“अंगूली मत कर” या “वोट मत कर” या “वोट कर”, रांची में लगे एक होर्डिंग को देख मतदाता कन्फ्यूज्ड

बिहार में एक लोकोक्ति है, आपने जरुर ही सुनी होगी। वह लोकोक्ति है कि “सब कुत्ता काशी चल जायेगा, तो हड़िया कौन ढनढनायेगा?” और ठीक इसी पैटर्न पर मैं कहता हूं कि दुनिया के सभी लोग विज्ञापन एक्सपर्ट ही हो जायेंगे तो जमीन पर पड़ी जनता को सही बात कौन समझायेगा? कहने का मतलब, कोई जरुरी नहीं कि आप जो समझ रहे हैं, या जो जनता को समझाना चाह रहे हैं, वो जनता समझ ही रही हैं,

बिहार में एक लोकोक्ति है, आपने जरुर ही सुनी होगी। वह लोकोक्ति है कि “सब कुत्ता काशी चल जायेगा, तो हड़िया कौन ढनढनायेगा?” और ठीक इसी पैटर्न पर मैं कहता हूं कि दुनिया के सभी लोग विज्ञापन एक्सपर्ट ही हो जायेंगे तो जमीन पर पड़ी जनता को सही बात कौन समझायेगा? कहने का मतलब, कोई जरुरी नहीं कि आप जो समझ रहे हैं, या जो जनता को समझाना चाह रहे हैं, वो जनता समझ ही रही हैं, कभी आपके द्वारा जारी विज्ञापन भद्दे मजाक या फूहड़ प्रसंग बनकर रह जाते हैं और लोग उस पर गंदे कमेन्ट्स भी करते हैं तथा अंत में आपकी सोच और प्रस्तुतिकरण पर अंगूलियां तक उठा देते हैं।

हम बात कर रहे हैं, रांची के अलबर्ट एक्का चौक के पास बने साइकिल स्टैंड के पास की होर्डिग की। यह होर्डिंग रांची के रेडियो सिटी वालों ने लगवाई है। इस विज्ञापन में उपर में लिखा है कि रेडियो सिटी की आर जे सान्वी कहती है। एक अंगूली का निशान बना हुआ है, जिसमें स्याही लगी है, और बगल में लिखा है – मत कर। फिर नीचे लिखा है, रांची दिखाओ अपनी उंगली का पावर, बगल में स्वीप रांची का लोगो दिया गया है।

पहले पहल जब हमारी इस होर्डिंग पर नजर पड़ी तो मैं सकपका गया, हमारी तरह और लोग भी इस होर्डिंग को देख बरबराते हुए आगे बढ़ जा रहे थे। हमें यह समझते देर नहीं लगी, कि जो हम समझ रहे हैं, वहीं अन्य समझ रहे हैं। आम तौर पर जिसने ये होर्डिंग बनवाई होगी, या विज्ञापन तैयार करवाया होगा, उसका मकसद यही होगा कि लोग ज्यादा से ज्यादा वोट करें, इसके लिए यह विज्ञापनवाली होर्डिंग तैयार करवाई गई हैं, पर आम जनता इसे उस प्रकार से समझ नहीं रही थी।

हमने एक-दो आम जनता से पूछा कि भाई क्या लिखा है, तो एक ने कहा – अंगूली मत कर, अंगूली का पावर समझ। इसी प्रकार दूसरे से मैंने पूछा कि वह क्या समझ रहा हैं, उसने कहा कि लिखा है कि अंगूली मत कर, मैंने उससे पूछा कि और क्या यह बता रहा है, तो उसने कहां वोट मत कर, मतलब वोट नहीं देना है, और लीजिये यहीं बैंड बज गया, इस विज्ञापन का। जरा आप खुद देखिये, इस विज्ञापन रुपी होर्डिंग को आपको सब समझ में आ जायेगा कि यहां विज्ञापन के नाम पर क्या हो रहा है, और कैसे लोगों के दिमाग का दही बनाया जा रहा है?

जरा पूछिये विज्ञापन और होर्डिग तैयार करानेवाले रेडियो सिटी से, कि अगर कोई छोटी सी बच्ची की रोती तस्वीर के साथ यह लिखा रहे कि मत कर, उसका मतलब क्या होगा? उसका मतलब आम जनता यही समझेगी की विज्ञापन कह रहा हैं कि रोया मत कर, उसी प्रकार जब आप एक अंगूली दिखायेंगे और उसके बगल में लिख देंगे कि मत कर, तो उसका मतलब भी यही होगा कि अंगूली मत कर, चाहे आप उस अंगूली में कितना भी बड़ा-बड़ा स्याही का दाग क्यों न लगा दें, क्योंकि आम जनता को ये सब समझ में नहीं आता।

इसी प्रकार इस होर्डिंग में दिखाया गया अंगूली की स्याही का दाग और उसके बाद लिखा मत कर, का मतलब तो यही लग रहा है कि वोट मत कर, और इसको आप गलत भी नहीं कह सकते, चाहे भले ही आप ये कह रहे हो कि इसका मतलब वोट करने से हैं, तो भाई आपने स्याही लगी अंगूली के बगल में मत कर की जगह मतदान कर क्यों नहीं लिखा? इससे सही बात लोगों के दिमाग में फिट हो जाती, वे तरह-तरह की बातें अपने दिमाग में नहीं लाते, पर आपने तो हद कर दी, कहां का ईंट, कहां पे जोरा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा, वाली कहावत चरितार्थ कर दी।

मतलब विज्ञापन बनाने में दिमाग जरुर लगाइये, पर ध्यान रखिये कि उसके अर्थ अनेक न हो, एक ही हो, जिससे सामान्य जन आराम से समझ सकें और अगर सामान्य जन आपके विज्ञापन को नहीं समझ सका तो समझ लीजिये, आपका सब करा-कराया बेकार, क्या समझे, अभी भी वक्त है, इस विज्ञापन को उतारिये और अपनी विद्वता अपने पास रखिये, क्योंकि आपकी विद्वता लोगों के दिमाग की दही बना रही हैं।

Krishna Bihari Mishra

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