अपनी बात

मणिपुर हो या बंगाल या राजस्थान, किसी भी दल को महिलाओं के उपर हो रहे अत्याचार पर बोलने का नैतिक अधिकार नहीं, नैतिकता तो कहती है कि इन्हें शर्म से डूबकर मर जाना चाहिए

उधर महिलाओं के साथ भीड़ घिनौनी हरकत करती हैं। उसके वस्त्र उतारती हैं। महिलाएं चिल्लाती हैं, मदद की गुहार लगाती हैं, पर कोई उसे मदद नहीं करता, बल्कि उस भीड़ में शामिल कोई वीडियो बना रहा होता है और अपने मनमुताबिक उस वीडियो को वायरल करता है। जैसे ही वीडियो वायरल होता है। तो न्यायालय के न्यायाधीश सक्रिय हो जाते हैं। वे सारे राजनीतिक दल जिनके राज्य में खुद ही महिलाएं असहाय और असुरक्षित रहती है। वे अपनी सुविधानुसार राजनीतिक बयानबाजी करते है।

संसद ठप कर दिया जाता है। लेकिन कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता कि आखिर यह समाज इतना नीचे कैसे चला गया? इतना पतित कैसे हो गया? इसे इतना पतित करनेवाला कौन है? उसे ढूंढा नहीं जाता और न इसकी इलाज की जाती है, बल्कि इसे मुद्दा बनाकर अपने हिसाब से राजनीतिक रोटी सेंकी जाती है, ताकि आनेवाले विधानसभा व लोकसभा चुनाव में अपने-अपने अनुसार राजनीतिक रोटियां सेंकी जा सकें।

सच्चाई यह है कि मणिपुर में जो कुछ हुआ, उससे पूरा देश हिल गया। लेकिन बंगाल, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में जहां हुआ। स्वयं झारखण्ड में कई लड़कियां यौन शोषण की शिकार हो गई, मार दी गई, उस वक्त सब के होठ क्यों सीलें हुए थे, जो आज चीत्कार कर रहे हैं। भाई लड़कियों और महिलाओं पर होनेवाले अत्याचारों पर इतना विभेद क्यों?

राजस्थान व छत्तीसगढ़ में जब इस प्रकार की घटना घटे तो कांग्रेस वाले मुंह क्यों सील लेते है? बंगाल में जब महिलाओं के साथ मणिपुर जैसी घटनाएं घट गई तो तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी तथा इनसे सहयोग लेकर भाजपा को 2024 में परास्त करने का ख्वाब देखनेवाली पार्टियां क्यों चुप्पी लगा गई? राजस्थान में तो कांग्रेस के ही एक कैबिनेट मंत्री ने सदन में ही अपने सरकार की क्लास लगा दी और कह दिया कि राजस्थान में कोई महिला सुरक्षित नहीं। महिला अपराध में राजस्थान इस देश में नंबर एक पर है। उस मंत्री के इस सच बोलने का परिणाम क्या हुआ। उसे मंत्रिमंडल से ही धक्का मारकर निकाल दिया गया। मतलब गजब की राजनीति है।

मतलब यहां अगर दलितों-आदिवासियों या उनकी बेटियों व महिलाओं पर अत्याचार हो तो राजनीतिक दल ये देखते है कि वहां किसकी सरकार हैं और जो वहां का विरोधी दल है, वो इस मुद्दे को अपने हिसाब से उठाता हैं, बाकी सभी चुप्पी लगा जाते हैं। भाई, इस प्रकार की निर्लज्जता की सीख कहां से मिलती है। जरा बताइये न, और लोग भी सीख लें। कम से कम इस प्रकार की घिनौनी हरकत तो बंद होनी ही चाहिए।

मणिपुर में जो हुआ। उसको लेकर तो कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और अन्य भाजपा विरोधी पार्टियों के नेताओं के बयान तो खुब आये, पर जैसे ही बंगाल और राजस्थान की बारी आई। इन नेताओं के बयान कहीं भी दिखाई नहीं पड़े और न ही सुनाई पड़े। आश्चर्य है कि मणिपुर कांड पर तो सुप्रीम कोर्ट भी सक्रिय हो गई, लेकिन अन्य राज्यों में होनेवाले अत्याचारों पर उसका कोई रुख नहीं दिखा। दरअसल यही अपराध के बढ़ने का मूल कारण है।

सच्चाई यह है कि अपने देश में इस प्रकार की घटना कोई पहली बार नहीं हो रही और कोई राजनीतिक पार्टियां अथवा न्यायालय इस बात का दावा भी नहीं कर सकता है कि इस देश में इस प्रकार की घटनाएं आनेवाले समय में नहीं होगी। याद करिये दिल्ली का निर्भया कांड और याद करिये असम में कई वर्ष पूर्व एक आदिवासी महिला के साथ हुआ वो घिनौना अत्याचार, जिसको लेकर पूरा देश हिल गया था। क्या वो घटनाएं छोटी थी। अगर उस घटना के बाद भी मणिपुर और बंगाल में इस प्रकार की घटना घट गई तो ये बताने के लिए काफी है कि अपना देश महिलाओं की सुरक्षा देने में कितना नीचे गिर चुका है।

