जब तक पूजा व पंडाल के नाम पर धंधा करनेवाले और पुरस्कार पानेवाले समितियों का समूह समाज में जीवित रहेगा, तब तक प्रभात खबर जैसे अखबार फलते-फूलते रहेंगे
जब तक पूजा व पंडाल के नाम पर धंधा करनेवाले और पुरस्कार पानेवाले समितियों का समूह समाज में जीवित रहेगा, तब तक प्रभात खबर जैसे अखबार फलते-फूलते रहेंगे। ऐसे अखबारों को समाज और पूजा समितियों से जमकर खाद-पानी मिलता रहेगा। अखबार वाले ऐसे कार्यक्रम आयोजित करते रहेंगे और इन्हें पीतल के टुकड़े थमाकर, थोड़ा नाश्ता-पानी का इंतजाम करवाकर, अपना उल्लू-सीधा करते रहेंगे।
ऐसे अखबारों को बड़ी संख्या में स्पॉन्सर भी मिलते रहेंगे, जो उन्हें इन सबके लिए मुंहमांगी रकम उपलब्ध कराते रहेंगे। वो भी कोई एजुकेशन पार्टनर के नाम पर, कोई सपोर्टिंग पार्टनर के नाम पर, कोई हॉस्पिटैलिटी पार्टनर के नाम पर, कोई स्टाइल पार्टनर के नाम पर, कोई लेडिज वीयर साड़ी केन्द्र आदि के नाम पर तो कोई अपैरल पार्टनर के नाम पर। आश्चर्य इस बात की है कि सभी जानते हैं कि जब समाज और समितियां पुरस्कार की लालची हो जाती है, तो फिर उस समाज को पतन के कगार पर पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगता, फिर भी ये पुरस्कार ले-दे के नाम पर यह धंधा रुकने का नाम नहीं ले रहा।
अब सवाल उठता है कि क्या ये पूजा समितियां रांची में भव्य पंडाल इसीलिए बनाती है कि वे इसके नाम पर अखबारों से पुरस्कृत होंगी? क्या ये पूजा समितियां मां दुर्गा और उनके परिवार की भव्य प्रतिमाएं इसलिए बनाती है कि वे इसके नाम पर अखबारों से पुरस्कृत होंगी? क्या ये पूजा समितियां इसलिए अपने यहां पूजा-पाठ कराती है कि वे इसके नाम पर अखबारों से पुरस्कृत होंगी? और जब आप पुरस्कार पाने के लिए ही यह सब करते हैं तो फिर यह दुर्गा पूजा रहा कहां?
और जब दुर्गा पूजा रहा ही नहीं, तो फिर यह पूजा के नाम पर समितियों का नाम क्यों? आनेवाले समय में जितनी भी पूजा समितियां जो कल प्रभात खबर द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पुरस्कार पाई है। उन्हें अपना नाम बदलकर भव्य पंडाल निर्माण समिति, प्रतिमा निर्माण समिति, प्रभात खबर पुरस्कार प्राप्तार्थ समिति रख लेना चाहिए। ताकि उनकी समितियां नाम के अनुरूप जनता के समक्ष जा सकें और लोग भी भावना में नहीं बहे। वे समझ जाये, कि जो भी ये पूजा के नाम पर उन्हें जो देखने को मिल रहा है। वे सिर्फ प्रभात खबर या जो अखबार इस प्रकार के पुरस्कार ले-दे कार्यक्रम चलाती है। उसी के लिए यह तैयारी की गई है।
आश्चर्य होता है कि प्रभात खबर के लाइफ सिटी पेज पर जो लोग पुरस्कार लेते हुए गर्व महसूस कर रहे हैं। उन्हें ये पता नहीं कि वे धर्म का मजाक उड़ा रहे हैं। दुर्गा माता का मजाक उड़ा रहे हैं। उनके नाम पर होनेवाली पूजा का मजाक उड़ा रहे हैं। दूसरे धर्मवाले जब इनकी ये हरकतें देखते होंगे तो वे जरुर कहते होंगे कि क्या ये पूजा ये लोग इसीलिये करते हैं। पूजा तो ईश्वर की प्राप्ति के लिए होती है। पूजा तो अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के लिए होती है, पूजा पुरस्कार पाने के लिए कब से हो गई?
प्रभात खबर के इसी पृष्ठ पर देख रहा हूं कि एक नमूना दो संस्थाओं की ओर से पुरस्कृत हो रहा है। कहने को तो वो यह भी कह सकता है कि वो दोनों संस्थाओं से जुड़ा था। इसलिए दो जगहों पर उसका फोटो देखा जा सकता है। अरे भाई, दो क्या आप सभी जगह घुस जाओ, पुरस्कार ही तो लेना है, थोड़े ही तुम परमानन्द को प्राप्त करने जा रहे हो या मोक्ष प्राप्त करने जा रहे हो। भगवान जिससे बुद्धि हर लेते हैं। उसको तो यही सब देते हैं और जिनको ज्ञान दे देते हैं, वो व्यक्ति या वो संस्था या वो समिति प्रभात खबर या उसके द्वारा आयोजित या उसमें भाग लेनेवाले स्पांन्सरों के हाथों पुरस्कृत होने थोड़े ही जायेगा।
वो तो भगवती की शारदीय नवरात्र में जो उसने परमानन्द को प्राप्त किया है। उसे संग्रहित करने और उसे और कैसे बढ़ाया जाये। इस पर ज्यादा ध्यान देगा। नहीं तो, बताओ, दुर्गा सप्तशती के किस मंत्र में लिखा है कि दुर्गा पूजा, पूजा के नाम पर, अखबारों द्वारा दी जानेवाली पुरस्कार प्राप्त करने के लिए की जाती है।
