अपनी बात

ये वही परिमल नाथवानी हैं जिनकी सांसद आदर्श ग्राम योजना बड़ाम में मात्र छह से आठ साल में ही टें बोल दी, फिर भी यहां के विधायकों व पत्रकारों के लिए पता नहीं कैसे वो युगद्रष्टा बने हुए हैं?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2014 को सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत की थी। इस दौरान उन्होंने सभी सांसदों से अपील की थी कि वे अपने-अपने संसदीय इलाकों के एक-एक गांव को गोद लेकर, उसे आदर्श ग्राम के रूप में विकसित करें। जैसे ही प्रधानमंत्री ने यह घोषणा की, उसके बाद लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों ने अपनी-अपनी इच्छानुसार एक-एक गांव को गोद लेना प्रारंभ किया। जिन सांसदों ने जिस गांव को गोद लिया। वहां बड़े-बड़े होर्डिंग लगा दिये गये। इस गांव को फलां सांसद ने गोद ले लिया।

जिस गांव को गोद लिया गया। वहां के ग्रामीण भी खुश हो गये। चलो, अब हमारे गांव का भाग्य जग गया। अच्छी सड़कें, अच्छी नालियां, अच्छे स्कूल, बिजली के खंभे, स्ट्रीट लाइट, रोजगार के अवसर आदि देखने को मिलेंगे। कुछ गांवों में तो ऐसा लगा कि क्रांति हो गई। क्रांति जैसा दिखा भी। पर ये क्रांति ज्यादा दिनों तक नहीं टिकी। क्योंकि जिनको क्रांति करना था। उन्होंने अपने-अपने कार्यकर्ताओं या ऑफिस में बैठनेवाले महालंपटों की सहायता से उन गांवों में क्रांति करने शुरु किये। जिसका असली फायदा इन महालंपटों ने उठाया और ग्रामीण ठगे से रह गये।

मेरा तो सीधा सा सवाल है कि जिन सांसदों ने इन गांवों को गोद लिया था। जिन सांसदों के नाम इन गांवों के शिलापट्टों पर खुदे हैं। जिन सांसदों से जुड़े महालंपट ठेकेदारों/उनके ऑफिस में बैठनेवाले उनके अधिकारियों/प्रशासनिक अधिकारियों/ इंजीनियरों ने इन गांव में क्रांति की थी। जरा वे बताएं कि उनके द्वारा इन गांवों में बनाये गये भवनों की आयु क्या थी? क्या कोई भी नवनिर्मित भवन की आयु छह से आठ साल मात्र होती है? सवाल यह भी है कि इन महालंपटों के द्वारा बनाये गये भवन छह से आठ साल में ही क्यों दम तोड़ देती हैं?

लेकिन इन महालंपटों के अपने भवन (जिनमें इनकी पत्नी/प्रेमिका, उनके बेटे-बेटियां, बहू-दामाद रहते हैं) पचास सालों के बाद भी शान से उनके अपने इलाके में कैसे खड़ी रहती है? इसका भी उत्तर में दे देता हूं, क्योंकि इनके अपने मकानों में कोई कमीशन खानेवाला नहीं होता, जबकि आम जनता के लिए बनाये जानेवाले भवनों में कमीशन खानेवालों की एक लंबी सूची होती है।

मैं इसी सच्चाई को देखने व आम जनता के समक्ष उस सच्चाई को रखने के लिए 13 जून 2026 को रांची के बड़ाम गांव गया था। जिसे कभी परिमल नाथवानी ने गोद लिया था। जब परिमल नाथवानी ने गोद लिया था। तो यहां भी नामकुम-टाटीसिलवे के मेन रोड पर परिमल नाथवानी का उस समय बड़ा सा होर्डिंग लगा था।

जिसमें लिखा था – माननीय सांसद परिमल नाथवानी द्वारा सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत गोद लिया गया गांव – बड़ाम। बड़ाम के ग्रामीण बताते हैं कि जैसे ही परिमल नाथवानी ने इस गांव को गोद लिया था। इस गांव में चहल-पहल बढ़ गई थी। बड़ी संख्या में अधिकारियों का दल, परिमल नाथवानी के ऑफिस में बैठनेवाले लोग, ठेकेदार-इंजीनियर आने शुरु हो गये। कई भवन भी धीरे-धीरे बनने लगे। जो मात्र आठ-दस साल में ही टें बोल दिये।

आखिर परिमल नाथवानी कौन है?

