खबर का क्या, खबर तो चलकर मेरे पास आती है, सचिवालय तो इसलिए जाते हैं कि लोगों से भेंट मुलाकात हो जाती हैं, अगर ये सोच है पत्रकारों की, तो सचिवालयों में ऐसे लोगों के प्रवेश पर रोक लगाना जरूरी हो जाता है
एक पत्रकार का वक्तव्य है – खबर का क्या है… खबर तो चलकर पत्रकार के पास आती है… सचिवालय तो इसलिए जाते हैं कि लोगों से भेंट मुलाकात हो जाती हैं… समझे। अब सवाल है कि क्या सचिवालय कोई ठंडी सड़क है, क्या सचिवालय कोई भेंट मुलाकात की जगह है और जब सचिवालय इस सबके लिए बना ही नहीं, तो फिर आपके दिमाग में इस प्रकार का फितूर कहां से आ गया?
क्या आपके दिमाग में आई इस प्रकार के फितूर के लिए सचिवालय को आपको उपयोग करने दिया जाये। ऐसा तो होगा नहीं और न कोई सरकार ऐसा आपको करने देगी और जब सरकार एक्शन लेगी तो आप बिलबिलायेंगे ही। आपको बिलबिलाना भी चाहिए। दरअसल सच्चाई यही है कि कुछ महीने पहले तक झारखण्ड के धुर्वा में स्थित प्रोजेक्ट बिल्डिंग व नेपाल हाउस में चल रहे सचिवालय में पत्रकारों और उनके कैमरामैन व यूट्यूबरों को आने-जाने में कोई रोक-टोक नहीं था।
वे जितना मन करता, वहां पड़े रहते और वहां आनेवाले मंत्रियों व अधिकारियों से गेट या उनके कक्ष में जाकर बातें करते, बाइट लेते और फिर अपने समयानुसार अपने ऑफिस तक चल देते। कई-कई चैनल के लोग, जो अपने संवाददाताओं-कैमरामैन को पैसे भी नहीं देते, वे भी अपने लोगों को इन सचिवालयों में सुबह के दस बजे से लेकर सायं/देर रात तक बैठाये रहते। चाहे सचिवालय में खबर रहे या नहीं रहे।
ये उस समय की बात है, जब इक्के-दुक्के राज्य में चैनल हुआ करते थे। लेकिन जब से सोशल मीडिया का जमाना आया। तब इतने चैनल और पोर्टल हो गये कि पूछिये ही मत। इन चैनल-पोर्टलों का केवल आप नाम सुनेंगे तो हंसते-हंसते लोट-पोट हो जायेंगे और जब इनके मुख से सवाल सुनेंगे या किसी विषय पर चर्चा सुनेंगे तो मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आप अपना सिर पकड़ लेंगे या आपको देर-सबेर नाना प्रकार की मानसिक बीमारी जरूर पकड़ लेंगी।
लेकिन फिर भी ये चैनल-पोर्टल, यू-ट्यूब की सहायता से खूब फल-फूल रहे हैं। ये फलेंगे-फूलेंगे भी, क्योंकि वर्तमान में जो नई पौध आई है। उसे न तो संस्कार से मतलब है, न चरित्र से मतलब है और न ही देश-समाज के भविष्य से उसे चिन्ता है। उसका मतलब सिर्फ यह है कि पैसे कैसे आयेंगे? इसके लिए ये कुछ भी करने को तैयार है। उसका परिणाम है कि जो सही मायनों में पत्रकार है, वे अपना सम्मान बचाने की जुगत में लग चुके हैं।
कभी इसी झारखण्ड में मैंने देखा था कि इक्के-दुक्के पत्रकार होने के कारण, तो हाल यह था कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री आवास में भी कभी किसी पत्रकारों को मुख्यमंत्री से मिलने के लिए नाक रगड़ना नहीं पड़ा। प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के समय तो उनका गेट हमेशा पत्रकारों के लिए हर समय खुला रहता था। यही हाल अर्जुन मुंडा तक था। स्थिति ऐसी रही कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र तो मुख्यमंत्री आवास के अंदर तक अपने सीएम आवास घेराव की घोषणा के समय प्रवेश कर गये थे।
