‘वक्त आपका है नाच लीजिए, हमारा होगा तो मुजरा करवाएंगे’ जैसी सोच रखनेवाली महिला पत्रकार को पद्मश्री प्राप्त बलबीर दत्त के हाथों मिला बेस्ट इमर्जिंग जर्नलिस्ट अवार्ड
रांची प्रेस क्लब में आज सुधा सिन्हा मेमोरियल एक्सीलेंस अवार्ड इन जर्नलिज्म 2026 का आयोजन किया गया था। इस आयोजन में वे सारे लोग मौजूद थे। जिनका प्रशस्ति पत्र पर हस्ताक्षर था। जिनके प्रशस्ति पत्र पर हस्ताक्षर थे। दरअसल वे ही चयनकर्ता भी थे। इनके नाम थे – 1. संजय मिश्र, स्थानीय संपादक, प्रभात खबर, 2. शर्मिष्ठा मजूमदार, अवकाश प्राप्त सहायक निदेशक, दूरदर्शन केन्द्र, रांची, 3. शंभू नाथ चौधरी, अध्यक्ष, रांची प्रेस क्लब, 4. अभिषेक सिन्हा, सचिव, प्रेस क्लब एवं शुभ नारायण सिन्हा, अध्यक्ष, सुधा एंड अरमान मेमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट। यह अवार्ड देने का विशेष समारोह सुधा एंड अरमान चैरिटेबल ट्रस्ट ‘रे ऑफ होप’ व द रांची प्रेस क्लब के सौजन्य से आयोजित किया गया था।
जिनको-जिनको इस विशेष समारोह में विभिन्न अवार्डों से सम्मानित किया गया। वे बहुत ही प्रफुल्लित थे। प्रफुल्लित होने के कारण उन्होंने सोशल साइट पर जाकर इस कार्यक्रम का महिमामंडन भी किया और लोगों को बताया कि वे फलां-फलां अवार्ड से सम्मानित किये गये हैं। ऐसे भी आजकल पूरे झारखण्ड में अखबार और अखबार से जुड़े लोगों ने बड़े-बड़े प्रायोजकों के साथ मिलकर अवार्ड समारोह का ऐसा व्यवसाय शुरु किया है। जिससे प्रायोजकों, आयोजकों व अवार्ड लेनेवाले तीनों लाभान्वित होते हैं। लेकिन समाज को इन अवार्डों से शायद ही कुछ फायदा होता है, क्योंकि समाज अब अच्छी तरह से जान चुका है कि इन अवार्डों का भी व्यवसायीकरण हो चुका है और इसकी आड़ में सभी अपना-अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं।
अब जरा आज देखिये, रांची प्रेस क्लब में आज क्या हुआ? जैसे ही यहां अवार्ड लेन-देन कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इस अवार्ड में बेस्ट इमर्जिंग जर्नलिस्ट अवार्ड से सम्मानित हुई एक महिला पत्रकार ने कई फोटो के साथ अपने सुन्दर उद्गार फेसबुक पर उड़ेल दिये। जिसमें उन्होंने लिखा कि ‘आज की सुबह सुप्राइज लेकर आई…’, जिसे पढ़कर मेरा दिमाग ही घुम गया कि ‘सुप्राइज’ क्या होता है? झट से मैने हिन्दी शब्दकोष निकाले। इस नये शब्द का अर्थ कहीं नहीं मिला।
फिर मैंने इसी महिला पत्रकार द्वारा दिये गये अवार्ड में दिख रहे वरिष्ठ पत्रकारों को फोन लगाया और पूछा कि सुप्राइज का मतलब क्या होता है? सभी ने यही कहा कि ये शब्द मैं पहली बार सुन रहा हूं। ऐसा कोई हिन्दी में शब्द नहीं होता। तब मैंने उन्हीं महानुभावों से यह पूछा कि क्या किसी पत्रकार की ये भाषा हो सकती है – ‘वक्त आपका है नाच लीजिए, हमारा होगा तो मुजरा करवाएंगे।’ उन महानुभावों ने कहा कि ये एक पत्रकार की भाषा नहीं हो सकती? ये भाषा निम्नस्तरीय है।
तब इन्हीं महानुभावों से विद्रोही24 ने प्रश्न कर डाला तो आपने ऐसी भाषा का उपयोग करनेवाली महिला पत्रकार को ‘बेस्ट इमर्जिंग जर्नलिस्ट’ का पुरस्कार कैसे दे डाला? ये सारे महानुभाव आश्चर्य में पड़ गये। सभी का कहना था कि उन्हें तो इस कार्यक्रम में बुलाया गया था, इसलिए चले गये। किसी ने कहा कि मुझे तो ऐसे ही जूरी में रख लिया गया था। हम लोग क्या जाने, बोला गया, खड़ा होने को, खड़ा हो गये। बोला गया अवार्ड देने को, अवार्ड दे दिये। इतनी सूक्ष्मता से भला कौन देखता है?
लेकिन सभी ने ये जरुर स्वीकार किया कि मुजरा कराने की सोच रखनेवाला या रखनेवाली, व्यक्ति या महिला पत्रकार नहीं हो सकता/सकती। ऐसी भाषा किसी के मुख से शोभा नहीं देता। लिखने की बात तो और। पर अवार्ड तो दे दिया गया। अवार्ड वापस भी नहीं लिया सकता। ये अवार्ड ऐसा भी नहीं कि जिसको पाकर कोई महानता के पद को छू लें। लेकिन इस प्रकार के लेन-देन समारोह आयोजित करनेवाले की मंशा तो साफ दिख जाती है कि वे चाहते क्या है? जिसे बेस्ट इमर्जिंग जर्नलिस्ट अवार्ड मिला, उस महिला पत्रकार के फेसबुक पर दिया गया टैग लाइन आप अब भी देख सकते हैं। जिसमें वो विवादास्पद पंक्तियां देखने को मिल जायेंगी।
