नगर निकाय चुनाव में बिना गठबंधन झामुमो ने भाजपा को जमकर धोया, मिलकर लड़ते तो भाजपा कहां फेकाती, अगर केन्द्र आधारहीन-मूल्यहीन नेताओं को कंट्रोल नहीं करती, तो झारखण्ड में भाजपा विलुप्त समझिये
लोकसभा चुनाव के बाद, विधानसभा चुनाव और अब स्थानीय नगर निकाय चुनाव ने भाजपा की वो दुर्दशा की है। जिसकी कल्पना किसी भाजपाई या उसके समर्थकों ने नहीं की थी। हालांकि जो यहां के राजनीतिक पंडित हैं, वो ये जानते हैं कि जब तक दीपक प्रकाश, प्रदीप वर्मा और आदित्य साहू जैसे आधारहीन-मूल्यहीन नेता भाजपा में रहेंगे। भाजपा लोकसभा, विधानसभा क्या, स्थानीय नगर निकाय चुनाव भी नहीं जीत सकती। क्योंकि ये वे नेता हैं, जो एक वार्ड का चुनाव भी नहीं जीत सकते।
इस बार के नगर निकाय चुनाव में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने स्थानीय नगर निकाय चुनाव में सिद्ध कर दिया कि झारखण्ड में अब उसकी जड़ें केवल ग्रामीण या खास इलाके में ही नहीं, बल्कि अब संपूर्ण प्रदेश में फैल चुकी है और अब ये शहरी इलाकों में भी अपनी जड़ें जमा चुकी है। गिरिडीह और देवघर जैसे शहरों में उसके मेयर का होना स्थिति स्पष्ट कर चुकी है।
कल तक जो भाजपा शहरों में दिखती थी, आज वो नौ नगर निगम के मेयर के चुनाव में मात्र तीन पर सफलता प्राप्त की है। जबकि एक पर कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी ने सफलता प्राप्त की है। रांची, आदित्यपुर और मेदिनीनगर में ही भाजपा समर्थित मेयर बने हैं, जबकि चास, धनबाद, हजारीबाग में निर्दलीयों ने धूम मचा दी है। याद करिये पूर्व में भाजपा के पास पांच मेयर सीटें थी – जिनमें रांची, धनबाद, हजारीबाग, गिरिडीह और आदित्यपुर शामिल थे। आज स्थिति यह है कि हजारीबाग पर निर्दलीय और गिरिडीह पर झामुमो का कब्जा है।
नगर परिषद की 20 सीटों में मात्र चार सीटें, नगर पंचायत की 19 सीटों में मात्र 6 यानी कुल मिलाकर 48 में से 13 सीटों पर ही भाजपा समर्थित उम्मीदवारों को सफलता मिली है। वो भी तब जबकि इस स्थानीय नगर निकाय चुनाव में झामुमो और कांग्रेस मिलकर नहीं लड़े, बल्कि स्वतंत्र रूप से चुनाव में भाग लिया। अगर ये मिलकर लड़े होते, तो समझ लीजिये भाजपा कहां फेकाती?
