भगवान नाम-जप शरीर, मन और आत्मा को ब्रह्माण्डीय चेतना से भर देता है, इसलिए प्रभु को भक्ति-भाव के साथ मन की गहराइयों से भजियेः स्वामी अमरानन्द
रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम के श्रवणालय में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए वयोवृद्ध संन्यासी स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि भगवान के नाम का जप, उनके नाम का संकीर्तन, उनकी स्तुति, ये सारी की सारी चीजें हमारे शरीर, मन और आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध कर देती है, जिससे हमारे शरीर, मन और आत्मा में आध्यात्मिक आनन्द की ऊर्जा का संचार होता है।
उन्होंने योगदा भक्तों के बीच इस बात का रहस्योद्घाटन किया कि परमहंस योगानन्द जी ने आज से ठीक 100 साल पहले 18 अप्रैल 1926 को अमरीका के न्यूयार्क स्थित एक प्रेक्षागृह में पहली बार हजारों अमरीकन नागरिकों के बीच अंग्रेजी भाषा में भगवान का भजन गाया था। बोल थे – ओ गॉड ब्यूटीफुल, ओ गॉड ब्यूटीफुल, एट दाई फीट, ओ आई डू बाउ…, जिसको हिन्दी में – हे हरि सुन्दर, हे हरि सुन्दर, तेरे चरण पर सिर नमो! बोलते हुए गाया जाता है।
उन्होंने कहा कि योगदा भक्तों के लिए यह खुशी की बात है कि उनके गुरु परमहंस योगानन्द जी द्वारा पहली बार गाये गये भजन के आज सौ वर्ष पूरे हुए और हम इसकी 100 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि भगवान नाम का जप हमेशा मन को एकाग्रचित्त करके जपना/भजना चाहिए। उन्होंने कहा यह भजन गुरु नानक द्वारा रचित था, जिसे पहली बार परमहंस योगानन्द जी ने अंग्रेजी में गाया, जिसको संगीतबद्ध किया था रवीन्द्र नाथ टैगोर ने। चूंकि इस गीत में आध्यात्मिकता के भाव का रंग परमहंस योगानन्द जी ने भरा था, इसलिए इस भजन में प्रतिज्ञापन के भाव भी छलकते हुए दिख जाते हैं।
उन्होंने कहा कि भगवान का भजन करने, उनका नाम जप करने के दौरान हृदय में भगवान के प्रति श्रद्धा व भक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। अगर भजन में श्रद्धा व भक्ति का अभाव है, तो वो भजन किसी काम का नहीं है। क्योंकि ये नाम-जप आपके शरीर, मन और आत्मा को ईश्वरीय ब्रह्माण्डीय चेतना से परिपूर्ण करता है, जिससे आपको ईश्वर के साथ एकाकार होने में सफलता मिलती है।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि भगवान का नाम-जप आपके मन की चंचलता पर अंकुश लगाता है। आप अपनी साधना, ध्यान और नाम-जप के द्वारा ईश्वर को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। भगवान नाम-जप आपकी चेतना को एकाग्र करता है। लेकिन हमेशा यह बात याद रखनी है कि भगवान नाम संकीर्तन के समय भगवान के प्रति भाव गहरे होने चाहिए। रामकृष्ण परमहंस के समक्ष मां काली का उपस्थित होना, इस बात का साक्षी था कि रामकृष्ण का उनके प्रति भाव बहुत अधिक गहरा था। वे नित्य प्रति उनका नाम-जप किया करते थे।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि भगवान नाम-जप ब्रह्माण्डीय स्पनन्दन को प्रभावित करता है। यह ब्रह्माण्डीय स्पन्दन दरअसल भगवान नाम-जप, संकीर्तन, भजनादि से ही प्राप्त होता है। यह हमारे शरीर के अंदर जो चक्र हैं। उन्हें स्पर्श करता है। जिससे हमारे शरीर के अंदर जो चक्र होते हैं, वे खुलने लगते हैं। जिससे अपने शरीर के अंदर की सारी बुराइयां स्वतः समाप्त होने लगती है और उनके स्थान पर ईश्वरीय चेतना का प्रार्दुभाव होने लगता है।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि हर कोई योगी बन सकता है। सभी के अंदर वो शक्ति व्याप्त है। जिससे वो योगी बन सकता है। ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। आप भगवान नाम-जप करिये, संकीर्तन करिये, भजन करिये, आपका मन ध्यान में लगना शुरु हो जायेगा, जब ध्यान की गहराइयों को छू लेंगे तो समाधिस्थ होने में आपको समय ही नहीं लगेगा।
उन्होंने उदाहरण के तौर पर दया माता का नाम लिया कि जैसे ही वो कोई भजन सुनती थी। वो सीधे समाधिस्थ हो जाती थी। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार एक बार परमहंस योगानन्द जी भगवान नाम जप कर रहे थे और देखते ही देखते दया माता समाधि में चली गई। उन्होंने कहा कि ईश्वर एक है, लेकिन उनके रूप अनेक हैं। उन्होंने संत रविदास और मीरा बाई के भी प्रमाण दिये कि कैसे उनके द्वारा गाये भजन, उन्हें समाधि की ओर ले जाया करते थे।
स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि आप अपने हृदय की बुराइयों को दूर करिये। उसे स्वच्छ करिये। उसमें ईश्वर के प्रति सुंदर भाव को जन्म दीजिये। लगातार भगवान नाम-जप करते रहिये। अच्छा रहेगा कि आप स्वयं को ही ईश्वर को समर्पित कर दीजिये। ऐसा करने से भला ईश्वर को आपके पास आने से कौन रोक सकेगा?
