गोड्डा कही महागठबंधन में दरार न डाल दें, सीधे संघर्ष में BJP की हार, त्रिकोणात्मक में जीतेगी BJP

गोड्डा लोकसभा सीट के लिए महागठबंधन में जमकर बवाल चल रहा है, हो सकता है कि गोड्डा को लेकर महागठबंधन में दरार न पड़ जाये, क्योंकि इसको लेकर संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं, बाबू लाल मरांडी ने तो साफ कह दिया कि वे किसी भी कीमत पर गोड्डा लोकसभा सीट को छोड़ना नहीं चाहेंगे, क्योंकि गोड्डा को लेकर उनकी पार्टी ने कड़ी मेहनत की हैं, संघर्ष किये हैं,

गोड्डा लोकसभा सीट के लिए महागठबंधन में जमकर बवाल चल रहा है, हो सकता है कि गोड्डा को लेकर महागठबंधन में दरार न पड़ जाये, क्योंकि इसको लेकर संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं, बाबू लाल मरांडी ने तो साफ कह दिया कि वे किसी भी कीमत पर गोड्डा लोकसभा सीट को छोड़ना नहीं चाहेंगे, क्योंकि गोड्डा को लेकर उनकी पार्टी ने कड़ी मेहनत की हैं, संघर्ष किये हैं, अडानी के पावर प्रोजेक्ट के खिलाफ चलाये गये आंदोलन में उनकी पार्टी को राज्य व केन्द्र की सरकार ने निशाना भी बनाया, जबकि इसी मुद्दे को लेकर अन्य पार्टियां मौन रही।

सूत्र बताते है कि अगर गोड्डा लोकसभा सीट पर झाविमो के प्रदीप यादव और भाजपा के निशिकांत दूबे के बीच सीधी लड़ाई हुई, तो निशिकांत दूबे का जीत पाना या भाजपा को यह सीट निकाल पाना मुश्किल हो जायेगा, लेकिन अगर यहीं सीट कांग्रेस को मिल गई और वहां से फुरकान अंसारी को टिकट मिल गया तो भाजपा हिन्दूत्व लहर पैदाकर जीत सुनिश्चित करने की कोशिश करेगी, जिसमें उसे सफल होने की संभावना थोड़ी बहुत दीखती है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि महागठबंधन में सीधी-सीधी लड़ाई हो जायेगी तो फिर फुरकान अंसारी की जीत को भी कोई रोक नहीं सकता, और अगर कांग्रेस के फुरकान अंसारी तथा झाविमो के प्रदीप यादव तथा भाजपा के निशिकांत दूबे के बीच त्रिकोणात्मक संघर्ष हो गया, तो फिर भाजपा के निशिकांत दूबे की जीत को कोई रोक ही नहीं सकता, उनकी जीत शत प्रतिशत सुनिश्चित हो जायेगी, संभवतः भाजपा भी यहीं चाहती है कि कांग्रेस और झाविमो दोनों अपने-अपने प्रत्याशी खड़े कर दें, ताकि उसकी जीत आसान हो, उसे ज्यादा मेहनत करनी नहीं पड़े।

इधर सूत्र बताते हैं कि गोड्डा की लड़ाई कोई सामान्य लड़ाई नहीं, यह लड़ाई अडानी समर्थन वर्सेज अडानी विरोध से भी जुड़ा है, चूंकि गोड्डा के कई किसान परिवार अडानी द्वारा बनाये जा रहे यहां पावर प्रोजेक्ट का विरोध कर चुके हैं, जिसका समाचार समय-समय पर आता रहा, कई दलों ने तो इस प्रोजेक्ट का कभी मौन समर्थन तो कभी विरोध किया, पर अकेले झाविमो ही ऐसी पार्टी रही, जिसने लगातार इस प्रोजेक्ट का विरोध किया, और उसे उसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा, प्रदीप यादव को कई महीने हवालात में भी रहना पड़ा, जिस कारण जनता की सहानुभूति प्रदीप यादव के तरफ साफ दीखती है।

