अपनी बात

जिस आर्गेनाइजेशन से वो जुड़ा है भला उसे कौन हरायेगा? वो पार्टियां जो इनके चंदे से जीवित हैं, वो अखबार जो इनके द्वारा उपकृत होते हैं, वे रीढ़विहीन विधायक व पत्रकार उसे चुनौती देंगे, जो उनके टुकड़ों पर पलते हैं

जिस आर्गेनाइजेशन से वो जुड़ा है, उस आर्गेनाइजेशन से कौन ऐसी पार्टियां हैं, जो चंदा नहीं लेती। कौन ऐसी मीडिया हाउस हैं, जो उपकृत नहीं होती। ऐसे में उसे जीतना ही था। इसलिए ज्यादा आप अपना दिमाग मत लगाइये। इस घिनौने सच को स्वीकार कीजिये। स्वीकार कीजिये कि आपके राज्य में एक भी रीढ़ की हड्डीवाला विधायक या पत्रकार नहीं हैं। सभी रीढ़विहीन हैं।

यह राज्य कभी गुजरात या महाराष्ट्र के समकक्ष खड़ा भी नहीं हो पायेगा। ये जिंदगी भर उन प्रदेशों में मजदूर सप्लाई करेगा/करायेगा और उनकी जी-हुजूरी करते हुए अपना जीवन निर्वहण करेगा। क्योंकि जो चंदे पर जीते हैं, उनकी औकात नहीं होती, अपने मालिक के सामने खड़े होने की। उनसे आंख मिलाकर बातें करने की।

अरे आपने नहीं देखा कि हाल ही में मुंबई में उसी के संस्थान से जुड़े एक बड़े धन्नासेठ के यहां शादी हुई और उस शादी में जाने के लिए जिन-जिन पॉलिटिशियनों को निमंत्रण मिली थी। वे अपने घर के सारे सदस्यों को लेकर वहां पहुंचे थे। ये पॉलिटिशयन उनके यहां से मिले उपहारों को इस प्रकार से लेकर लौटे थे। जैसे कोई भक्त भगवान का प्रसाद लेकर लौटता है। इस प्रकार की परिदृश्यों को देखकर भी आप उससे जुड़े लोगों की हार की कामना करते हैं।

अरे आपकी ये हिम्मत कैसे हो गई। उसे आंखें दिखाने की। वे तो महान आत्मा हैं। वे युगद्रष्टा हैं। वे सदा जीतने के लिए बने हैं। उनके पांव आपके ही कारण, आपके राज्य की जनता की छाती पर कूदने का अवसर प्रदान करते रहेंगे और आप कूदवायेंगे। चाहे आप सत्ता में रहे या विपक्ष में। जब भी आपको मौका मिलेगा। उसे आप अवसर प्रदान करेंगे।

वो चाहता तो अपने राज्य से भी चुनाव जीत सकता था। लेकिन वो अपने राज्य से क्यों चुनाव लड़ेगा। जबकि वो जानता है कि वहां से उनके लोग ही जीतेंगे। इसलिए वो उन जगहों से जीतने की कोशिश करता है। जहां के लोग अपना मूल्य लगाने के लिए सदैव तैयार रहते हैं। पहली बार जिसने दांव लगाये और जीत गया। भला उसे तीसरी बार यहां आकर जीतने में कौन चुनौती देगा। चाहे उसके द्वारा बनाया गया कोई संस्थान सात-आठ साल में ही क्यों न दांत निपोड़ दें।

हम बिहारी/झारखण्डी तो सदैव दूसरे के लिए जान देने के लिए ही तो बने हैं और जब कोरोना जैसी महामारी हो तो गुजरात और महाराष्ट्र से लात खाते हुए अपने घर की ओर लौटने के लिए जन्म लिये हैं। चाहे अपना घर लौटते-लौटते हमारी जान ही क्यों न चली जाये। इसलिए अपनी इस बहुमूल्य संस्कृति को जान देकर भी नहीं छोड़ना है।

हम अपने ही वोट से दूसरे राज्यों के पूंजीपतियों/धन्नासेठों/रक्तपिपासुओं को जीतायेंगे, चाहे वो लोकसभा का चुनाव हो या राज्यसभा का चुनाव और खुद दूसरे राज्यों में दो रोटी की तलाश के लिए, अपनों का स्वास्थ्य ठीक करने के लिए जानवरों की तरह लद कर ट्रेन से जायेंगे और कहेंगे कि ये तो हमारी किस्मत में लिखा हैं। लेकिन ये भूलकर नहीं कहेंगे कि हमारे ही विधायकों/सांसदों/मीडिया हाउस में काम कर रहे जमीर बेच चुके पत्रकारों ने हमारी जिंदगी को जानवरों से भी बदतर बना दिया है।

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