धर्म

हमेशा याद रखिये, हम यहां आत्मा की मुक्ति के लिए परमात्मा की खोज में आये हैं: स्वामी निगमानन्द

क्या जो देश स्वाधीन है, वहां के सारे नागरिक सचमुच में स्वाधीन है? उत्तर होगा – नहीं। सच्चाई यही हैं कि हम किसी न किसी भौतिक वस्तुओं व अन्य संसाधनों को पाने के लिए पागल है, उसे पाने के लिए नाना प्रकार के बंधनों से खुद को बांध रखा है। यही बंधन हमारी स्वाधीनता को प्रभावित करती है और जो हम आत्मा की मुक्ति के लिए परमात्मा की खोज में यहां आये हैं, उससे खुद को भटका रखा है। ये बातें आज रांची स्थित योगदा सत्संग आश्रम में रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए योगदा भक्तों के बीच स्वामी निगमानन्द ने कही।

उन्होंने कहा कि हमें बांधने के लिए माया का बंधन तो है ही, साथ ही पूर्व जन्म में हमारे द्वारा किये गये कर्म भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में हमारी वर्तमान स्थिति कुछ भी हो, राजनीतिक व्यवस्था कुछ भी हो। हमें स्वयं को बंधनों से मुक्त करने का प्रयास करना चाहिए, नहीं तो हमारी स्थिति ग्रीक के उस राजा थीसियस की तरह हो जायेगी, जो अपनी दुनिया से पाताल को गया। लेकिन पाताल जाते ही, वो खुद को भूल गया।

स्वामी निगमानन्द ने इसी पर ग्रीक की कहानी बताई कि कैसे एथेंस के राजा थीसियस पाताल लोक गये और वहां पाताल के राजा हेड्स ने उन्हें भ्रमित करने के लिए पत्थर की बनी भूलने की कुर्सी पर बैठने को कहा, जिस पर थीसियस बैठते ही अपनी पहचान खोकर, सब कुछ भूलकर वहीं चिपक गये थे। वर्षों बाद हरक्यूलियस जब पाताल पहुंचे, तब उन्होंने थीसियस को हाथ पकड़कर उन्हें उस पत्थर से खींच लिया और फिर उनकी सारी याददाश्त वापस आ गई। फिर वे जीवित दुनिया में वापस लौटे।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि हम जिन प्रकार के बंधनों से जकड़े हैं। उन बंधनों से हमें सिर्फ सदगुरु ही निकाल सकते हैं। अगर हमारे जीवन में सद्गुरु नहीं आये, वे हमें रास्ता नहीं दिखायें, तो हम आजीवन बंधनों से जकड़ रहेंगे और कभी ईश्वर को प्राप्त नहीं कर पायेंगे। उसका उदाहरण उन्होंने रामायण की उस कथा से दिया, जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने  कहा कि आप सभी ने स्वर्णमृग की कथा जरुर सुनी होंगी। जिसमें मारीच स्वर्णमृग बनकर सीता के सम्मुख खड़ा होता है और सीता स्वर्णमृग के चर्म के लोभ में आकर श्रीराम को उसे पाने की इच्छा जताती है। श्रीराम सब कुछ जानते हैं। फिर भी वे लक्ष्मण को दिशा-निर्देश देकर स्वर्णमृग की ओर भागते हैं। इधर स्वर्णमृग मारा जाता है। स्वर्णमृग बना मारीच राम के स्वर में ही चिल्लाता है- हा लक्ष्मण, हा सीते।

