धर्म

महावतार बाबाजी का स्वभाव ही प्रेम है, क्योंकि वे जानते थे कि सिर्फ प्रेम से ही संसार को परिवर्तित किया जा सकता हैः स्वामी ईश्वरानन्द

योगदा सत्संग आश्रम के वरिष्ठ संन्यासी स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने आज योगदा सत्संग आश्रम के श्रवणालय में आयोजित रविवारीय सत्संग में शामिल योगदा भक्तों को संबोधित करते हुए योगदा संत परम्परा में शामिल प्रेमावतार स्वामी परमहंस योगानन्द जी द्वारा लिखित योगी कथामृत में वर्णित महावतार बाबाजी के गुप्त रहस्यों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि योगी कथामृत रोचक, ज्ञानवर्द्धक व भारतीय संत परम्पराओं को उल्लेखित करनेवाली पुस्तक है, जो आज भी आध्यात्म से जुड़े रहनेवालों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हैं।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि इसी पुस्तक में महायोगी महावतार बाबाजी से जुड़ी कई प्रसंग है। इन प्रसंगों के मूल में जब आप जायेंगे तो पायेंगे कि बाबाजी की मुख्य संदेश यही है कि हम सभी ईश्वर की संतान है और शांति और आनन्द में आपका रहना मूल अधिकार है। उन्होंने कहा कि आज की वर्तमान स्थितियों के देखने से साफ पता चलता है कि लोगों का जीवन अनिश्चितिताओं व अशांति से बीत रहा है। परन्तु ये इसलिए है कि लोगों ने स्वयं को नहीं पहचान कर, स्वयं को शरीर मान रखा है।

