अपनी बात

रांची में JPSC के नाम पर BJP और दिल्ली में नीट के नाम पर तिलचट्टों को आगे कर BJP विरोधी दलों ने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए संपूर्ण देश को आग में झोंका, पुलिस और मीडियाकर्मियों पर किये पथराव

बिहार में एक लोकोक्ति है – शरीफ के घर में आग लगे तो गुंडा ….. सेकें। इसका अर्थ लगता है कि हमें बताने की जरूरत नहीं। आप सभी समझ सकते हैं। जब से सीजेआई ने ऐसे युवा जो नाकाबिल है, उनको केन्द्र में रखकर इनके लिए कॉकरोच शब्द का प्रयोग किया था। तभी कुछ लोगों ने इस कॉकरोच शब्द से ही अपनी दुकानदारी शुरु कर दी। चूंकि देश में ज्यादातर लोग ऐसे हैं, जिन्हें बात का बतंगड़ बनाने में ज्यादा आनन्द आता है। इस शब्द को पकड़ लिया और इस नाम पर कॉकरोच जनता पार्टी बना ली।

कॉकरोच चूंकि अंग्रेजी शब्द है, हिन्दी में कहें तो कॉकरोच का मतलब तिलचट्टा होता है। सामान्य तरीके से अगर आप किसी को तिलचट्टा कहा तो वो गाली समझकर आप से उलझ पड़ेगा। लेकिन आज यह शब्द महानता को प्राप्त कर चुका है। कुछ गार्जियन तो अब ये भी कहने लगे हैं कि वो दो कॉकरोचों के पिता है और लोग उसके समर्थन में वाह-वाह भी करने लगे हैं। लेकिन जो कॉकरोचों या यानी तिलचट्टों के नाम पर राजनीति कर रहे हैं या उन्हें समर्थन दे रहे हैं। उनसे कहिये कि आपके बच्चे तिलचट्टे हैं, तो शायद उन्हें बुरा लग जाये।

क्योंकि वे तो आम जनता से भी अलग खुद को खास समझते हैं। तभी तो इन राजनीतिक दलों उसमें चाहे कोई पार्टी हो, सभी के बच्चे कम से कम भारत में तो उच्च शिक्षा की पढ़ाई में दिलचस्पी नहीं ही लेते। जिसने भी राजनीति में रहकर तीन-पांच करके अच्छी कमाई कर ली है। वह अपने बच्चों को विदेश पढ़ने को भेजता है और जो बच गया वह देश के सर्वोच्च संस्थान पर कब्जा करके बैठा है। जैसे जेएनयू, वहां आज भी वामियों के बच्चों की संख्या ज्यादा है। चाहे वे वामी किसी भी वामदल से क्यों न जुड़े हो। इसी प्रकार अन्य दलों में रहनेवाले नेताओं के हाल है।

अब आइये नीट के नाम पर दिल्ली में हो रहे तिलचट्टों के आंदोलन की, ऐसा नहीं कि देश में पहली बार इस प्रकार की घटना घटी है। कांग्रेस व वामदल समर्थित शासनकाल में तो इसकी शृंखला है। लेकिन आज ये पार्टियां खुद को दूध की धुली बताकर कॉकरोचों को इस आंदोलन को हवा दे रही है। क्योंकि उनको पता है कि देश में अभी किसकी बयार बह रही है। चूंकि ये पार्टियां देश की जनता द्वारा नकारी जा चुकी है। ऐसे में जनता के बीच फिर से खुद को स्थापित करने के लिए वो हर प्रकार के हथकंडे अपना रही है। जिससे वे खुद को पुनः स्थापित कर सकें।

चूंकि कॉकरोच जनता पार्टी का गठन ही अभी-अभी हुआ है। ऐसे में इनके पास संगठन नाम की कोई चीज तो हैं नहीं। इसलिए वामियों ने अपने स्टूडेंट्स संगठन तथा अन्य वामी संगठनों, कांग्रेस ने अपने विभिन्न संगठनों, आपियों का तो दिल्ली में एक अच्छा संगठन ही हैं। सभी ने अपने-अपने लोगों को सक्रिय कर दिया और जमकर मीडिया व पुलिस तथा भाजपा के खिलाफ आग उगलने की हरी झंडी दे दी।

फिर क्या था? इन सभी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां-बहन तथा उन्हें भद्दी-भद्दी गालियां देनी शुरु कर दी। विभिन्न मीडिया में काम कर रही महिलाओं व पुरुषों को गोदी मीडिया कहकर भद्दी-भद्दी गालियां देने का काम शुरु किया। पुलिस पर पथराव किये। हिन्दू संतों को गालियां देनी शुरु कर दी। एक वामी महिला तो भारत माता को ही केन्द्र में रखकर उन पर गंदी-गंदी बातें करने लगी। भगवान राम व सीता पर गंदी-गंदी बातें की जाने लगी। नाम रहेगा अल्लाह का… आदि का नारा दिया जाने लगा। देश द्रोहियों के पक्ष में नारे लगने लगे। जब इन लोगों के तेवर बहुत ज्यादा तीखे होने लगे और इनकी बर्बरता जनता को नागवार गुजरने लगी तो केन्द्र सरकार को लगा कि इन पर सख्ती बरतनी चाहिए।

सख्ती ऐसी बरती गई। पुलिस की लाठी चार्ज और तिलचट्टों के पथराव में 118 पुलिसकर्मी और 60 तिलचट्टे घायल हो गये। एक फिल्म अभिनेता नसीरुद्दीन शाह जो नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के काल से ही उन्हें पसंद नहीं करता था। आग उगला और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाहिल तक कह डाला। जैसे लगता हो कि वो खुद शुद्धता के सारे मानक तय कर दुनिया में आया हो।