इधर झाविमो के एक युवा नेता बंधु तिर्की द्वारा ये कहना कि प्रदीप यादव थोड़ा त्याग दिखायें, चूंकि ये सीट कांग्रेस का रहा है, कांग्रेस को दे दिया जाना चाहिए तथा उसका समर्थन करना चाहिए, इस बयान ने झाविमो को एक बहुत बड़ा झटका दिया है, फिर भी बाबू लाल मरांडी ने गोड्डा को लेकर, अपनी जिद नहीं छोड़ी है, ऐसे में कांग्रेस बाबू लाल मरांडी को मनाने में लगी है, वह नहीं चाहती कि बाबू लाल मरांडी जैसे झारखण्ड  के सर्वप्रिय नेता नाराज हो और उसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ें क्योंकि कोलेबिरा विधानसभा उपचुनाव में झाविमो के समर्थन को कांग्रेस महसूस कर चुकी है।

इधर जो राजद कल तक झारखण्ड में एक बहुत बड़ी ताकत मानी जाती थी, आज वह एक-दो सीटों के लिए संघर्ष कर रही हैं, पर कांग्रेस और झामुमो, उसे एक सीट छोड़ दूसरी सीट देने को किसी भी स्थिति में तैयार नहीं, क्योंकि कांग्रेस-झामुमो, झारखण्ड मे राजद की ताकत को बहुत अच्छी तरह आंक चुके हैं, क्योंकि जो कभी राजद के वोटर रहे हैं, वे फिलहाल झाविमो, कांग्रेस, झामुमो में से खुद को जोड़ चुके हैं, जिससे राजद की स्थिति झारखण्ड में अब पहलेवाली नहीं रही, जबकि झाविमो आज भी झारखण्ड में कई स्थानों पर एक बहुत बड़ी ताकत रखती है।

ये अलग बात है कि झाविमो के टिकट पर जीतनेवाले विधायक, कभी भी अपने पार्टी या दल सुप्रीमो के प्रति वफादार नहीं रहे, ये अलग बात है कि आज भी झाविमो के विधायक के दल-बदल संबंधी फैसले पर झारखण्ड विधानसभा स्पीकर ने एक सोची-समझी रणनीति के तहत फैसला सुरक्षित रखा है, जिसका खामियाजा झाविमो को उठाना पड़ रहा है, और इसका सबसे ज्यादा फायदा भाजपा ने उठाया, यहां तक की वह शासनकाल के पांचवे वर्ष में पहुंच गई, अगर स्पीकर दल-बदल में लिप्त विधायकों के खिलाफ फैसला सुनाते भी हैं तो कोई जरुरी नहीं, कि इस फैसले का सुखद परिणाम नजर आयेगा, जो झारखण्ड को नुकसान होना है, वह हो चुका, संस्कार और चरित्र तो कब का बिक चुका हैं, और इसकी खरीद-बिक्री में सभी लिप्त है।

अब ऐसे में क्या कांग्रेस उदारता दिखायेगी? क्या गोड्डा सीट झाविमो को देगी? या कांग्रेस द्वारा चल रहे मान-मनोव्वल पर झाविमो मान जायेगी? क्या राज्यसभा के लॉलीपॉप को झाविमो के नेता स्वीकार करेंगे और फुरकान अंसारी को जीताने के लिए कमर कसेंगे, ये सारे सवाल जितनी जल्दी हल हो जाये, उतनी ही अच्छी है, नहीं तो महागठबंधन में पड़ी दरारें, जितनी चौड़ी होगी, उतनी ही भाजपा की राह आसान होती चली जायेगी। इसे महागठबंधन में शामिल सभी पार्टियों को अच्छी तरह जान लेना चाहिए।

Krishna Bihari Mishra

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