रांची प्रेस क्लब चुनाव में हारे हुए कैंडिडेटों से अपील, ज्यादा दुखी मत होइये, पत्रकार-मतदाताओं के फैसले को बिना किन्तु-परन्तु के सहर्ष स्वीकार करिये

जब आप लोकतांत्रिक पद्धति को चुनते हैं, तो याद रखिये, लोकतांत्रिक पद्धति में हारे या जीते हुए प्रतिनिधि मतदाताओं द्वारा लिये गये फैसलों के आगे सर झूकाते हैं, न कि उनके फैसलों पर अंगूलियां उठाते, या उनके फैसलों की नुक्ताचीनी करते हुए स्वयं को बेहतर कहने की हिमाकत करते हैं। मैं देख रहा हूं कि रांची प्रेस क्लब की चुनाव प्रक्रिया समाप्त हुए पांच दिन बीतने को आये, पर हारे हुए प्रतिनिधि अभी भी अपनी हार को स्वीकार करने के मूड में न होकर, मतदाताओं के फैसलों पर ही अंगूलियां उठा रहे हैं।

स्वयं को सर्वाधिक योग्य मानने से नहीं चूक रहे हैं, तरह-तरह के बयानबाजी सोशल साइट पर लिख रहे हैं और उनमें से कुछ फिर उसे स्वयं मिटा भी रहे हैं। अब सवाल उठता है कि जब आप इतने महान हैं और योग्य हैं तो फिर आप सोशल साइट पर खुद के लिए लिखे वाक्यों को मिटा क्यों रहे हैं, उन्हें रहने दीजिये न, ताकि लोग आपके अंदर छूपे भाव को ठीक से पहचान सकें।

जरा देखिये, एक हारे हुए कैंडिडेट ने लिखा कि उसे जितने भी वोट मिले हैं, उसका वो प्रतिनिधि हैं और उसके प्रतिनिधि जीता हुआ प्रतिनिधि है, बाद में उक्त हारे हुए कैडिडेट ने उस पोस्ट को ही मिटा दिया।  इसी तरह एक हारे हुए कैडिंडेट ने अपने पोस्ट पर लंबा-चौड़ा पोस्ट किया कि वो जीता हुआ था, पर उसे काउंटिंग में हरा दिया गया, मतलब उसके कहने का लब्बोलूआब यह था कि उसके वोटों को भी जीते हुए कैडिंडेट में मिला दिया गया और उसे हरा दिया गया।

एक हारे हुए कैंडिडेट ने सोशल साइट पर लिखा कि उसने पत्रकारों में दोस्त से अधिक दुश्मन बना लिया है, इसलिए वो पत्रकारों का चुनाव नहीं जीत सका, अब भला ऐसा भी होता है क्या, आप ये क्यों नहीं सोच रहे कि मतदाताओं को आपसे बेहतर विकल्प कोई दूसरा लगा, उसे अपना प्रतिनिधि चुन लिया, इसमें दोस्ती-दुश्मनी कहां से आ गई।

एक हारे हुए कैडिंडेट को तो पत्रकार-मतदाताओ में धोखेबाज भी दिख गया, वह आगे लिखता है कि उसे इस परिणाम की उम्मीद नहीं थी, जाहिर है वह चाहता था कि जीत उसकी ही हो, पर ऐसा तो आजतक नहीं हुआ कि आदमी जो सोचे और हमेशा वहीं हो जाये, कभी उसकी सोच के विपरीत भी फैसले आते हैं, पर ये क्या वह तो हिसाब करने की भी बातें करता है।

ऐसे अनेक हारे हुए कैंडिडेट हैं, जो अपने-अपने ढंग से अपनी हार का विश्वलेषण करते हुए, अपने मनोभाव को सोशल साइट पर प्रकट कर रहे हैं, मैं जानबूझकर उनका नाम और उनके सोशल साइट पर लिखे बातों को यहां नहीं प्रकट कर रहा हूं, क्योंकि मेरा मकसद किसी की इज्जत से खेलना नहीं, बल्कि मैं चाहता हूं कि वे अपने मन-मस्तिष्क को और विस्तृत करें, दुनिया में हार-जीत बड़ी नहीं, लोगों का दिल जीतना बड़ा होता हैं।

पर इसी हार-जीत पर एक और बात याद आ गई, एक हारे हुए कैडिंडेट ने लिखा कि वो चुनाव हारा, पर दिल जीत लिया। अब सवाल उठता है कि आप स्वयं कैसे निर्णय कर लिये कि आप चुनाव भी हार गये और दिल भी जीत लिया, ये तो आपके चाहनेवाले कहेंगे कि आपने दिल जीता भी या नहीं, आप स्वयं को स्वयं के द्वारा प्रशस्ति पत्र कैसे दे सकते हैं।

अंत में किसी को देवदास या मजनूं बनने की जरुरत नहीं हैं, किसी को ये गाना गाने की जरुरत नहीं कि “सब कुछ सीखा हमने, न सीखी होशिय़ारी, सच है दुनियावालों की हम हैं अनाड़ी” ऐसा नहीं की जो जीत जाता हैं वो महान होता हैं और जो हारता है वो अनाड़ी हो जाता है, कभी आप भी तो जीत का स्वाद चखे थे और आज हार आपको नसीब हुई। इसलिए याद रखिये…

सम्पति या सम्मान आये या चली जाये, दोनों अवस्थाओं में महान पुरुष एक ही अवस्था में होते हैं, ऐसा नहीं कि सम्पति या  सम्मान मिलने पर उछल जाते हैं और न मिलने पर दुखी हो जाते हैं, क्या आपको नहीं पता कि सूर्य डूबे या उदय हो, दोनों अवस्थाओं में वो लाल ही दिखता हैं। इसलिए आप सभी पत्रकार हैं, आप सभी बुद्धिजीवी है, शोक में मत डूबिये, कल नये वर्ष का पहला सूर्योदय होगा, नये जीवन-सूत्र से अपने मार्ग को प्रशस्त करिये, आगे बढ़िये।

Krishna Bihari Mishra

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