अपनी बात

रमेश सिंह की कथित बगावत के बीच अब गिरिडीह के भाजपा नेता कामेश्वर पासवान की टिप्पणी से विवाद, झारखंड भाजपा में अनुशासन की अलग-अलग तराजू पर उठे सवाल!

झारखंड भाजपा के दो नेताओं से जुड़े बयान प्रदेश नेतृत्व की अनुशासन नीति और राजनीतिक प्रबंधन पर सवाल खड़े कर रहे हैं। रांची में भाजपा प्रदेश कार्यसमिति सदस्य रमेश सिंह के टिकट नहीं मिलने पर निर्दलीय चुनाव लड़ने संबंधी कथित बयान के बाद अब गिरिडीह में कामेश्वर पासवान की टिप्पणी विवाद का विषय बनी है।

दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू को लेकर पासवान की कथित अमर्यादित टिप्पणी पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने सार्वजनिक माफी की मांग की है। दोनों प्रकरणों की प्रकृति अलग है, लेकिन इनके केंद्र में नेताओं के सार्वजनिक आचरण और संगठन की जवाबदेही का प्रश्न है। फिलहाल ऐसा लगता है कि अनुशासन की किताब तो एक ही है, लेकिन उसके पन्ने व्यक्ति देखकर खोले जा रहे हैं।

रमेश सिंह प्रकरण: टिकट की दावेदारी या संगठन को खुली शर्त?

‘विद्रोही24’ में 28 अक्टूबर को प्रकाशित टिप्पणीपरक लेख का स्मरण करें। रमेश सिंह ने एक वीडियो में भाजपा से टिकट नहीं मिलने की स्थिति में निर्दलीय चुनाव लड़ने की बात कही थी। यदि बयान इसी आशय में दिया गया है, तो मामला केवल चुनाव लड़ने की इच्छा जताने तक सीमित नहीं रहता। किसी भी दल में टिकट की मांग रखना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है, लेकिन टिकट न मिलने पर उसके अधिकृत उम्मीदवार के खिलाफ उतरने की घोषणा संगठन के निर्णय को सशर्त स्वीकार करने का संकेत देती है। यानी टिकट मिला तो संगठन सर्वोपरि और नहीं मिला तो अपनी उम्मीदवारी सर्वोपरि!

ऐसी स्थिति में प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के सामने यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी बनती है कि पार्टी इस तरह के बयान को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा मानती है या अनुशासन का विषय। सवाल अपनी जगह है कि संगठन को चुनौती देने वाले बयान पर अनुशासन का डंडा उठेगा या उसे भी टिकट के फैसले तक विश्राम दिया गया है?

दूसरा विवाद गिरिडीह में भाजपा की पदयात्रा के दौरान कामेश्वर पासवान की ओर से दिवंगत मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू पर की गई कथित टिप्पणी से जुड़ा है। स्थानीय समाचारों एवं उनके वायरल हो रहे बयान की प्रतिक्रिया में झामुमो नेताओं ने प्रेस वार्ता कर बयान की निंदा की और पासवान से सार्वजनिक माफी मांगने को कहा। जिला परिषद प्रतिनिधि मोहन दास ने कहा कि राजनीतिक असहमति के बावजूद भाषा की मर्यादा बनी रहनी चाहिए।

उपमहापौर सुमित कुमार, झामुमो महानगर अध्यक्ष रॉकी सिंह और जिला प्रवक्ता कृष्ण मुरारी शर्मा समेत अन्य नेताओं ने भाजपा से अपना आधिकारिक रुख स्पष्ट करने की मांग की। झामुमो नेताओं ने चेतावनी दी है कि भाजपा बयान का खंडन नहीं करती है, तो वे इसे पार्टी का आधिकारिक रुख मानेंगे। बहरहाल पदयात्रा से जनता तक पार्टी का संदेश पहुंचना था, लेकिन चर्चा में नेता की जुबान आ गई। विपक्ष को मुद्दा तलाशने की जरूरत ही नहीं पड़ी, उसे बैठे-बिठाए मुद्दा परोस दिया गया!

कामेश्वर पासवान से जुड़ा अनुशासन का प्रश्न नया नहीं है। नगर निगम चुनाव से पहले भाजपा की ओर से उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किए गया। तत्कालीन प्रदेश महामंत्री एवं मुख्यालय प्रभारी प्रदीप वर्मा के हस्ताक्षर से जारी पत्र में सात दिनों के भीतर अनुशासनहीनता पर जवाब मांगा गया और संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं मिला तो उन्हें भाजपा से निष्कासित कर दिया गया।

लेकिन इधर अपने पिछले गिरिडीह दौरे में आदित्य साहू ने दरियादिली दिखाते हुए पासवान को दोबारा भाजपा में शामिल करा लिया। स्वागत की गर्मजोशी अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि पार्टी के हिस्से सफाई देने की नौबत आ गई। ऐसी वापसी पर संगठन अपनी ताकत गिने या माथे की नई शिकनें? ये दोनों ही अलग घटनाएं, नेतृत्व के सामने साझा चुनौती की तरह मुँह बायें खड़ा हो गया है।

रमेश सिंह से जुड़ा मामला पार्टी की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया और उसके निर्णयों के प्रति प्रतिबद्धता से संबंधित है। जबकि पासवान का प्रकरण सार्वजनिक भाषा, राजनीतिक मर्यादा और विपक्ष के साथ व्यवहार का है। दोनों को एक जैसा अनुशासनात्मक मामला मानना उचित नहीं है, लेकिन दोनों में नेतृत्व की स्पष्ट प्रतिक्रिया आवश्यक है। प्रदेश नेतृत्व के सामने सवाल है कि विवादित बयानों की जांच और जवाबदेही के लिए कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जा रही है। अनुशासन नियमों से तय होगा या बयान देने वाले के कद और पहुंच से?