इधर सीता को लगता है कि श्रीराम संकट में हैं। वो लक्ष्मण को श्रीराम को संकट से बचाने के लिए भेजती है। पर लक्ष्मण जाने के पूर्व सीता को बताते है कि वो उनके द्वारा बनाये गये इस निशान से वो बाहर नहीं आयेंगी। इधर रावण सीता को अपहरण करने के लिए लक्ष्मण द्वारा बनाये गये चिह्न से सीता को किसी प्रकार बाहर कराता है और सीता अपहृत हो जाती है। इधर सीता नाना प्रकार के आभूषणों को फेंकना शुरु करती है। सीता को अशोकवाटिका में रखा जाता है। हनुमान सीता की खोज में लंका पहुंचकर अशोकवाटिका में पड़ी सीता को मुद्रिका थमाते हैं। इसी दौरान हनुमान द्वारा लंका को जलाया जाता है। हनुमान चाहते तो सीता को उसी वक्त मुक्त करा सकते थे। लेकिन सीता राम द्वारा मुक्त होना चाहती है।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि अब इस पूरे प्रकरण को देखिये। यहां राम परमात्मा और सीता जीव है। स्वर्णमृग मायावी संसार है। लक्ष्मण सद्बुद्धि है। लक्ष्मण ने जो रेखा खींची, वह रेखा नैतिकता है, साधना है। यह नैतिकता और साधना कह रही है, कि जब हम इसका पालन करते हैं, तब तक सुरक्षित है और जब इसकी अवहेलना करते हैं तो हम कष्ट में पड़ते हैं। सीता का आभूषण का त्याग संसार के प्रति आसक्ति को त्यागना है। अशोक वाटिका अर्थात् जो संसार में आसक्ति नहीं रखता, उसे ही शोक नहीं होता। श्रीराम मुद्रिका प्रतीक है – ईश्वर के प्रति संबंध जोड़ने का, भक्ति के बीजारोपण का। भक्ति हमारी चेतना में आ जाये तो सारी तामसिक शक्तियां भस्मीभूत हो जाती है। जैसे ही हमारी ईश्वर के प्रति आसक्ति बढ़ जाती है तो फिर जीव यानी सीता का परमात्मा यानी राम से मिलन हो जाता है।

स्वामी निगमानन्द ने यह भी कहा कि अयोध्या में एक पलटूदास नामक संत हुआ करते थे। जो बराबर कहा करते थे कि यह सारा संसार आकाश में प्रवाहित हुए अनल से ज्वलनशील है। कोई नहीं बचेगा। सभी इस अनल में जल जायेंगे। लेकिन बचेंगे, वहीं जिनका संत-समागम होगा। सिर्फ संत ही हमें, सिर्फ सद्गुरु ही हमें इस अनल से बचा सकते हैं। पलटूदास कहते थे कि अगर सद्गुरु नहीं होते तो यह सारा संसार ही जल जाता, कोई नहीं बचता।

स्वामी निगमानन्द ने कहा कि कर्म का प्रभाव पशुओं पर नहीं पड़ता, क्योंकि उनमें सोचने-समझने की शक्ति नहीं होती। लेकिन मनुष्यों पर इसका पड़ना ही है, क्योंकि सिर्फ मनुष्य में ही सोचने-समझने की शक्ति है। इसलिए इस मनुष्य को संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, आगामी कर्म और प्राप्तन कर्म का भोग भोगना पड़ता है। उन्होंने कहा कि जिसनें श्वास पर नियंत्रण कर लिया, वो अपने दुखों पर भी नियंत्रण कर लिया। साधना में जुटे। जिसकी साधना में जितनी गहराई। उतना ही वो ईश्वर के निकट। उतना ही वो मुक्ति की ओर अग्रसर।

स्वामी निगमानन्द ने अंत में एक लालटेन लिये हुए व्यक्ति की कथा सुनाई कि कैसे लालटेन की ज्वाला तो हमेशा ठीकठाक रही, लेकिन लालटेन लेकर चलने के क्रम में लगातार शीशे पर धूल पड़ने से लालटेन की प्रकाश मद्धिम हो जाने से उक्त व्यक्ति को रास्ते में चलने पर कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन जैसे ही उसने धूल को साफ किया। लालटेन का प्रकाश पुनः उसी रूप में राह दिखाने लगा। ठीक उसी प्रकार हमारी आत्मा पर यह हमारे कर्मों का धूल इस प्रकार से चढ़ गया कि हमें पता ही नहीं कि हमें जाना कहां है, हमारी आत्मा की मुक्ति का आधार क्या है? लेकिन जैसे ही हम योग और सद्गुरु का आश्रय लेते हैं। आत्मा की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *