झारखण्ड के प्रदेश स्तरीय भाजपा नेताओं का पत्रकारों के लिए भंडारा यानी मटन में मीडिया, मीडिया में मटन
कहते हैं राजनीति में विचार सबसे ऊपर होता है। फिर धीरे-धीरे पता चलता है कि विचार के ऊपर रणनीति होती है, रणनीति के ऊपर प्रबंधन, प्रबंधन के ऊपर फोटो और फोटो के ऊपर मटन। भाजपा की नई मीडिया टीम बने अभी महीना भर ही हुआ है। टीम देखकर लगा जैसे संगठन ने यह तय कर लिया हो कि काम करने वालों की नहीं, गिनती बढ़ाने वालों की आवश्यकता अधिक है।
जो लोग तीन साल तक एक ढंग का मुद्दा नहीं खोज पाए, प्रेस कॉन्फ्रेंस करना जिनके लिए ग्रहण लगने जैसा कठिन काम था, वे फिर से मीडिया के प्रहरी बना दिए गए। कुछ नए चेहरे भी थे, जिन्हें देखकर लगा कि शायद नियुक्ति की पहली शर्त यह रही होगी कि बोलने से पहले कम से कम तीन बार “अ…अ…अ…” कहना आना चाहिए।
फिर मीडिया टीम की बड़ी बैठक हुई। अध्यक्ष जी और भाई साहब मीडिया मैनेजमेंट का ज्ञान दे रहे थे। यह दृश्य वैसा ही था जैसे तैरना न जानने वाला व्यक्ति नदी किनारे खड़े होकर नौकायन का प्रशिक्षण दे। दो घंटे तक गंभीर बैठक चली। बाहर वालों ने सोचा होगा कि अब सरकार की नीतियों की धज्जियां उड़ाने वाली रणनीति बनेगी। कोई दस्तावेज निकलेगा, कोई खुलासा होगा, कोई आंदोलन तय होगा।
लेकिन जब बैठक समाप्त हुई तो पता चला कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा निष्कर्ष निकल चुका है— “मीडिया में रहना है तो मीडिया को मटन खिलाइए।” इतिहास में कई युद्ध रोटी के लिए लड़े गए हैं, लेकिन शायद यह पहला राजनीतिक अभियान था जो मटन के लिए लड़ा गया। फिर शुरू हुआ महान अभियान।
पंद्रह दिनों तक पार्टी में सबसे गंभीर सवाल यह नहीं था कि सरकार कहाँ विफल हुई, बल्कि यह था कि मटन कितना मुलायम होगा, मछली कितनी बड़ी होगी और जलेबी गर्म मिलेगी या नहीं। देश की राजनीति में पहली बार शोधपत्र नहीं, रसोईपत्र तैयार हो रहा था। जो समय सरकार के भ्रष्टाचार पर दस्तावेज जुटाने में लग सकता था, वह समय इस बात पर खर्च हुआ कि प्लेट में कितने पीस रखने से कैमरे में प्रभाव अच्छा आएगा।
कार्यक्रम का दिन आया। पत्रकार आए। मटन आया। कैमरा पहले से मौजूद था। पत्रकारों को डायरी और पेन दिए गए। पेन देने का अंदाज ऐसा था मानो ज्ञान की मशाल सौंपी जा रही हो। फर्क सिर्फ इतना था कि मशाल से पहले फोटोग्राफर ने “एक मिनट… स्माइल प्लीज़…” कह दिया।
कुछ पत्रकारों ने शायद पहली बार महसूस किया कि वे पत्रकार कम और विवाह समारोह के बाराती अधिक हो गए हैं। कई लोग प्लेट लेकर इस तरह खड़े थे कि एक हाथ में चम्मच था और दूसरे हाथ में कैमरे की दिशा खोजी जा रही थी। मानो खाना कम, फोटो अधिक जरूरी हो। कुछ पत्रकार धीरे से पूछ रहे थे— “भाई, खाना खाने आए हैं या उद्घाटन कराने?”
तभी एक उत्साही प्रवक्ता कान में फुसफुसाईं— “पूरा इंतज़ाम हमारी तरफ से है… सबको बता दीजिए।” तब समझ आया कि भोजन केवल भोजन नहीं था। वह राजनीतिक निवेश था, जिसका ब्याज फोटो और चर्चा के रूप में वसूल किया जाना था। उधर कुछ लोग पूर्व मुख्यमंत्री की उपस्थिति पर भी हैरान थे। चर्चा चल रही थी कि अनुभवी लोग आखिर इस फोटो-युग में कैसे फँस गए?
किसी ने कहा—“सलाहकार बदल गए होंगे।” दूसरे ने कहा—“नहीं, शायद सलाह ही बदल गई है।” तो किसी ने कहा कुछ लोग मज़ाक में कहने लगे— “लगता है सलाहकार की बुद्धि पर भी मटन-चावल का असर हो गया है।” तो कुछ बोले— “या फिर वर्षों तक रणनीति बनाने वाला प्रथम मुख्यमंत्री के सलाहकार भी चारण संस्कृति के इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि अब ‘हाँ में हाँ’ मिलाने को ही वे राजनीति समझ बैठे हैं।”
रात समाप्त हुई। मटन भी समाप्त हो गया। और फिर वही हुआ जो राजनीति में हमेशा होता है—श्रेय सबने लिया, जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। मटन खत्म होने पर भी बैठक हो सकती थी, यदि बचा होता। अगले दिन पत्रकारों में चर्चा थी— “पहले वाले मीडिया प्रभारी खबर फिल्टर करते थे, अब वाले मटन भी फिल्टर नहीं कर पाए।”
असल दुख मटन का नहीं है। दुख यह है कि कुछ लोगों को अब भी लगता है कि पत्रकार की भूख पेट में होती है, जबकि वह सबसे पहले दिमाग में होती है। पत्रकार को खबर चाहिए, दस्तावेज चाहिए, तथ्य चाहिए, सवाल चाहिए। वह दावत खाकर लौट सकता है, लेकिन खबर न मिले तो अगले दिन वही दावत भी खबर बन जाती है।
इसलिए अध्यक्ष जी से एक विनम्र प्रार्थना है— अगली बार मटन थोड़ा कम बनवाइए और मुद्दे थोड़ा ज्यादा। क्योंकि लोकतंत्र में विपक्ष रसोई से नहीं, रिसर्च से मजबूत होता है। और याद रखिए— मीडिया की प्लेट भरने से पहले अगर जनता की उम्मीदें भर दीजिए, तो पत्रकार खुद चलकर आपके दरवाज़े आएँगे। वरना इतिहास यही लिखेगा कि एक समय ऐसा भी आया था जब कुछ लोग सरकार को सवालों से नहीं, मटन-चावल से घेरने निकले थे।
