धर्म

वरिष्ठ अधिवक्ता अभय कुमार मिश्र की कलम से…, क्या इसी कारण हिन्दू धर्म से विमुख हो रहे हैं लोग?

ज्येष्ठ पूर्णिमा के पावन अवसर पर इस वर्ष मेरा भगवान जगन्नाथ के दर्शन हेतु पुरी आगमन का यह 50वाँ अवसर था। बचपन में माता-पिता के साथ और बाद के वर्षों में अपने परिवार के साथ मैं नियमित रूप से इस अवसर पर पुरी आता रहा हूँ। इसलिए मंदिर की व्यवस्था में आए परिवर्तनों का प्रत्यक्ष साक्षी भी रहा हूँ।

आज एक प्रश्न मेरे मन को बार-बार विचलित कर रहा है—यदि धर्मस्थलों में श्रद्धा के स्थान पर व्यापार और सेवा के स्थान पर शोषण दिखाई दे, तो क्या लोगों का धर्म से मोहभंग होना स्वाभाविक नहीं है? मेरा मानना है कि हिन्दू समाज धर्म परिवर्तन इसलिए नहीं कर रहा कि हिन्दू धर्म में कोई कमी है। न ही इसका कारण हमारे शास्त्र, परम्पराएँ या आध्यात्मिक सिद्धांत हैं। समस्या वहाँ उत्पन्न होती है जहाँ धर्म को साधना के बजाय व्यवसाय बना दिया जाता है।

पुरी मंदिर में इस बार का अनुभव

इस वर्ष भी मैं अपनी पुत्री के साथ भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए पहुँचा। मोबाइल जमा कर हम सुबह लगभग 7:30 बजे कतार में खड़े हुए। मेरे पीछे हजारों श्रद्धालु थे, जिनमें वृद्ध, महिलाएँ और आर्थिक रूप से कमजोर लोग भी शामिल थे। कतार में खड़े-खड़े मैंने देखा कि कुछ लोगों को पैसे लेकर बिना लाइन के भीतर भेजा जा रहा था। कथित रूप से 500 रुपये से लेकर 5000 रुपये तक की राशि लेकर विशेष प्रवेश दिया जा रहा था। राशि व्यक्ति की आर्थिक स्थिति देखकर तय होती प्रतीत हो रही थी।

मैंने इसका विरोध किया। मैंने कहा कि मेरे पीछे 80 वर्ष से अधिक आयु के अनेक बुजुर्ग कई घंटों से प्रतीक्षा कर रहे हैं। यदि धनवान व्यक्ति पैसे देकर सीधे दर्शन कर लें और गरीब श्रद्धालु घंटों कतार में खड़े रहें, तो यह व्यवस्था न्यायपूर्ण कैसे कही जा सकती है? मुझे उत्तर मिला कि यदि सुविधा चाहिए तो पैसे दीजिए, अन्यथा चुपचाप लाइन में लगे रहिए। मैं स्वयं भी 500 या 1000 रुपये देने में सक्षम था, परन्तु प्रश्न मेरी सुविधा का नहीं था। प्रश्न उन हजारों श्रद्धालुओं का था जो घंटों धूप और भीड़ में केवल भगवान के दर्शन की आशा लेकर खड़े रहते हैं।

पश्चिम द्वार की घटना

एक श्रद्धालु महिला ने सुझाव दिया कि हम पश्चिम द्वार से प्रवेश का प्रयास करें। वहाँ पहुँचते ही कुछ लोगों ने पूछा कि कितने व्यक्ति हैं। जब हमने बताया कि हम दो लोग हैं, तो हमसे दो हजार रुपये की मांग की गई। मैंने स्पष्ट कहा कि जब सिंह द्वार पर भी मैंने पैसे नहीं दिए, तो यहाँ क्यों दूँ? यदि हजारों श्रद्धालु बिना दर्शन लौट जाएँ और मैं पैसे देकर विशेष सुविधा प्राप्त कर लूँ, तो यह मेरे लिए भी उचित नहीं होगा। मेरे इतना कहते ही कुछ लोग आक्रामक हो गए। ऊँची आवाज़ में बात की गई और मुझे लाइन से हट जाने को कहा गया। वातावरण ऐसा बन गया कि श्रद्धा के स्थान पर भय और असहजता महसूस होने लगी।

शिकायत दर्ज कराने का प्रयास

घटना के बाद मेरा मन दर्शन से अधिक व्यवस्था के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने की ओर गया। मैं सीधे मंदिर प्रशासन के कार्यालय पहुँचा। शुरुआत में कर्मचारियों ने मुझे दानदाता समझकर स्वागत किया, लेकिन जब मैंने कहा कि मुझे शिकायत दर्ज करनी है, तो अधिकांश लोग वहाँ से हट गए।

लगभग डेढ़ घंटे तक मैं कार्यालय में भटकता रहा। कई अधिकारियों से बात हुई, परन्तु शिकायत लेने की बजाय मुझे पुलिस में जाने की सलाह दी जाती रही। मेरा प्रश्न था कि यदि मंदिर परिसर में अनियमितता की सूचना मंदिर प्रशासन को दी जा रही है, तो उस पर कार्रवाई प्रारम्भ करना प्रशासन का दायित्व क्यों नहीं है?

काफी प्रयास के बाद मैंने लिखित शिकायत तैयार करवाई और उसकी प्राप्ति रसीद माँगी। आश्चर्य की बात यह रही कि एक साधारण प्राप्ति रसीद देने में भी अनावश्यक टालमटोल की गई। अंततः उच्च अधिकारियों से संपर्क करने की बात कहने पर रसीद प्रदान की गई।

व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न

मेरे अनुभव ने कई गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं—

  • क्या मंदिरों में दर्शन का अधिकार धन के आधार पर निर्धारित होना चाहिए?
  • क्या गरीब श्रद्धालुओं की आस्था का कोई मूल्य नहीं?
  • क्या मंदिर प्रशासन की जिम्मेदारी केवल आय बढ़ाना है या श्रद्धालुओं को सम्मानजनक व्यवस्था उपलब्ध कराना भी है?
  • क्या धर्मस्थलों में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए?
  • क्या सनातन की रक्षा केवल नारों से होगी?
  • सनातन धर्म की शक्ति उसके सिद्धांतों, दर्शन और आध्यात्मिकता में है। लेकिन यदि मंदिरों में अव्यवस्था, कथित भ्रष्टाचार और श्रद्धालुओं के साथ असमान व्यवहार जारी रहा, तो इससे क्या समाज में निराशा उत्पन्न नहीं होगी?

अंततः

  • धर्म जागरण केवल भाषणों और नारों से नहीं होगा। इसके लिए मंदिरों को श्रद्धा, सेवा, पारदर्शिता और समानता का केंद्र बनाना होगा।
  • सरकारों को मंदिरों को राजस्व का साधन मानने के बजाय आस्था के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए। वहीं मंदिर प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी श्रद्धालु स्वयं को अपमानित, उपेक्षित या शोषित महसूस न करे। यदि वास्तव में सनातन धर्म को मजबूत बनाना है, तो सबसे पहले मंदिरों की व्यवस्था को श्रद्धालु-केंद्रित बनाना होगा। धर्म की रक्षा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण और व्यवस्था से होती है।

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