धर्म

बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना और पुनः माता के गर्भ में शयन करना बुद्धिमानी नहीं, इसलिए ईश्वर को पाने का एकमात्र लक्ष्य रखियेः स्वामी गोकुलानन्द

आत्मा के क्रमिक विकास के नये आयाम को समझाते हुए स्वामी गोकुलानन्द गिरि ने आज रांची के योगदा सत्संग आश्रम में आयोजित रविवारीय सत्संग में योगदा भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि आत्मा सर्वप्रथम जड़मय, उसके बाद प्राणमय, फिर मनमय, तत्पश्चात ज्ञानमय कोष से होते हुए आनन्दमय कोष में स्वयं को विलीन कर देती है। यहीं उसका उद्देश्य भी है और यहीं इसका गंतव्य है। क्योंकि मानव शरीर के उद्देश्य का लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ ईश्वर को प्राप्त करना है।

उन्होंने कहा कि जब हम ईश्वर को छोड़कर, अन्य चीजों को प्राप्त करने के लिए दिमाग लगाना शुरु कर देते हैं तो फिर दुख ही हाथ लगता है। लेकिन जैसे ही हम ईश्वर की प्राप्ति के लिए स्वयं को झोंकते हैं तो फिर आनन्द के सिवा दुसरा कुछ प्राप्त ही नहीं होता। परंतु यह भी तभी होगा जब हम गुरुजी के बताये टीचिंग लेशन को आत्मसात करना सीखें।

उन्होंने बताया कि इस ब्रह्मांड में केवल मनुष्य ही हैं, जो जी चाहे वो कर सकता है। उसके पास फ्री च्वाइस है। हमें कोई भी कुछ करने से नहीं रोक सकता। पर इस कर सकने की कला को हम कैसे उपयोग में लाते हैं, इसी पर हमारे आत्मा का क्रमिक विकास निर्भर करता है। अगर हम आध्यात्मिक प्रविधियों को अपनाते हुए अनुशासित जीवन जीये, तो रोगमुक्त जीवन जीते हुए हमें ईश्वर को पाने के लिए वन मिलियन ईयर लगेंगे।

उन्होंने कहा कि ईश्वर प्राप्त भी तभी होंगे। जब हमारे अंदर उन्हें पाने की इच्छा जगेगी और यह तभी होता है, जब हम मानव शरीर से उपर उठने की सोच पाते हैं। उन्होंने कहा कि माया अर्थात् अपरा और ईश्वर यानी परा इन दोनों के बीच मनुष्य बंधा है। आत्मा को चाहिए कि वो खुद को माया से मुक्त करें। लेकिन माया से पार पाना इतना आसान भी नहीं।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि हमारे जीवन में ईश्वर कई बार मार्ग दिखाते हैं। जिसे महसूस वहीं कर सकता है, जिस पर ईश्वरीय कृपा हो। नहीं तो हमारी हालत उस कटोरे की तरह होगी, जिसे हम उलटकर उसमें पानी रखने की इच्छा रखते हैं। जबकि कटोरे में पानी तभी आयेगी जब हम कटोरे को सीधी तरह रखें।

उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोगों को दूसरी की गलतियां दिख जाती है। लेकिन उन्हें वहीं सारी गलतियां जो उनमें विद्यमान हैं। वो नहीं दिख पाती। अगर वो बुराइयां दूसरी की जगह उन्हें ही दिखने लग जाये तो फिर वे उन बुराइयों को दूर करने की कोशिश करेंगे। जिससे उनके आत्मा का क्रमिक विकास होना शुरु हो जायेगा।

उन्होंने कहा कि हमारे ऋषि-महर्षियों ने इसी कारण से हमारे जीवन को चार आश्रमों में बांटा था। जिसके कारण जीवन की गाड़ी बहुत ही सुंदर ढंग से चलती थी। लेकिन जैसे ही हमने अपने ऋषि परम्पराओं को छोड़ा, हमारी क्या गति हैं, वो किसी से छुपी नहीं। पहले चार आश्रम थे – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ व संन्यास। ये चारों आश्रम हमारी आत्माओं को पुष्ट करते थे। दृढ़ इच्छा शक्ति का भाव भरते थे और उनसे हम अपने आगे की जीवन को, अपनी आत्माओं का विकास कर बैठते थे। ये सारे आश्रम हमें आध्यात्मिकता की ओर ले जाने को प्रेरित करती है।

उन्होंने कहा कि इन्हीं सभी कारणों से जगद्गुरु शंकराचार्य बार-बार कहा करते थे – पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयापारे पाहि मुरारे। भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, गोविन्दम् भज मूढ़ मते।। अर्थात् बार-बार जन्म लेना, बार-बार मरना और पुनः माता के गर्भ में शयन करना – यह संसार चक्र बड़ा ही दुष्कर है। हे श्रीकृष्ण हमें इस संसार सागर से रक्षा करें।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि शंकराचार्य बार-बार कहा करते थे कि जब तक मनुष्य माया में पड़ा है। माया में बंधा है। वह कर्मों के बंधन में बंधा रहता है। इसी के कारण वो जन्म और मृत्यु के चक्कर में पड़ा रहता है। इस संसार सागर में आता-जाता रहता है। वो कितनी बार आयेगा-जायेगा। उसे खुद पता नहीं। लाखों वर्ष लग सकते हैं। इससे बचने का एकमात्र उपाय है आत्मज्ञान को प्राप्त करना, उस ईश्वर की भक्ति में लग जाना।

स्वामी गोकुलानन्द ने कहा कि परमहंस योगानन्द की बताई आध्यात्मिक प्रविधियां और क्रिया योग आपको बड़ी ही सरलता से ईश्वर से एकाकार करने की ओर आपको ले जाती है। उन्होंने कहा कि जैसे ही सामान्य मनुष्य को यह ज्ञान हो जाता है कि उसकी आत्मा ही परब्रह्म है तो वह जन्म और मृत्य से स्वयं को सदा के लिए मुक्त करते हुए मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।