झारखण्ड में सेवा दे रहे मूर्धन्य नेता, मंत्रियों, IAS/IPS, पत्रकारों, जिन्होंने देश की संपदा पर अपना खूंटा मजबूती से गाड़ रखा हैं, उन्हें होली की बधाई

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झारखण्ड में रहनेवाले/सेवा दे रहे मूर्धन्य नेता, मंत्रियों, आइएएस/आइपीएस, अन्य अधिकारियों/पुलिसकर्मियों एवं पत्रकारों जिन्होंने देश की संपदा पर अपना पहला हक जमा रखा हैं, जिन्होंने अपने भ्रष्टाचार से सब की नींद उड़ा रखी हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में कभी भी सत्य बोला ही नहीं, जिन्होंने अपने पद का सदुपयोग अपने ससुर को निगम या बोर्ड का अध्यक्ष बनाने में लगा दिया, जो अपने साला/सालियों, पत्नियों/प्रेमिकाओं, भाभियों/बहुओं, बेटे/बेटियों के आगे सोचा तक नहीं। ऐसे सारे लोगों को विद्रोही 24 की ओर से दिल से होली की बधाई।

आप सभी को होली की बधाई, इसलिए कि आपने ही होली का सही मतलब समझा है, क्योंकि आप ही के घरों में तो होली का असली रसवाला मालपुआ का भोग लगता है, आप ही तो मालपुए का जिंदगी भर आनन्द लेते हैं, बाकी लोग को तो मालपुएं का रस भी मयस्सर नहीं होता, जिसमें आप सभी की ही तो भूमिका निहित होती है।

ठीक वैसे ही जैसे एक बिहार के पत्रकार ने, एक मंत्री की आरती उतारते-उतारते अपने बेटे को बिहार के एक शहर में ही स्मार्ट सिटी का पीआरओ बनवा दिया। जैसे झारखण्ड में ही एक आइएएस को देखा कि वो अपने ससुर को ही एक बोर्ड का अध्यक्ष बनवा दिया। वकील पत्नी को भी भारी-भरकम सुविधा दिलवा दी और कोई चूं तक नहीं बोला। बिहार-झारखण्ड में तो आइएएस/आइपीएस की अवकाश होने के बाद भी लीलाएं चलती रहती है, जैसे कोई जेपीएससी का अध्यक्ष बन जाता हैं, कोई राज्य निर्वाचन आयोग संभाल लेता है, चाहे सरकार किसी की भी हो।

मतलब, ये कुछ उदाहरण है, कि होली के रंग कितने गहरे और किस प्रकार के होते हैं? जैसे एक राजनीतिक पंडित हमसे कल मिले, उन्होंने कभी मुझसे कहा था कि देखियेगा झारखण्ड में जैसे ही सरकार बनेगी, कुछ परिवर्तन दिखेगा, मैंने भी कहा कि हां, वो परिवर्तन जरुर दिखेगा। जो लोग गड़बड़ियां उस समय के नेता के लिए करते थे, अब वो गड़बड़ियां दूसरे नये नेताओं व छुटभैयों के नेताओं के लिए शुरु हो जायेगी। हुआ भी वहीं।

जब वे राजनीतिक पंडित मुझे दिखे, तो उन्होंने हमें देखकर कहा – पंडित जी, होली मुबारक हो। हमने कहा कि आपको हमसे भी ज्यादा मुबारक हो, क्योंकि आपकी तो लॉटरी हर सरकार में लगी ही रहती है, वे ठठाकर हंस पड़े। उन्होंने कहा कि हम तो कहने को आजाद है, हैं तो गुलाम, चाहे वो सरकार किसी की भी हो, क्योंकि इसी गुलामी से तो हमें होली की असली आनन्द की प्राप्ति हो जाती है।

इधर, होली को लेकर, बड़े-बड़े अधिकारियों ने कई-कई अधिसूचनाएं जारी कर दी है, धाराएं लगा दी हैं। बेचारे छोटे अधिकारियों पर आफत आ गई, क्योंकि उन्हें जिम्मेदारियां दे दी गई है। बेचारे वे छोटे अधिकारी क्या करें? हार-थककर अपने परिवारों से दूर बिना मालपूए के रस के ही होली मनायेंगे, और इधर जिन्होंने अधिसूचना जारी की, वे अपने घरों में बैठकर जमकर अपने प्यारियों के गालों पर होली का रंग उकेरेंगे और ये लोगों को बाहर में भी रंग लगाने या लगवाने का मौका नहीं मिलेगा, क्योंकि कोरोना जो हैं।

और ये कोरोना को भी गजब का टशन है, ये राजनीतिक चुनावों में उत्पन्न होनेवाली भीड़ों से नहीं फैलता, ये तो होली और अन्य त्यौहारों पर ही फैलता है, इसलिए बेचारे लोग क्या करेंगे? एक ओर कोरोना महराज तो दूसरा कोरोना और प्रशासन के लठ का भय, होली क्या मनायेंगे खाक। इसलिए होली तो बड़े लोगों की हैं, इसलिए ये लोग जहां मिले, दिल खोलकर कहिये उन्हें, होली की बधाई, मालपुए की बधाई, दोनों हाथों में प्रति दिन माल मिलता रहे, उस माल की कसम, उस मालवाली होली की भी बधाई।

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