अपनी बात

झारखण्ड हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभय मिश्र ने उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता को कोर्ट कक्ष में ललकारा, जो आपने कहा उसे सिद्ध करिये, नहीं तो फिल्म ‘जॉली एलएलबी’ की तरह वे इसी कक्ष में धरने पर बैठ जायेंगे

झारखण्ड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अभय कुमार मिश्र अपने क्रियाकलापों से हमेशा सुर्खियों में रहते हैं। इनकी सबसे अच्छी आदत यह है कि ये असत्य के आगे कभी झुकते नहीं और कोई चाह लें कि उन्हें असत्य के आगे झुका दें, तो ये संभव नहीं। भले ही इस कारण उनके सामने कई समस्याएं क्यों न खड़ी कर दी जाये। जनाब ने आज भी धमाल किया है। वो धमाल क्या है? सभी को जानना चाहिए …

आज न्याय आयुक्त के न्यायालय में महेश तिवारी द्वारा दायर अपील पर सुनवाई हुई, जिसमें ऋतु कुमार पक्षकार थीं। अपीलकर्ता की ओर से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि दोषसिद्धि के आदेश पर रोक लगाई जाए। उनका कहना था कि इस दोषसिद्धि के कारण उन्हें अत्यंत गंभीर क्षति हो रही है। वे बार काउंसिल का चुनाव जीत चुके हैं, किंतु दोषसिद्धि के कारण उन्हें पद से हटा दिया गया है।

अभय मिश्र ने शिकायतकर्ता की ओर से इसका विरोध करते हुए कहा कि ऐसा किया जाना न्यायोचित नहीं होगा। अपीलकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 354 के अंतर्गत महिला की गरिमा भंग करने के अपराध में दंडित किया गया है। न्यायालय को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि अपीलकर्ता को व्यक्तिगत रूप से कितनी हानि हो रही है, बल्कि यह भी विचार करना चाहिए कि दोषसिद्धि किस प्रकार के अपराध के लिए हुई है।

यदि दोषसिद्धि गंभीर अपराध में हुई है, तो सामान्यतः दोषसिद्धि के आदेश पर रोक लगाना उचित नहीं माना जाता। अपने तर्क के समर्थन में अभय मिश्र उच्चतम न्यायालय के अनेक निर्णयों का उल्लेख किया तथा मनुस्मृति  के श्लोक 337 और 338 भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। अभय मिश्र ने कहा कि भारतीय विधि-व्यवस्था के अनेक सिद्धांत प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में भी प्रतिपादित मिलते हैं।

मनुस्मृति, अध्याय 8, श्लोक 337–338 का भावार्थ यह है कि जो व्यक्ति जितना अधिक शिक्षित, जागरूक और सामाजिक रूप से उत्तरदायी माना जाता है, उसके द्वारा अपराध किए जाने पर दंड भी उतना ही अधिक होना चाहिए। अर्थात् उच्च नैतिक और सामाजिक उत्तरदायित्व वाले व्यक्ति से अधिक आचरण-संयम की अपेक्षा की जाती है।

जब अभय मिश्र ने इससे संबंधित मनुस्मृति के श्लोक पढ़े, तब विपक्ष के वरिष्ठ अधिवक्ता जो उच्चतम न्यायालय से आये थे, ने मनुस्मृति पर आपत्ति व्यक्त की और कहा कि मनुस्मृति तो मनुष्य को कुत्ता भी कहता है, फिर क्या था अभय मिश्र क्रोधित हो गये। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के उक्त अधिवक्ता को यह कहकर चुनौती दी कि आपने जो बोला है, उसे साबित करें, नहीं तो आप को मालूम नहीं, ‘जॉली एलएलबी’ फिल्म की तरह इसी न्यायालय कक्ष में वे धरने पर बैठ जायेंगे। आप श्लोक बताएं कि किस श्लोक में ऐसा लिखा है? नहीं तो अपना शब्द वापस लें। विस्तृत बहस के पश्चात् उन्होंने अपनी टिप्पणी वापस ले ली।

इसके बाद दोनों पक्षों के बीच कई घंटों तक विस्तृत बहस हुई। अपीलकर्ता की ओर से बार-बार दोषसिद्धि के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया, परंतु न्यायालय ने तत्काल कोई स्थगनादेश पारित नहीं किया और आदेश सुरक्षित रख लिया। आदेश सुरक्षित रखे जाने के बाद भी अपीलकर्ता की ओर से पुनः अनुरोध किया गया, किंतु न्यायालय ने उसी समय कोई राहत प्रदान नहीं की।

अभय मिश्र का कहना है कि उनका मानना है कि केवल किसी विशेष कुल में जन्म लेने से कोई व्यक्ति महान नहीं हो जाता। वास्तविक सम्मान ज्ञान, आचरण और नैतिकता से प्राप्त होता है। उनके लिए वेद, पुराण और धर्मशास्त्र भारतीय परंपरा और चिंतन की महत्वपूर्ण धरोहर हैं। अतः उनके संबंध में किसी भी टिप्पणी से पहले प्रमाणिक अध्ययन और संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

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