बताते चलें कि आदित्य साहू जी ने रातू मंडल के दो पार्टी पदाधिकारियों को सिर्फ इसलिए आनन-फानन में पदों से हटाने का त्वरित फरमान जारी कर दिया, क्योंकि इन लोगों पर जमीन के एक गैर-राजनीतिक मामले में मारपीट करने का आरोप लगा। एकबारगी तो लगा कि अध्यक्ष आदित्य साहू जी इतने अनुशासित हैं कि पार्टी से अलग किसी के कृत्य पर भी कार्रवाई कर दी। वहां कार्रवाई की रफ्तार देखकर लगा था कि अब अनुशासन के मामले में किसी को मोहलत नहीं मिलेगी!

पर रमेश सिंह और अब पासवान के मामले में वही तेजी कहां चली गई? साहू जी शायद डर के मारे यह सब टुकुर-टुकुर देखने को मजबूर हैं या फिर छोटे पदाधिकारियों के लिए तत्काल फरमान और बड़े नामों के लिए अनिश्चितकालीन विचार-विमर्श ही अनुशासन का नया सूत्र है? क्या पार्टी इन मामलों के संबंध में स्पष्ट जानकारी देगी?

किसी नेता की टिप्पणी को लेकर अस्पष्टता बनी रहने पर उसके राजनीतिक नुकसान का सामना पूरे संगठन को करना पड़ सकता है। गिरिडीह में विपक्ष ने इस मुद्दे को सार्वजनिक मर्यादा से जोड़ दिया है। वहीं रमेश सिंह से संबंधित दावा संगठन के फैसलों की स्वीकार्यता पर बहस खड़ी करता है। बयान कोई दे और उसकी राजनीतिक कीमत कार्यकर्ता चुकाएं—यह व्यवस्था आखिर कब तक चलेगी? इन दोनों विशिष्ट प्रकरणों पर भाजपा प्रदेश नेतृत्व की विस्तृत औपचारिक प्रतिक्रिया अभी नहीं आयी हैं।

फिलहाल प्रदेश नेतृत्व के लिए चुनौती केवल विवाद शांत करना नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करना भी है कि सार्वजनिक बयानबाजी और संगठनात्मक अनुशासन के मामलों में जवाबदेही कैसे तय होगी। कार्रवाई का निर्णय तथ्यों और संबंधित पक्षों के जवाब के आधार पर होना चाहिए, लेकिन नेतृत्व का स्पष्ट रुख पार्टी के भीतर और बाहर उठ रहे सवालों का उत्तर देने के लिए जरूरी है। मौन को राजनीतिक कौशल मान भी लिया जाए, तब भी हर विवाद अपने आप शांत हो जाएगा, इसकी गारंटी कौन देगा?

कामेश्वर पासवान की वापसी कराने वाले नेतृत्व की जवाबदेही पर तीखे सवाल उठ रहे है। इन्हें बागी होकर चुनाव लड़ने के चलते पार्टी से निकाल दिया गया था। पर अभी-अभी आदित्य साहू जी ने गिरिडीह में इनको दोबारा भाजपा में शामिल कराया है। लगता है, ये उसी निष्कासन का बदला लेने के लिए भाजपा का बैंड बजाने का काम कर रहे हैं। इसके लिए आदित्य साहू को शाबाशी दी जानी चाहिए! आखिर इतनी शानदार वापसी कराई कि विपक्ष को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

एक तो रघुवर दास जी खुद गए और अपने ऊटपटांग कामों से भाजपा का भी जो सूपड़ा साफ कराकर गए, उस झटके से भाजपा आज भी हांफ रही है। लगता है, आदित्य साहू अपने हैरतअंगेज कार्यों से बची-खुची लुटिया भी डुबोकर ही मानेंगे। कार्यकर्ता किनारे तक पहुंचने के लिए हाथ-पैर मार रहे हैं और नेतृत्व नाव में नए छेद करने वालों का स्वागत कर रहा है!

रमेश सिंह के पार्टी विरोधी बयान और एक तरह से केंद्रीय नेतृत्व तक को चुनौती देने से लगी आग अभी बुझी भी नहीं है। उन पर कार्रवाई करने में डर के मारे अध्यक्ष जी के हाथ-पांव क्यों फूल रहे हैं? रातू के पदाधिकारियों पर फरमान जारी करते समय जो तत्परता दिखी थी, वह यहां किस दराज में रख दी गई?

यह सवाल अभी अपनी जगह है कि गिरिडीह में उपचुनाव की आहट के बीच एक दिवंगत मंत्री के बारे में ऊटपटांग बयान देकर इस आदमी ने अभी से ही भाजपा की कब्र खोदने का काम कर दिया है। ऐसी राजनीतिक सूझबूझ रही तो विपक्ष को चुनावी रणनीति से ज्यादा भाजपा नेताओं के अगले बयान का इंतजार करना चाहिए!

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