लेकिन आज वैसी स्थिति मुख्यमंत्री आवास में भी नहीं हैं। उसका मूल कारण कुकुरमुत्ते की तरह बेसिर-पैर के चलनेवाले चैनल हैं। जिनके कारण उन अखबारों/चैनलों व पोर्टलों को भी तकलीफें उठानी पड़ रही हैं, जो सही मायनों में पत्रकारिता की कैटेगरी में फिट बैठते हैं। अब कल की बात लीजिये। जो आईपीआरडी के लोगों ने विद्रोही24 को बताया, उसके अनुसार कल हेमन्त सोरेन की कैबिनेट की बैठक थी। बैठकोपरांत मीडिया को संबोधित किया जाना था। मीडिया के लोग वहां पहुंचे भी।
लेकिन वे समय से पूर्व पहुंचे थे। लेकिन जब कैबिनेट की बैठक समाप्त होने के बाद जब पत्रकारों को संबोधित किया जाना था। तब पत्रकारों-यूट्यूबरों का दल सचिवालय के अंदर समाचार संकलन करने के लिए नहीं गया। कारण – पत्रकारों को जब बुलाया गया, तो वे नाराज थे और कैबिनेट की बैठक के समाचार को संकलन करने से इनकार कर रहे थे। दो मंत्री भी उन्हें मनाने पहुंचे, तब भी वे सचिवालय के अंदर नहीं गये।
दरअसल सच्चाई यही थी कि यहां के यूट्यूबर व पत्रकार तो इधर हेमन्त सरकार के कुछ निर्णयों से पूर्व से ही नाराज चल रहे थे और कल उनको नाराजगी दिखाने का एक अच्छा अवसर मिल गया। जिसका सभी ने फायदा उठाया। फायदा वे भी उठाये, जिनको इस नाराजगी से कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसे लोग अपने सोशल साइट पर सरकार के खिलाफ लंबी-चौड़ी आलेख भी लिखी।
आप जान लीजिये। ये दृश्य एक न एक दिन होना ही था। जो कल दिखाई पड़ गया। आज के तथाकथित पत्रकार व यूट्यूबरों की फौज चाहती हैं कि उसे पूर्व की तरह बेखौफ सचिवालय के अंदर कैमरों व मोबाइलों को लेकर घूमने दिया जाये। उन्हें अपने मनपसंद अधिकारियों-मंत्रियों से वार्तालाप करने दिया जाये। लेकिन हमें लगता है कि राज्य के मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और उनके मातहत काम करनेवाले अधिकारियों व दल के लोगों ने कानून का रास्ता पकड़ा है।
शायद उन्होंने पता लगा लिया है कि देश के अन्य 28 राज्यों व आठ केन्द्र शासित प्रदेशों में भी इस प्रकार की स्थिति नहीं हैं, जैसा कि झारखण्ड में देखने को मिल रहा। देश के लोकसभा सचिवालय हो या राज्यसभा सचिवालय, दिल्ली की विधानसभा हो या उत्तर प्रदेश की विधानसभा या बिहार की विधानसभा का सचिवालय आप किसी भी सचिवालय में पत्रकारों को कैमरा लेकर घूमते हुए नहीं देख सकते और ही किसी को ऐसा करने की अनुमति हैं।
इस सचिवालय क्षेत्र में वे ही जा सकते हैं, जिनके पास राज्य सरकार द्वारा जारी अधिमान्यता प्रमाण पत्र हो या पीआईबी द्वारा जारी प्रमाण पत्र हो। अधिमान्यता प्रमाण पत्र या पीआईबी द्वारा जारी प्रमाण पत्र होने के बाद भी, इस सचिवालयों में जाने की अनुमति तभी मिलेंगी, जब आपको इन सचिवालयों से आमंत्रण मिला हो या किसी अधिकारी या मंत्री ने आपको अनुमति दी हो। बिना किसी आमंत्रण या अनुमति के आप इन सचिवालयों में नहीं जा सकते।
जब इन सचिवालयों में ऐसा हो सकता हैं तो झारखण्ड के सचिवालयों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता। दरअसल इस हेमन्त सरकार ने यही बात यहां के पत्रकारों व मीडिया हाउसों को बतानी चाही है। चूंकि ये शुरुआत है। शुरुआत में तो हर अच्छी चीजों का प्रतिकार होता है। यहां भी प्रतिकार देखा जा रहा है। लेकिन, अगर सरकार और उनके अधिकारी इस प्रचलन को चलाने में मजबूती से डटे रहे तो ये प्रचलन चलेगा। अगर इन मीडिया हाउसों व यूट्यूबरों के आगे झुके तो ये और झूकायेंगे। अब झूकने को कौन तैयार है? यहीं देखना बाकी है।