दरअसल, आजकल मैं देख रहा हूं कि अपने समाज में नाना प्रकार की विकृतियों ने जन्म ले लिया है। पहले गांव-मुहल्ले के एक परिवार में जैसे ही एक बालक या बालिका का जन्म होता था तो उस नवजात शिशु का एक प्रकार का रिश्ता भी सामाजिक तौर पर जन्म ले लिया करता था। आज क्या है? सभी लेडीज व जेन्टलमेन बनने में विश्वास कर रहे हैं और रिश्ते गायब होते चले गये।

दूसरा सब के हाथ में मोबाइल हैं। क्या छोटा, क्या बड़ा? पर वे इस मोबाइल से कर क्या रहे हैं, न तो बड़ों को पता है और न छोटों को। परिवार के लोग तो बड़े आराम से इंटरनेट के साथ छोटे बच्चों को मोबाइल थमा रहे हैं, और बच्चे इसी के साथ बच्चे न होकर अधकचरे हो जा रहे हैं, जिसका प्रभाव यह है कि समाज नीचे गिरता चला जा रहा है।

तीसरा आज किसी भी स्कूल में चले जाइये। कही भी नैतिक शिक्षा नहीं दी जा रही। सभी बच्चों को एटीएम मशीन बनाने की शिक्षा दी जा रही है। बच्चे अपने ही देश के महान वीर बालक-बालिकाओं व देशभक्तों के जीवन और उनकी कीर्तियों से अनभिज्ञ हैं और इंटरनेट पर पड़े अधकचरे ज्ञानों से स्वयं को परिपक्व करने में लगे हैं, नतीजा वे बचपने से ही मानसिक विकृतियों के शिकार हो रहे हैं।

याद करिये, पहले दादा-दादी व नाना-नानी से जुड़कर बच्चे किस प्रकार कविता-कहानियों के माध्यम से स्वयं को मजबूत करते थे। आज क्या है, बस बच्चा रो रहा है। मोबाइल थमा दो। बच्चा दूध नहीं पी रहा। मोबाइल थमा दो। बच्चा बात नहीं सुन रहा। मोबाइल थमा दो और जैसे ही उसकी मोबाइल की लत लग गई तो लगे हाथों उसके हाथों में चश्मा भी थमा दो। जब चश्मा लग गया तो फिर क्या हैं, वो वहीं देखेगा जो उसे चश्मा दिखायेगा। नतीजा परिवार, समाज व देश हाथ से निकलता चला जा रहा।

जरा पूछिये न, उन नेताओं से, जो विवाहित हैं या अविवाहित नहीं हैं वे अपने आप को कैसे रख रहे हैं? सब वशिष्ठ और महर्षि अगस्त्य हो गये हैं क्या? वे खुद अपने दिल पर हाथ रखकर बताये कि वे कितने प्रतिशत नैतिक हैं? सच्चाई यही है कि हमने नैतिकता को किसी दुकान पर जाकर बेच दिया है। अनैतिक हो चुके हैं। हम आकंठ भ्रष्टाचार में डूबकर, अपनी नैतिकता को, अपनी संस्कृति को स्वयं अपनी हाथों से मार डाला है। उसका श्राद्ध कर डाला है।

ऐसे में इस प्रकार की घटनाओं को रोक लगाना मुश्किल ही नहीं, बल्कि नामुमकिन है। कल असम, फिर दिल्ली, उसके बाद मणिपुर और अब राजस्थान, बंगाल, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में जो घटना घट रही हैं, हो सकता है कि इस पंक्ति में कोई दूसरा राज्य आ खड़ा हो। इसलिए सबसे पहले यहां के राजनीतिक दलों के नेता स्वयं नैतिक रुप से मजबूत हो। विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को बढ़ावा दें।

किसी भी हालत में राजनीतिक दल अपनी पार्टी के टिकट उन लोगों को न दें, जिन पर घटिया स्तर के केस चल रहे हो। समाज जगे और ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार करें जो महिलाओं को सम्मान नहीं देते हो। जो महिलाओं को भीड़ से बचाने के बदले, उसका वीडियो बनाते हो, शेयर करते हो और उसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए राजनीतिक दलों से सौदा करते हो।

अंत में, हर संभ्रांत परिवार को चाहिए कि अपने घर के बच्चों पर नजर रखें। वे ध्यान रखें कि उनके बच्चे दिन भर करते क्या हैं? किससे मिलते हैं? कहां और किसके बीच समय बिताते हैं? कहीं वे गलत मार्ग तो नहीं अपना रहे, अपने आस-पास विभिन्न परिवारों का एक ऐसा समूह बनाएं जो एक दूसरे के बच्चों पर विशेष रुप से ध्यान दें, क्योंकि यही बच्चे कल बड़े होंगे, अगर अच्छे होंगे तो समाज व देश बनेगा, नहीं तो समाज व देश दोनों कलंकित होगा। हम कही मुंह दिखाने के लायक नहीं होंगे।