झारखण्ड के विधायकों/प्रमुख संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों/पत्रकारों/यूट्यूबर्स की नजरों में परिमल नाथवानी युगद्रष्टा है। उन्हें कई नामों से पुकारा जाता है। उनके कई पर्यायवाची नाम है। जैसे – परिमल नाथवानी भगवान, विधायक उद्धारक, समस्त दल उद्धारक, मोदी प्रिय, अमित शाह प्रिय, सरयू प्रिय, बाबूलाल प्रिय, मूलवासी रक्षक, आदिवासी रक्षक, प्रणव स्वप्न तोड़क, सर्वप्रिय, प्रभात खबर उद्धारक, लक्ष्मी अखण्ड विश्वासी, स्वहित रक्षक, राज्यसभा प्रेमी, यू-ट्यूबर्स उद्धारक, सर्वपत्रकार उद्धारक, सांसद कोटा राशि जनता चटावक आदि।

यही परिमल नाथवानी सर्वप्रथम झारखण्ड से मई 2008 में सर्वप्रथम निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े और आसानी से जीत गये। फिर 2014 में भी ये यहीं से निर्दलीय लड़े, जीत गये। इसके बाद इन्होंने आंध्र प्रदेश से खुद को आजमाया, जीत गये और अब फिर झारखण्ड में 2026 में आ धमके हैं। उनकी धमक यत्र-तत्र-सर्वत्र दिखाई/सुनाई पड़ रही है। हर कोई उनकी जय-जयकार कर रहा है। सर्वाधिक जय-जयकार वे विधायक और पत्रकार व अखबार कर रहे हैं, जिन पर परिमल नाथवानी भगवान की सदैव कृपा रही है। वे भी निफिक्र होकर बैठे हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि कभी मुंशी प्रेमचंद ने अपनी सुप्रसिद्ध कहानी नमक का दारोगा में लिखा था कि स्वर्ग में भी लक्ष्मी का ही राज चलता है। मुंशी प्रेमचंद ने यह संवाद नमक का दारोगा के एक प्रमुख पात्र पं. अलोपीद्दीन के मुख से निकाला था।

ये हैं बड़ाम में बना लीगल सर्विसेज क्लीनिक के हॉल का दृश्य, मतलब समझ सकते हैं कि सांसद आदर्श ग्राम योजना में कैसे काम हुए हैं?

हर पत्रकार आजकल ये कहने में लगा है कि परिमल नथवानी जैसा युगद्रष्टा आज तक झारखण्ड को नहीं मिला। इन्होंने बहुत सारे काम करवाये। लेकिन विद्रोही24 जब परिमल नाथवानी के कार्यों का जायजा लेता है, तो विद्रोही24 के मुख से परिमल नाथवानी के लिए प्रशंसा के एक शब्द भी नहीं निकलते, क्योंकि विद्रोही24 ऐसे चालाक लोगों की धूर्तई अच्छी तरह से जानता है। आप भी जाकर देखिये। रांची से बड़ाम कोई ज्यादा दूर नहीं हैं। वहां परिमल नाथवानी ने बहुत सारे काम करवाये हैं, आप खुद जाकर देखिये कि अभी की क्या स्थिति है? और उन्हें देखकर अपने घर का भी जायजा ले लीजिये कि आपका ही मकान जिसे आपके बाप-दादा ने बरसों पहले बनवाये, वो दांत क्यों नहीं निपोड़ रहा। ये परिमल नाथवानी के सांसद कोटे से बना भवन छह-आठ साल में ही क्यों दांत निपोड़ दिया।

बड़ाम स्थित मॉडल स्कूल नामकुम के छत का हाल देखिये, वो भी मात्र छह से आठ साल में, आखिर नेताओं, ठेकेदारों, परिमल नथवानी के ऑफिस में बैठनेवाले महान योद्धाओं की घरों के छतों के हालात इतनी जल्दी खराब क्यों नहीं होते?