उन्होंने कहा कि हमें आनन्द और शांति को प्राप्त करने के लिए कहीं जाने की जरुरत नहीं, बल्कि जहां हैं सिर्फ वहीं प्रयास करने की जरूरत है। वे कहते है कि 25 जुलाई 1920 की घटना है। उस वक्त स्वामी परमहंस योगानन्द जी मात्र 27 वर्ष के थे और एक बंद कमरे में ध्यानमग्न अवस्था में बैठकर अपने प्रश्नों का हल ढूंढ रहे थे। तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया। जब परमहंस योगानन्द जी ने दरवाजा खोला तो उन्होंने पाया कि उनके सामने महावतार बाबाजी खड़े थे। महावतार बाबाजी परमहंस योगानन्दजी से कहते हैं कि तुम्हारी प्रार्थना सुन ली गई है। डरो मत। अमरीका जाओ। वहां तुम्हारा संरक्षण किया जायेगा।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि आगे महावतार बाबाजी ने परमहंस योगानन्दजी से यह भी कहा कि तुम ही हो, जिसे हमने क्रिया योग के प्रचार-प्रसार के लिये चुना है। बहुत पहले तुम्हारे गुरु युक्तेश्वर गिरि को हमने 1894 के कुम्भ मेले में ही कह दिया था कि मैं उसके पास एक शिष्य भेजूंगा। वो शिष्य तुम ही थे। जब यह घटना घट रही थी। तब 1894 में उस वक्त परमहंस योगानन्द जी मात्र एक वर्ष के थे, क्योंकि उनका जन्म ही 1893 में हुआ था।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि बाबा जी ने कहा था कि एक सामान्य व्यक्ति भी क्रिया योग के अभ्यास द्वारा व्यक्तिगत इन्द्रियातीत अनुभव प्राप्त करेगा। कई राष्ट्रों के लाखों लोग इस पद्धति से ये व्यक्तिगत इन्द्रियातीत अनुभव प्राप्त करेंगे। जिससे विश्व शांति स्थापित होंगी। उन्होंने कहा कि अभी जो इस श्रवणालय में उपस्थित है, वे भी उस दिव्य परिकल्पना के ही हिस्सा है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने जोर देकर कहा कि पहली बार अगर किसी ने बाबाजी के बारे में लिखा तो वे परमहंस योगानन्दजी ही थे। उन्होंने कहा कि आज भी महावतार बाबाजी शारीरिक रूप में विद्यमान है। वे आज भी बद्रीनाथ के हिमालयी क्षेत्रों में आसानी से विचरण करते रहते हैं। ये साधारण संन्यासी नहीं, बल्कि अवतारी पुरुष है। उनका संपूर्ण जीवन मानव उत्थान के लिए है। उनके जन्मस्थान और परिवार के बारे में किसी को पता नहीं। वे देश व काल से परे हैं। वे साधारणतया हिन्दी बोलते हैं। लेकिन वे किसी भी भाषा में बातचीत कर सकते हैं। वे कभी-कभी ही प्रकट होते हैं।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि वे समय से अछूते हैं। वे हजारों वर्षों से विद्यमान हैं। गौरवर्ण है। दिव्य काठी के हैं। हमेशा 25 के उम्र की ही दिखते हैं। जिन्होंने उन्हें देखा है, उनका कहना है कि वे लाहिड़ी महाशय जैसा दिखते हैं। वे मानवीय आकलन से परे और अकल्पनीय हैं। आध्यात्मिक अवस्थाओं की कई श्रेणियां होती है। उनमें से एक महावतार भी है। वे इसी श्रेणी में आते हैं। वे मनुष्य और ईश्वर के बीच सेतु की तरह हैं, इसीलिए उन्होंने देह धारण किया है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि उन्होंने ही आदि शंकराचार्य और कबीर जैसे संतों को दीक्षा दी थी। उनका मार्गदर्शन किया था। वे इस कल्प के अंत तक रहेंगे, अपना शरीर नहीं त्यागेंगे। युग आयेंगे, जायेंगे। सभ्यता आयेंगी जायेंगी, पर बाबा जी रहेंगे, वे मार्ग दिखाते रहेंगे। वे क्रिया योग के उद्धारक हैं जो संत परम्पराओं के माध्यम से हम तक पहुंचा है। क्रिया योग विशेष श्वास प्रक्रिया है, जिसके द्वारा प्राण शक्ति को नया आयाम मिलता है, जिससे मन की चंचलता पर अंकुश लगता है, जिसके बाद मनुष्य को ईश्वर की छवि दिखने लगती है। यही क्रिया योग विज्ञान है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि इस क्रिया योग विज्ञान की खोज सतयुग में हुई। इसकी चर्चा श्रीमद्भगवद्गीता में भी की गई है। लेकिन कालांतराल में यह विलुप्त हो गया। पुनः महावतार बाबा जी चाहते थे कि इस क्रिया योग का पुनरुद्धार किया जाये। इसके लिए उन्हें एक उन्नत आत्मा की तलाश थी। उन्हें लाहिड़ी महाशय मिले। लाहिड़ी महाशय गृहस्थ थे। महावतार बाबाजी ने एक गृहस्थ को इसके लिए चुनकर संदेश दे दिया कि क्रिया योग केवल संन्यासियों के लिए ही नहीं, बल्कि एक गृहस्थ भी इसके द्वारा ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने बताया कि 1861 की घटना है। उस वक्त लाहिड़ी महाशय पटना के दानापुर में मिलिट्री इंजीनियरिंग विभाग में एकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थे। अचानक उनका ट्रांसफर दानापुर से रानीखेत हो गया। वे रानीखेत पहुंचने के बाद जब एक दिन वहां द्रोणगिरि पर्वत पर टहल रहे थे। तब उन्हें ऐसा अनुभव हुआ कि कोई उन्हें पुकार रहा है। जिस तरफ से आवाज आ रही थी, वे उस ओर चल पड़े। अचानक देखा कि एक व्यक्ति उनके सामने खड़ा है और वो व्यक्ति उन्हें बाहों में भर लिया। दरअसल वे और कोई नहीं महावतार बाबाजी ही थे। महावतार बाबाजी उन्हें गुफा में ले गये।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि जब महावतार बाबाजी ने लाहिड़ी महाशय को गुफा में ले जाकर सिर पर हाथ फेरा, तो लाहिड़ी महाशय को अपने पूर्व जन्मों की सारी बातें स्मरण होने लगी। महावतार बाबाजी ने कहा कि वे उनका तीन दशकों से इंतजार कर रहे थे। उनके मृत्यु के बाद भी वे उन्हें छोड़े नहीं थे। बल्कि उन पर उनका ध्यान था। जब वे इस जन्म में आये तो उन्होंने ही दानापुर से रानीखेत आने के लिए स्थानान्तरण का बीजारोपण किया। उसी समय महावतार बाबाजी ने स्वर्ण महल की रचना की और उसी स्वर्ण महल में लाहिड़ी महाशय को उन्होंने क्रिया योग की दीक्षा दी। दरअसल स्वर्ण महल की रचना इसलिए महावतार बाबाजी ने की थी कि किसी जन्म में लाहिड़ी महाशय ने स्वर्ण महल में रहने की इच्छा पाल रखी थी। महावतार बाबा जी ने उनकी इस इच्छा को भी पूरा किया।

