राजनीति

अपने दिव्य ज्ञान से बिहार की जनता को रिझाने में लगे शरद

शरद यादव को दिव्य ज्ञान हुआ है, ठीक उसी प्रकार जैसे कभी गौतम बुद्ध को हुआ था, गया के बोधिवृक्ष के नीचे। दिव्य ज्ञान मिलने के बाद से वे उस दिव्यता को जन-जन तक पहुंचाने के लिए बिहार के दौरे पर है, वे गला फाड़-फाड़ कर लोगो को बता रहे है कि वे आज भी महागठबंधन के साथ है। वे यह भी कहते है कि महागठबंधन से रिश्ता तोड़ना बिहार की जनता और बिहार की जनता के जनादेश का अपमान है, पर वे यह डॉयलॉग बोलने के क्रम में भूल जाते है कि आज से ठीक चार साल पहले कभी वे एनडीए के साथ थे और उस वक्त भी एनडीए को छोड़, भाजपा को छोड़ ये महागठबंधन बना लिये थे, तो क्या उस वक्त बिहार की जनता या बिहार की जनता के जनादेश का अपमान नही हुआ था।

अपनी दुकानदारी मजबूत करने में लगे हैं शरद

दरअसल नेता, नेता होता है, वह सिर्फ अपनी दुकानदारी चलाना जानता है, जिसमें उसको मुनाफा हो। शरद यादव को लगता है कि फिलहाल बिहार में सबसे बड़ा दल लालू प्रसाद यादव का राष्ट्रीय जनता दल है और लालू यादव की यादव और मुस्लिम मतदाताओं पर अच्छी पकड़ है, चूंकि शरद यादव जहां से आते है, वहां उनकी कोई हैसियत नहीं, वहां से पंचायत चुनाव भी ये कभी नहीं जीत पायेंगे, पर बिहार में जातिवादी राजनीति में इनकी गोटी फिट हो जाती है, इसलिए वे बिहार से अपना मोह नहीं छोड़ पाते। इन दिनों उन्हें यह भी लग रहा है कि नीतीश कुमार के एनडीए या भाजपा में जाने से नीतीश कुमार का कद छोटा हुआ है, और उनकी राजनीतिक पकड़, बिहार की जनता में ढीली हुई है, इसलिए वे ऐसे में अपना कद उंचा करना चाहते है, वे खूब बिहार के विभिन्न जिलों की यात्रा कर रहे है, तथा लालू और नीतीश को अपना कद दिखाना चाहते है, पर उसमें सफलता की जो रफ्तार है, वह बहुत धीमी है, इसलिए वे बार-बार संवाद कह रहे है कि वे बिहार की जनता की भावनाओं को समझने की कोशिश कर रहे है, दरअसल ये भावना बिहार की जनता की नहीं, स्वयं शरद यादव की है कि वे कहां रहेंगे तो लोकसभा या राज्यसभा में आसानी से पहुंच जायेंगे। नीतीश ने तो उन्हें बॉय-बॉय कब का कर दिया, अब उनका एकमात्र सहारा लालू प्रसाद दीख रहा है और यहीं कारण है कि उन्होंने राज्यसभा में भी लालू प्रसाद और महागठबंधन का साथ नहीं छोड़ा।

विवादास्पद विवाद देने में उस्ताद है शरद

शरद यादव अपने विवादास्पद बयानों के लिए पूरे देश में जाने जाते है, जरा उनके पूर्व के बयानों पर नजर डालिये। वोट की कीमत बेटी की इज्जत से बढ़कर है, पैसे की बदौलत आज वोट खरीदा और बेचा जा सकता है। शरद यादव ने कहा – “बैलेट पेपर के बारे में समझने की जरुरत है लोगों को। बेटी की इज्जत से वोट की इज्जत बड़ी है। बेटी की इज्जत जायेगी तो गांव और मोहल्ले की इज्जत जायेगी, अगर बोट बिक गया तो देश की इज्जत जायेगी।”

ये वहीं शरद यादव है, जिन्होंने राज्यसभा में बीमा विधेयक की चर्चा के दौरान दक्षिण भारतीय महिलाओं पर गंदी टिप्पणी कर दी थी, जिससे देश का राजनीतिक माहौल गरमा गया था। उनके इस कथन पर जब स्मृति ईरानी ने कड़ी टिप्पणी की, तब शरद ने कहा था कि वे जानते है कि आप क्या है?  ये शरद यादव की मानसिकता को उजागर करता है।

एक बार तो उन्होंने भोलेनाथ के भक्तों/कावड़ियों पर ही कड़ी टिप्पणी कर दी कि जिनके पास कोई काम धंधा नहीं होता, वहीं हरिद्वार जाते है, और शरद जी, आम जनता यह भी जानती है कि जो कहीं फिट नहीं होता, वो आप जैसा धूर्त राजनीतिज्ञ भी हो जाता है।

हमारा मानना है कि किसी भी राजनीतिज्ञ को अपनी भाषा पर ध्यान देना चाहिए, तथा जो राजनीतिक शुचिता की बात करें, वो अपने पूर्व की हरकतों पर भी ध्यान रखे कि उसने पूर्व में क्या गुल खिलाये हैं, ताकि लोग जान सकें कि वर्तमान में जो राजनीतिज्ञ डींगे हांक रहा है, उसका डींग हांकना कहा तक जायज है?