अपनी बात

योगेन्द्र प्रताप और राजेन्द्र तिवारी भी कल से टोटो पर घूमे व बाबूलाल मरांडी को रिक्शा पर घुमाए, हो सकता है ये लोग भी आगे चलकर बीजेपी का अध्यक्ष और बाबूलाल मरांडी रिक्शा पर बैठने के बाद पीएम बन जाये

पता नहीं आजकल भाजपाइयों को क्या हो गया है? जो करना चाहिए वो तो करते नहीं, लेकिन अपने नेताओं की आरती उतारने की बात हो, तो उसमें वे सबसे आगे रहेंगे। राजनीतिक पंडितों की मानें तो राजनीतिक भाषा में इसे शुद्ध रूप से चमचई कहते हैं। कभी कभार लोगों को दिखाने के लिए किसी नेता ने कभी बस की सवारी क्या कर ली। ये सोशल साइट पर यह कहकर उनकी आरती उतारने लगेंगे, कि देखो वे कितने सरल-सहज है, बस की सवारी करते हैं। जैसे कि बस की सवारी करनेवाले आम लोग मामूली और दोयम दर्जे के लोग होते हैं।

आज तो हद हो गई, वहीं नेता जो बस की सवारी एक दिन किया था, जिसको लेकर भाजपा के लोग उनकी कभी आरती उतार रहे थे। आज वहीं नेता टेम्पू पर बैठे दिख गया। अब लीजिये फिर शुरु हो गई, उनकी आरती कि देखों वे कितने महान हैं, ये टेम्पू की सवारी करते हैं, उस टेम्पू की सवारी जिस पर साधारण लोग चढ़ते हैं। जबकि सच्चाई यह है कि टेम्पू की सवारी या बस की सवारी कर लेने से न तो कोई नेता शालीन हो जाता है, न सरल होता है और न ही सहज हो जाता है।

दरअसल ये नेता समय-समय पर इस प्रकार की हरकतें कर, अपना सोशल साइट पर अपने समर्थकों द्वारा स्वयं की आरती उतरवाते हैं। इससे ज्यादा कुछ नहीं। नहीं तो ये हमेशा ही टेम्पू की सवारी क्यों नहीं करते। किसी विशेष दिन ही टेम्पू की सवारी क्यों? या बस की सवारी क्यों? और इसकी रील बनाने और उसे सोशल साइट पर डालने की क्या जरुरत? इससे कौन सा मेवा मिल जाता है? सवाल तो ये हैं।

हम तो देखेंगे कि इस बार हो रहे नगर निकाय चुनाव में जो कि दलीय आधार पर नहीं हो रहे। फिर भी इसे दलीय आधार बनाने की हर राजनीतिक दल ने कोशिश की है। अब ऐसे में भाजपा अपने लोगों को कितनी सफलता दिला पाती है, ये देखना है। लोग तो बता रहे हैं, कि जो स्थितियां हैं, उसमें भाजपा कही दिख नहीं पा रही। अगर एक दो जगहों पर दिख भी रही है, तो उसमें भाजपा की कहीं कोई भूमिका नहीं। धनबाद जैसे शहरों में तो भाजपा ने अपने मिट्टी पलीद कर दी है। उसका मूल कारण भी यही है कि भाजपा अपने मूल उद्देश्यों से भटक कर आरती उतारने वाली पैटर्न अपना ली है।

जरा देखिये, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू को कभी इन्होंने दिल्ली में कोई एक बार बस की सवारी क्या कर ली, उनके समर्थकों ने इसे मुद्दा बना दिया। अब टेम्पू पर किसी ने चढ़ाकर, थोड़ी दूर चलवाकर, फिर उतरवाकर एक विजयूल बना ली, उसे रील का रूप दे दिया और लीजिये शुरु हो गई उनकी जय-जय। इसी पर कई नेता ने अपने विचार भी दिये हैं। जैसे देखिये …

अशोक बड़ाइक उवाच – शालीनता, सरलता और सहजता। यही पहचान है भाजपा झारखण्ड प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सांसद आदित्य प्रसाद जी का। उनका विनम्र व्यवहार, कार्यकर्ताओं के प्रति आत्मीयता और संगठन के प्रति समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।

योगेन्द्र प्रताप उवाच – सरल, सहज, मृदुभाषी और जमीनी नेता के पर्याय रहे हैं। राज्यसभा सांसद बड़े भाई आदरणीय श्री आदित्य साहू जी। झारखण्ड भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी उनकी वहीं सादगी। कही भी, कभी भी, खास दिखने की कोई ललक नहीं। जनता से जुड़ाव सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि उनके व्यवहार में भी दिखता है। रांची में उन्हें ऑटो से यात्रा करते हुए दिखना यह साबित करता है कि ये पूरी तरह जमीन से जुड़े शख्सियत है। यह पहली बार नहीं है बल्कि, इसके पहले भी दिल्ली में आम लोगों की तरह उन्हें मेट्रो फीडर बस से यात्रा करते हुए देखा गया था।

तो भाई मेट्रो फीडर बस और टेम्पू पर चढ़ने से ही कोई महान हो रहा है या उसे शानदार सफलता मिलती है। तो फिर मेरा सुझाव होगा कि योगेन्द्र प्रताप और राजेन्द्र तिवारी भी कल से टोटो आटो पर घूमे और बाबूलाल मरांडी को रिक्शा पर घुमाये, हो सकता है ये लोग भी बीजेपी का अध्यक्ष बन जाये और बाबूलाल मरांडी रिक्शा पर चलके पीएम बन जायें। क्यों कैसी रही?

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