क्या झारखण्ड के CM 50 किलोमीटर की दूरी तय कर मैट्रिक परीक्षा देने गये थे?

क्या राज्य के मुख्यमंत्री या मानव संसाधन मंत्री या शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव या झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल के उच्चाधिकारी मैट्रिक की परीक्षा देने के लिए पचास किलोमीटर की दूरी तय किये थे? या उनके बेटे-बेटियां या पोते-पोतियां या उनके रिश्तेदार पचास किलोमीटर की दूरी तय कर मैट्रिक की परीक्षा देने को तैयार हैं अगर नहीं तो फिर राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे के गरीब छात्र-छात्राओं पर इतना बड़ा जुल्म क्यों?

क्या राज्य के मुख्यमंत्री या मानव संसाधन मंत्री या शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव या झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल के उच्चाधिकारी मैट्रिक की परीक्षा देने के लिए पचास किलोमीटर की दूरी तय किये थे? या उनके बेटे-बेटियां या पोते-पोतियां या उनके रिश्तेदार पचास किलोमीटर की दूरी तय कर मैट्रिक की परीक्षा देने को तैयार हैं अगर नहीं तो फिर राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे के गरीब छात्र-छात्राओं पर इतना बड़ा जुल्म क्यों? क्या ये राज्य सरकार मैट्रिक की परीक्षा भी सहीं ढंग से कराने में असमर्थ हैं? जिस कारण इन बच्चों को पचास किलोमीटर की दूरी तय करवाई जा रही हैं, क्या कोई बच्चा पचास किलोमीटर की दूरी तय कर मैट्रिक की परीक्षा सहीं ढंग से दे पायेगा या फिर परीक्षा देकर घर लौटने पर सही स्थिति में होगा कि दूसरे दिन की परीक्षा की तैयारी भी कर सकें?

रांची के टाटीसिलवे में है राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे। जहां के करीब 119 छात्र-छात्राएँ परेशान हैं। उनकी मैट्रिक की परीक्षा का सेंटर संत जान्स उच्च विद्यालय हुलहुंडू में बनाया गया हैं। छात्र तो परेशान हैं ही, उनके अभिभावक कुछ ज्यादा ही परेशान और चिंतित हैं। सवाल है कि गरीबी के कारण वे राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे में पढ़ा रहे हैं और अब मैट्रिक की परीक्षा दिलाने के लिए पचास किलोमीटर की दूरी तथा बच्चों की मानसिक स्थिति को देख परेशान हैं।

राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे इस इलाके का एकमात्र स्कूल हैं, जहां टाटीसिलवे के आसपास के इलाकों के गरीब बच्चे पढ़ा करते हैं, ढेलुवांखूंटा, उलातू, बाहेया, बोंगई बेड़ा, और  गंगाघाट के आसपास के गरीबों के बच्चे का मुख्य स्कूल यहीं है। अब स्थिति ऐसी है कि एक तो ये हमेशा 20 किलोमीटर की लंबी दूरी तय कर विद्यालय पढ़ने आते हैं, और अब यहां से तीस किलोमीटर की दूरी तय कर जब वे हटिया के हुलहुंडूं पहुंचेगे तो इनकी कुल दूरी पचास किलोमीटर हो जाती हैं। ऐसे में बच्चों की परेशानी बढ़ी सो अलग और अभिभावक परेशान हैं सो अलग, पर इनकी परेशानी को कौन देखेगा, कौन सुनेगा? अगर यहां प्रशासन रहेगा तब न। यहां तो सारा धन बाइस पसेरी वाली हाल है।

बच्चों को परेशानी न हो, इसके लिए अभिभावकों ने आठ मार्च से शुरु हो रही मैट्रिक की परीक्षा के लिए किसी निकटतम स्कूल को सेंटर बनाने का स्थानीय प्रशासन एवं झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल से अनुरोध किया हैं, पर यहां के झारखण्ड एकेडमिक कौंसिल या स्थानीय प्रशासन के कानों पर जूं रेंगेगी, इसकी संभावना कम लगती हैं। अभिभावकों की माने तो इनका कहना है कि अच्छा रहेगा कि राजकीयकृत उच्च विद्यालय टाटीसिलवे के मैट्रिक परीक्षा का सेंटर हंसराज बाधवा, नामकुम या प्रोजेक्ट विद्यालय बरगांवा या किसी ऐसे निकटतम स्कूल में बनाया जाये, ताकि छात्र-छात्राओं को मैट्रिक परीक्षा देने में असुविधा न हो।

Krishna Bihari Mishra

Next Post

अगर आप IAS, IPS या CM हैं तो कानून आपके हाथ में और जनता हैं तो...

Wed Feb 14 , 2018
कमाल हैं, झारखण्ड में अगर आप आईएएस है या आईपीएस है या मुख्यमंत्री है, तो आपको कानून तोड़ने का, कानून का उल्लंघन करने का पूरा अधिकार हैं, अगर आप सामान्य जनता है तो आप समझ लीजिये आपको कानून तोड़ने या कानून का उल्लंघन करने पर आपको जेल में इस प्रकार से सड़ा दिया जायेगा कि आपकी नानी-दादी याद आ जायेगी।

Breaking News