भीष्म पितामह अहंकार और द्रोणाचार्य आदत व संस्कार के प्रतीकः स्वामी अमरानन्द
हमेशा ईश्वर से प्रेम करना सीखिये। उनसे प्रार्थना करिये। हमेशा स्वयं को अधिचेतना में ले जाने को तत्पर रहे। चेतन मन से सत्कर्म करते रहे, क्योंकि इसमें ईश्वरीय भूमिका विद्यमान रहती है। अहंकार जो मन-मस्तिष्क में भरा पड़ा है, जो सारे बुराइयों की जड़ है। उसे दूर करने का प्रयास करें। अपने मन को निरन्तर ध्यान की गहराइयों में लगाये। इसी से आपका भला होनेवाला हैं, क्योंकि इसका कोई विकल्प नहीं। यह बातें आज योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग को संबोधित करते हुए योगदा भक्तों के बीच स्वामी अमरानन्द गिरि ने कही।
स्वामी अमरानन्द ने कहा कि महाभारत अपने शरीर के अंदर भी चल रहा है। प्रतीकात्मक भूमिका के रूप में द्रोणाचार्य प्रत्येक मानवों के अंदर गहरे संस्कारों और आदतों को दर्शाते हैं, जो आत्मा और अहंकार के बीच चल रहे आंतरिक संघर्ष पर विजय पाने में मुख्य भूमिका निभाते हैं, जिसकी चर्चा कई बार परमहंस योगानन्द जी ने की है। अगर आदतें अच्छी रही तो आप अहंकार पर विजय पाते हैं, नहीं तो कौरवों की तरह आपका विनाश हो जाता है।
उन्होंने कहा कि ये जो अहंकार हैं वो महाभारत के प्रमुख पात्र भीष्म पितामह के प्रतीक है। परमहंस योगानन्द कहा करते थे कि भीष्म भीषण अहंकार को दर्शाते हैं, जो आत्मा को शरीर और भौतिक संसार से बांधकर रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं। जबकि द्रोणाचार्य आदत व संस्कारों के प्रतीक है। स्वामी अमरानन्द गिरि ने कहा कि आदतें अच्छी भी होती है और बुरी भी होती है। द्रोणाचार्य ने कौरवों और पांडवों की समान रूप से शिक्षा दी थी। लेकिन पांडवों ने अच्छी आदतों को अपनाया और कौरवों ने बुरी आदतों को अपनाया। नतीजा सभी के सामने हैं।
स्वामी अमरानन्द ने कहा कि हम सभी अपने पुराने संस्कारों अर्थात् द्रोणाचार्य के साथ अहंकार के प्रतीक भीष्म पर विजय प्राप्त करने के लिए पांडवों की मदद के साथ आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि हमारे शरीर के अंदर जो विभिन्न प्रकार के चक्र है। दरअसल वे पांडवों के प्रतीक है। इन्हें उपर की ओर जागृत करना आवश्यक है। उन्होंने बताया कि मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्रार चक्र को बिना जगाये हम प्रकाश को नहीं पा सकते।
उन्होंने बताया कि आज्ञा चक्र जो तीसरी आंखें हैं। वो ब्रह्मांडीय नेत्र और अंतर्ज्ञान का केन्द्र है। परमहंस योगानन्द के अनुसार जब साधक ध्यान की गहराई में जाता है, तब उसे प्रकाश दिखाई पड़ता है। सहस्रार चक्र सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना तथा परमात्मा के मिलन का प्रतीक होता है। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण दरअसल कूटस्थ चैतन्य है। वे हमारे भीतर स्थित परमात्मा और दिव्य बुद्धि है। यही अनाहत और आज्ञा चक्र के द्वारा साधक का मार्गदर्शन करते है। श्रीकृष्ण हर साधक के जीवन के लिए जरुरी है। क्योंकि जैसे अर्जुन बिना श्रीकृष्ण के विजय प्राप्त नहीं कर सकें, कोई साधक भी बिना श्रीकृष्ण की सहायता के ध्यान की गहराइयों को प्राप्त नहीं कर सकता। उन तक नहीं पहुंच सकता।
उन्होंने युद्धिष्ठिर को धर्म और विवेक से, भीम को प्राण शक्ति और गहरे आध्यात्मिक भाव, नकुल और सहदेव को यम-नियम और अर्जुन को आत्मनियंत्रण से जोड़ा। उन्होंने बताया कि अगर अहंकार रूपी भीष्म को पराजित करना है तो शिखंडी को भी भूलना नहीं हैं। शिखंडी यहां सत्कर्मों को करने की दृढ़ इच्छाशक्ति है। यही कारण रहा कि शिखंडी के उपस्थित होते ही भीष्म पराजित हो गये। उन्होंने कहा कि दरअसल भीष्म पितामह या अहंकार को कोई सीधे पराजित नहीं कर सकता, क्योंकि अहंकार स्वयं को हमेशा शक्तिशाली और धर्म का प्रतिबिम्ब समझता है। लेकिन जैसे ही उसके समक्ष शिखंडी जैसा व्यक्तित्व उपस्थित होता है, परास्त हो जाता है।
स्वामी अमरानन्द ने महाभारत के महान व्यक्तित्वों के माध्यम से जीवन के मूलभूत सिद्धांतों, ईश्वर के पास पहुंचने के दिव्य मार्गों, ध्यान की गहराइयों, विभिन्न चक्रों को जागृत करने की सूक्ष्म विवेचना करते हुए योगदा भक्तों का मार्गदर्शन किया। उन्होंने कहा कि आपकी जो पांच ज्ञानेन्द्रियां हैं, उसे आप अपने वश में करना सीखिये। ये आसान है। जब आप गहरे ध्यान में जायेंगे तो ये सब करना आसान हो जायेगा। क्योंकि ध्यान के बाद समाधि ही आता है।
उन्होंने कहा कि आपको भयमुक्त होना चाहिए। आप अपनी चेतना का अधिक से अधिक विस्तार करें। ये जो अहंकार हैं, ये नाना प्रकार की बुराइयों की जड़ है। इससे दूर रहने में ही भलाई है। आप जो भी ओम् टेक्निक या हं-सः करते हैं। ये सभी टेक्निक आपको ध्यान की गहराई में ले जाने के लिए मुख्य भूमिका निभाते हैं। आप अपने को ध्यान पर ज्यादा केन्द्रित करें। आपका लक्ष्य ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए, आप स्वयं में सुधार लाये, इसे जरूर ही प्राप्त कर लेंगे।