यह है मॉडल स्कूल नामकुम, जो 2012 में स्थापित हुआ। जिसका भवन परिमल नाथवानी की कृपा से आठ-दस साल पहले बनना प्रारंभ हुआ। जब यह बनना प्रारंभ हुआ। तो इसे बनते हुए यही के युद्धिष्ठिर महतो ने अपनी आंखों से देखा था। युद्धिष्ठिर महतो कहते है कि जब से ये बना उसी समय से इसका छत चुने लगा था। अब तो जैसे ही बारिश होती है। इन छतों से हरहरा कर पानी गिरता है। कब ये छत उपर से गिर जाये, कुछ कहा नहीं जा सकता। इस स्कूल के कई जगहों पर तो लोहे के छड़ भी छतों से अलग होते दिख रहे हैं।

यही पर लीगल सर्विसेज क्लीनिक भी चल रहा है, जिसके निर्माण का शिलान्यास नवम्बर 2016 में किया गया था। इसका मतलब है कि भवन निर्माण में एक-दो साल और लगे होंगे। वर्तमान में साल चल रहा है 2026 और अब देखिये इस लीगल सर्विसेज क्लीनिक के अंदर के हॉल का हाल, आप खुद शर्म से शर्मसार हो जायेंगे।

बड़ाम स्थित मॉडल स्कूल के छत का एक दृश्य, ये हाल है मात्र छह-आठ साल में

लेकिन परिमल नाथवानी और उनमें युगद्रष्टा का भाव देखनेवाले शर्मसार नहीं होंगे। इसी प्रकार परिमल नाथवानी की कृपा से यहां बहुत कुछ बना और चला भी। लेकिन दस साल बीतते-बीतते सब की हालत पस्त है। लेकिन जिन लोगों के हाथ परिमल नाथवानी के इस कार्य में लगे हैं, आप जरा उनके घर जाकर देखिये। आज भी शान से खड़े हैं। कहीं आपको सीलन नहीं दिखेंगी, कहीं उस घर के किसी भी भाग से लोहे का छड़ नहीं दिखेगा। कोई खिड़की में लगी लोहे में जंग नहीं दिखेगा। फिर भी लोग परिमल नाथवानी को ऐसे भज रहे हैं, जैसे वो तारणहार हो।

बड़ाम स्थित मॉडल स्कूल नामकुम के छत का एक दृश्य, जिससे लोहे का छड़ बाहर आ गया है।

हां, उन्हें तारणहार जरुर कहना चाहिए, जिसके लिए एक इशारे पर परिमल नाथवानी आशा भोसलें तक को रांची बुला लेते हैं। जरा एक आम आदमी, इस व्यक्ति से अपना काम करा लें या उसके पास पहुंच जाये तो, ये संभव ही नहीं। फिर भी परिमल युगद्रष्टा है। भाजपाइयों के कर्णधार है। सरयू के प्राणाधार है। प्रभात खबर के तो कण-कण में बसे हैं। अब तो कुछ और नये-नये नमूने पैदा ले लिये हैं। जो खरी-खरी के नाम से फेसबुक पर परिमल नाथवाणी के भजन गा रहे हैं।

(विशेष- आपकी जानकारी के लिए सबूत के तौर पर, इस आलेख में कई सारे फोटो दिये गये हैं, उसे ध्यान से देखिए और अपना ज्ञान बढ़ाइये।)

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