहीं करना है। यही नहीं सेवाकाल के दौरान भी लोकसेवकों को अपने प्रोन्नति को पाने के लिए कई कोर्स और कैडर से गुजरना पड़ता है।

अविनाश कुमार के भाई की तरह कई ऐसे आइएएस/आइपीएस खुद को क्रांतिकारी बताकर खुद सेवामुक्त हुए, उनमें से एक का नाम कन्नन गोपीनाथन, जिन्होंने कश्मीर के कथित मौलिक अधिकारों को छीने जाने पर इस्तीफा दे दिया था, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया जो अमिताभ कुमार ने किया या अमिताभ कुमार के भाई अविनाश कुमार ने कर दिया। हम तो कहेंगे कि हेमन्त सरकार को भी अविनाश कुमार पर एक्शन लेना चाहिए, क्योंकि उन्होंने अपने भाई अमिताभ कुमार की बातों को सर्वाधिक महत्व दिया, और कविता के माध्यम से अपने भाई को महिमामंडित करने का प्रयास किया, जबकि उन्हें ऐसा करने से परहेज करना चाहिए।

देश में एक से एक अधिकारी हुए, जिन्होंने फर्ज व देश के आगे खुद को बलिदान तक कर दिया, पर यहां तो लोग अपने परिवार के आगे देश व फर्ज को कुर्बान कर रहे हैं, अपने परिवार का महिमामंडन कर रहे हैं और इनकी इस महिमामंडन में वे पत्रकार व अखबार भी शामिल है, जिन्हें पता ही नहीं कि देश व फर्ज क्या होता है? आश्चर्य तो यह भी है कि सोशल साइट पर जिन्हें कुछ पता भी नहीं है, वे भाजपा के नेता भी अपने ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ही कटघरे में रख रहे हैं, ये भी बुद्धि की बलिहारी है, प्रमाण आपके सामने हैं।

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