स्वामी ईश्वरानन्द ने बताया कि दरअसल जो महायोगी होते हैं। वे सारी इच्छाओं को पूरा करने का सामर्थ्य रखते हैं। यह सामर्थ्य प्रत्येक आत्मा में हैं। जब हम अपनी इच्छाशक्ति को ईश्वर के साथ एकाकार कर लेते हैं, तो हमारे अंदर भी वो सारी शक्तियां निहित हो जाती है। उन्होंने कहा कि लाहिड़ी महाशय को वहां से भौतिक संसार में क्रिया योग को पहुंचाने का काम दिया गया। उन्हें कहा गया कि लोगों को बताओ कि गृहस्थ में रहकर भी क्रियायोग के माध्यम से स्वयं को ईश्वर के साथ एकाकार किया जा सकता है। जन्म-मरण के भय से सदा के लिए मुक्त हुआ जा सकता है।

स्वामी ईश्वरानन्द बताते है कि वहां से फिर लाहिड़ी महाशय दानापुर लौटते हैं और फिर वहां से वाराणसी में अपना निवास स्थान बनाते हैं। इसके बाद यही लाहिड़ी महाशय प्रियानाथ करार को अपना शिष्य बनाते हैं, जो आगे चलकर युक्तेश्वर गिरि के नाम से विख्यात होते हैं। उन्होंने ही पूर्व और पश्चिम को एक करने की बात की थी और इसके लिए क्रिया योग को चुना। यही युक्तेश्वर गिरि जी के पास परमहंस योगानन्द पहुंचे, क्योंकि महावतार बाबाजी ने पूर्व में ही ये सारी बातें कह डाली थी। वहीं हुआ। 1861 से जो क्रिया योग की जो गंगा बही, वो भगीरथ के उस गंगा की तरह बही, जिसमें डुबकी लगाकर आज लाखों लोग भयमुक्त हो रहे हैं।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि जब 1920 में अमरीका में धार्मिक उदारवादियों का अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ। इस दौरान कई प्रकार के प्रश्न परमहंस योगानन्द जी के मन में उठने लगे, जिन प्रश्नों और जिज्ञासाओं को महावतार बाबाजी ने शांत किया। परमहंस योगानन्द जी अमरीका गये। वहां उन्होंने सेल्फ रियलाइजेशन फैलोशिप की स्थापना की। भारत में यही काम योगदा सत्संग आश्रम कर रहा है। परमहंस योगानन्द जी ने केवल यही नहीं किया। उन्होंने योगदा सत्संग पाठमालाएं भी दी। इन पाठमालाओं ने हमें आध्यात्मिक मार्ग दिखाएं। बताया कि कैसे स्वयं को ईश्वर के साथ एकाकार किया जा सकता है।