इधर कांग्रेस के नेता राहुल गांधी और उनकी पार्टी को लगा कि क्यों न, इस बहती गंगा में हाथ धोकर राजनीति चमका ली जाये। इस व्यक्ति ने पीएम आवास पर ही धरना दे दिया। अब ऐसे में पुलिस क्या करेगी। समझायेंगी और जब नहीं समझेगी और आप अपनी शारीरिक बल दिखायेंगे तो वो अपना काम करेगी ही। आपको घसीटेगी ही। खैर, राहुल गांधी को देश की जनता ऐसे ही ….. नहीं कहती। …. के सारे लक्षण उनमें मौजूद है।

इधर आपियों और समाजवादी पार्टियों को लगा कि कही राहुल बाबा कहीं इसका सारा क्रेज न ले जाये। इन दोनों पार्टियों ने भी खुब मजे लिये और दूसरी तरफ वामी पार्टियों तो सक्रिय थी है। खुब ढोल, ताशे लेकर, सुंदर-सुंदर आकर्षित करनेवाली वस्त्रों को धारण करनेवाली वामी लड़कियां इस कथित आंदोलन में भाग लेकर चल छइयां, छइयां गीत गाकर सभी का मनोरंजन कर रही थी।

उधर इनके कारनामों से वैसे संगठन जिनको लग रहा था कि नीट के नाम पर उनकी भावनाओं से खेला जा रहा है। उनके अंदर भी आग सुलगने लगी और वे भी इसका प्रतिकार करने का मन बना उठे। अब यहीं दिक्कत आने का खतरा बढ़ गया। अगर ये भी सड़क पर उतर आयेंगे तो फिर ये जो लोग अभी राजनीतिक हथकंडे अपनाकर देश का माहौल बिगाड़ रहे हैं तो इनके सड़कों पर उतरने पर क्या होगा। समझा जा सकता है।

आपको आंदोलन करने का अधिकार है। आपको अपनी बात रखने का अधिकार है। पर आपको राम, सीता और भारत माता पर अनाप-शनाप बयान देने का अधिकार किसने दे दिया। आपको प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मां-बहन को गाली देने और अश्लील हरकत करने का अधिकार किसने दे दिया। आपको मीडिया पर प्रहार करने तथा पुलिस पर पथराव करने का राइट किसने दे दिया। ऐसे में अगर केन्द्र सरकार आप पर सख्ती बरतते हुए आपका सही इलाज करती हैं तो क्या गलत है।

अब उधर दिल्ली को तिलचट्टों ने जलाने की ठान रखी है। इधर जेपीएससी के नाम पर भाजपाइयों ने रांची में कल तहलका मचा दिया। जेपीएससी के कार्यालय के समक्ष प्रदर्शन किया ही। साथ ही साथ कांग्रेस भवन पर भी प्रदर्शन करने पहुंच गये और बता दिया कि वे कितने ताकतवर है। अब ऐसे में कांग्रेस वाले कैसे कम रहते। उन्होंने भी अपनी ताकत दिखाने का ऐलान कर दिया और आज वे सभी भाजपा कार्यालय के समक्ष अपनी गुंडागर्दी दिखाने पहुंच गये।

जहां ये अपना शक्ति प्रदर्शन करने पहुंचे थे। वहां भाजपावाले भी बांस-बल्ली हाथ में लेकर पहले से तैयार थे। दोनों पक्षों ने पत्थरों का भी अच्छा इंतजाम किया था। जमकर पत्थरबाजी हुई और उसमें दो मीडियावाले इनके पत्थरबाजी के शिकार हो गये। उनके माथे फट गये। अब सवाल उठता है कि आप राजनीतिक दलों की गुंडागर्दी से देश को क्या मिलेगा? आपके आंदोलन में कितने परीक्षार्थी शामिल हैं। दरअसल इनके आंदोलन में कोई परीक्षार्थी या अभ्यर्थी नहीं होता। जो विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में फर्जीवाड़े के शिकार होते हैं। वे भी शामिल नहीं होते।

क्योंकि वे जानते हैं कि इन सभी से अंततः उनका भविष्य ही खतरे में पड़नेवाला है। वे अपने मन को मसोस कर रह जाते हैं। लेकिन ये राजनीतिक दल के गुंडे ताकत दिखाते हैं। लेकिन इसमें इनका कुछ नहीं होता। जो न्यूज कवर करने जाते हैं। जो इनके गुंडागर्दी से आम जनता को बचाने जाते हैं यानी पुलिस, उन्हें उनका शिकार होना पड़ता है। ये खुद को कांग्रेसी कहते हैं, लेकिन गांधीवाद को इन्होंने कब का श्रद्धांजलि दे चुके हैं।

इन्हें पता ही नहीं कि महात्मा गांधी ने अपना असहयोग आंदोलन क्यों वापस ले लिया था? ये कांग्रेसी तो हर आंदोलन में महात्मा गांधी की अहिंसा का श्राद्ध करते हैं। ऐसे में इन बेशर्मों से कोई क्यों बात करें। ये सभी देश को जब तक नरक नहीं बना देंगे। शांति से नहीं बैठेंगे। क्योंकि इनका मकसद नीट या जेपीएससी को ठीक करना नहीं। सत्ता प्राप्त करना है और सत्ता गुंडागर्दी से ही प्राप्त होने हैं तो फिर गुंडागर्दी करने में हर्ज क्या? शायद यही सिद्धांत को इन्होंने शिरोधार्य कर रखा है।

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