एक ऐसा रिक्शा चालक जो पशुओं में भी ईश्वर को देख लेता है और उन्हें भाव विभोर होकर प्रणाम करता हुआ, आगे बढ़ जाता है…
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरित मानस में लिखा है – सिय राम मय सब जग जानी। करहु प्रणाम जोरी जुग पानी।। अर्थात् गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वे सभी में मां जानकी और प्रभु श्रीराम को ही देखते हैं और यहीं मान और जानकर दोनों हाथों को जोड़कर सभी को प्रणाम करते हैं। अब सवाल उठता है कि इस प्रकार की सोच कितने लोगों के पास है। उत्तर होगा – न के बराबर।
लेकिन जनाब थोड़ा ठहरिये। ऐसा नहीं है। आज भी ऐसे-ऐसे लोग है। जो ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं या यों कहें कि उन्होंने कभी किताब कलम पकड़ी नहीं। बस व्यवहारिक ज्ञान को पकड़े रखा और इस संसार में अपनी नाव को प्रभु के हाथों सौंप कर चलाये जा रहे हैं और ईश्वर भी उनकी खुलकर मदद करता है।
रांची के चुटिया इलाके के पास है एक स्कूल, जिसका नाम है – एल ए गार्डेन। इसी के आस-पास में हैं एक मुहल्ला। जिसका नाम है – विन्ध्यवासिनी नगर रोड नं 2। जहां रहते हैं गणेश वर्मा। जिनकी पत्नी का नाम है – जीरा देवी। इनकी पांच बेटियां और दो बेटे हैं। रिक्शा चलाकर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। गरीबी में पले-बढ़े है। लेकिन इसकी शिकायत कभी ईश्वर से उन्होंने नहीं की।
वे सर्वदा प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं। जो भी रिक्शे के कमाई से मिल गया। उसे ईश्वर का प्रसाद समझ कर रख लेते हैं और अपनी जीवन की नैया बड़ी आराम से खेवे जा रहे है। इनकी सबसे बड़ी विशेषता है कि वे पशुओं में भी भगवान का दर्शन कर लेते हैं और उसे उसी भाव से प्रणाम करते हैं। हालांकि कई लोग उनके द्वारा किये जा रहे इस कार्य पर आश्चर्य करते हैं कि यह आदमी गाय और उसकी बाछी-बाछा को प्रणाम क्यों करता है, ये तो जानवर है।
लेकिन, उन्हें इन सब बातों से कोई मतलब नहीं रहता। वे अपने घर से हर सुबह करीब साढ़े आठ बजे के आस-पास घर से अपनी रिक्शा लेकर निकलते हैं और चल पड़ते हैं। रास्ते में जो भी गौ मिले, उन्हें वे बड़े भक्ति भाव से प्रणाम करते हैं। विद्रोही24 ने ऐसा करते हुए अपनी आंखों से एक नहीं, कई बार देखा है। एक दिन विद्रोही24 ने रिक्शा चालक गणेश वर्मा को ऐसा करते जब देखा, तो उनसे बात करनी चाही।
रिक्शा चालक आराम से रुक गये और खुलकर बात की। अपने परिवार के बारे में और अपने क्रियाकलापों के बारे में। लेकिन जो सबसे बड़ी बात की, तो वो था देवता और देवत्व के बारे में। उन्होंने साफ कहा कि ईश्वर तो कण-कण में हैं। बस उसे देखने की जरूरत है कि आप उसे कैसे देख रहे हैं और उसमें क्या देख रहे हैं। मुझे तो लगता है कि ईश्वर सभी में हैं। इसलिए मैं उसी भाव से उन्हें प्रणाम करता हूं और आगे बढ़ जाता हूं। मुझे ईश्वर से कोई शिकायत नहीं, बस मैं आनन्द में रहता हूं।
यह बात सुनकर विद्रोही24 आश्चर्य हो उठा। एक रिक्शा चालक संतों की भाषा बोल रहा था। सच्चाई भी यही है कि आनन्द का दूसरा नाम ईश्वर है। क्योंकि वो सत् चित् आनन्द है। जिसको वो आनन्द मिल गया तो वो हमेशा ईश्वर में ही रहेगा। चाहे वो धनाढ्य हो या धनाढ्य न हो। ऐसे भी किसने कहा कि धन से शांति, प्रेम और आनन्द की प्राप्त होती है। शांति, प्रेम और आनन्द तो ईश्वर में लीन होने से ही प्राप्त होती है। विद्रोही24 रिक्शा चालक के मुख पर गजब की प्रसन्नता देख मुग्ध था।
कभी इसी देश में संत नामदेव ने भी कुत्ते में ईश्वर के दर्शन कर लिये थे और घी का कटोरा लेकर उस कुत्ते के पीछे दौड़ गये थे और कह रहे थे कि प्रभु सूखी रोटी मत खाओ, थोड़ी घी तो लगाते जाओ, नहीं तो आपके गले में फंस जायेगी। ये घटना तब घटी थी, जब नामदेव के पास से एक भूखे कुत्ते ने रोटी लेकर भागने की कोशिश की थी। सचमुच यह देश अद्भुत है। स्वामी विवेकानन्द ने ऐसे ही नहीं कर दिया था कि भारत कभी मर नहीं सकता। भारत तो अध्यात्म की वैसी कुंजी है कि इसके बिना किसी भी व्यक्ति या देश या संस्थान का नेत्र खुल ही नहीं सकता।