स्वामी ईश्वरानन्द गिरि ने कहा कि आप आज भी ये पाठमालाएं पढ़ेंगे तो पायेंगे कि इसमें सब कुछ हैं। संत परम्पराओं के महत्वपूर्ण ज्ञान उसमें निहित हैं। इसे आप जितनी बार पढ़ेंगे, आपकी उतनी ही आध्यात्मिक प्रगति होंगी। उन्होंने कहा कि एक सवाल उठता है कि महावतार बाबाजी का स्वभाव क्या है? यही सवाल कभी दयामाता जी के मन भी आया था। दयामाता जी जब भारत आई तो वह रानीखेत गई। बाबाजी की गुफा में ध्यान लगाया और महावतार बाबाजी के स्वभाव को जानने की कोशिश की। अचानक उन्हें लगा कि लाखों प्रेम की तरंगे एक साथ उनके हृदय में हिलोरें मारने लगी। ऐसा लगा कि इन प्रेम की तरंगों से उनका हृदय फट जायेगा और उन्हें ये जानते देर नहीं लगी कि महावतार बाबाजी का स्वभाव प्रेम है।

स्वामी ईश्वरानन्द ने कहा कि बाबाजी कहा करते थे कि उनका स्वभाव प्रेम है। यह प्रेम सभी के लिए हैं। क्योंकि केवल प्रेम से संसार को परिवर्तित किया जा सकता है। जो भी अपने हृदय को उनके लिए खोलेगा, निरन्तर क्रिया योग का अभ्यास करेगा, ईश्वर भक्ति में लीन रहेगा, वे उन्हें दिखेंगे, उन्हें उनका अनुभव होगा। स्वामी ईश्वरानन्द ने यह भी कहा कि उनका एक स्वभाव विनम्रता भी रहा है और ये उन्होंने लाहिड़ी महाशय को उस वक्त दिखाया, जब कुम्भ के मेले में लाहिड़ी महाशय को एक संत को देखकर लगा कि वो ढोंगी हैं। अचानक लाहिड़ी महाशय ने देखा कि महावतार बाबाजी उसी संत का पाद प्रक्षालन कर रहे हैं और लाहिड़ी महाशय को देखकर कहा कि अभी तो मैं इस संत का पाद प्रक्षालन कर रहा हूं, थोड़ी देर के बाद इनके लिए भोजन भी वे बनायेंगे। इस प्रकार लाहिड़ी महाशय को उन्होंने विनम्रता का पाठ पढ़ाया।

स्वामी ईश्वरानन्द ने वो कहानी भी सुनाई कि कैसे महावतार बाबाजी ने एक जलती लकड़ी से एक अपने भक्त के कंधे जला दिये और जिसे देखकर लाहिड़ी महाशय को बहुत पीड़ा हुई थी। लाहिड़ी महाशय को पीड़ा देख, महावतार बाबाजी ने कहा था कि इस थोड़ी सी पीड़ा देखकर तुम्हें इतना दुख हो रहा है और इससे भी बड़ी पीड़ा उसको पूर्व जन्म के कर्मफलों के आधार पर मिलनेवाली थी, अगर वो मिलती तो क्या करते। मैंने तो उसके कर्मफलों से जो अत्यधिक पीड़ा मिलती, उस पीड़ा से उसे उबार दिया।

स्वामी ईश्वरानन्द ने कहा कि लाहिड़ी महाशय कहा करते थे कि महावतार बाबा जी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं। कोई भी व्यक्ति जैसे ही महावतार बाबाजी का एक बार भी नाम लेता हैं। उसे तत्क्षण उन्हें उनका आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है। बाबाजी संपूर्ण मानव जाति का कल्याण चाहते थे, इसलिए उन्होंने क्रिया योग से सभी को जोड़ने को कहा था। जो भी व्यक्ति क्रिया योग का अभ्यास करेगा, वो निश्चय ही जीवन-मरण से भय मुक्त होकर शांति व आनन्द को प्राप्त करेगा।

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