कई स्थानों पर तो भाजपा के उम्मीदवार तीसरे नंबर पर रहे। जबकि कई इलाकों में भाजपा से विद्रोह कर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार एक नंबर पर रहकर भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं की औकात दिखा दी। उसका संबसे सुंदर उदाहरण धनबाद है, जहां संजीव सिंह ने सफलता पाई। याद रखिये, संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह स्वयं झरिया विधानसभा से भाजपा की विधायक है। यानी पत्नी भाजपा में और पति निर्दलीय मेयर का चुनाव लड़े, जबकि संजीव सिंह पूर्व में भाजपा की टिकट पर विधायक भी रहे हैं। यहां भाजपा समर्थित प्रत्याशी तीसरे नंबर पर रहा।
भाजपा नेताओं की बेशर्मी देखिये। इसका प्रदेश महामंत्री प्रदीप वर्मा 12 फरवरी को पाकुड़ में भाजपा से विद्रोह कर चुनाव लड़ रही शबरी पाल को अनुशासनहीनता की नोटिस थमाता है और जैसे ही वह 27 फरवरी को चुनाव जीतती है, उसे भाजपाई बताते हुए सोशल मीडिया पर बधाई देता है। यही हरकत जामताड़ा में भाजपा से विद्रोह कर लड़ रही आशा गुप्ता के साथ की गई। चतरा नगर परिषद् में भाजपा समर्थित प्रत्याशी विद्या सागर को मात्र 1300 वोट मिले, जबकि भाजपा से विद्रोह कर लड़े राजेश साह को 3800 वोट मिले।
यहीं नहीं काला यूजीसी बिल के समर्थन में सबसे पहले झंडा उठाकर सोशल मीडिया पर सर्वाधिक गाली बटोरने वाले भाजपा के फायर ब्रांड नेता निशिकांत दूबे अपनी देवघर और गोड्डा सीट तक नहीं बचा सकें, उल्टे उन्होंने दुमका, पाकुड़ समेत जहां भी रोड शो किया। वे सभी न सिर्फ हारे, बल्कि तीसरे नंबर पर चले गये। उनको यह समझना चाहिए कि झारखण्ड में लोगों ने इस बार एकजुट होकर यूजीसी काले कानून के विरोध में गोलबंद होकर वोट कर दिया।
आम तौर पर चुनाव परिणाम आने के बाद या आने के क्रम में समझदार नेता जनता के निर्णयों को शिरोधार्य करता है। लेकिन भाजपा नेता यहां भी सरकार के खिलाफ बोलने से नहीं चूके। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने बयान दे दिया कि हेमन्त सरकार ने भाजपा समर्थित उम्मीदवार की बढ़त को देखते हुए बौखलाकर अधिकारियों को लोकतंत्र की हत्या के निर्देश दिये हैं। अब इस प्रकार के बयान क्या संकेत देते हैं?
कट्टर भाजपाई, वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के राजनीतिक सलाहकार ने तो सोशल साइट पर “नसीहत की कहानी – वचन का बोझ” नाम से बड़ी सुंदर उपदेशात्मक कथा लिख दी है। उसे प्रत्येक भाजपा नेताओं को पढ़ना चाहिए। लेकिन ये ऐसे लोग हैं कि उन्हें हर अच्छी बात, उपदेशात्मक बातें, स्वयं को बेहतर बनाने के लिए आये सुझाव से नफरत होती है। इन्हें लगता है कि कोई इन्हें सुझाव कैसे दे सकता है? ये तो विशुद्ध हैं, सीधे वैकुण्ठ से विशुद्ध ज्ञान प्राप्त कर अवतरित हुए हैं।
ये कुछ भी करेंगे, जीत उन्हें मिलेंगी ही और इसी घमंड में स्वयं तो राज्यसभा का लड्डु खा रहे हैं और भाजपा को पाताल लोक में पहुंचवाकर पिण्डदान करवा रहे हैं। एक बात और सुनील तिवारी ने नसीहत की कहानी और वचन का बोझ नामक कहानी में यह भी लिखा है कि इसे झारखण्ड के नगर निकाय चुनाव परिणामों के पीछे की छिपी कड़वी सच्चाई से न जोड़ा जाये। लेकिन सच्चाई यही है कि उन्होंने नगर निकाय चुनाव के परिणामों को देखकर ही ये नसीहत दे डाली है। वो नसीहत क्या है, जरा आप खुद देखें …
नसीहत की कहानी — “वचन का बोझ”
बहुत समय पहले हस्तिनापुर नाम का एक विशाल राज्य था। उस राज्य में एक राजकुमार जन्मा — देवव्रत। वह तेजस्वी था, वीर था और अपने पिता से बेहद प्रेम करता था। एक दिन पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने ऐसा वचन दिया जिसने इतिहास बदल दिया — उसने सिंहासन का अधिकार छोड़ दिया और आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली। उसी दिन से वह भीष्म कहलाया, क्योंकि उसका वचन भीषण था।
समय बीतता गया। राज्य बदला, राजा बदले, पर भीष्म का वचन नहीं बदला। वह हस्तिनापुर की रक्षा करते रहे, हर राजा के प्रति वफादार रहे — चाहे निर्णय सही हों या गलत। धीरे-धीरे दरबार में स्वार्थ बढ़ा, अहंकार बढ़ा और अन्याय भी। भीष्म सब देखते थे। उनका मन कई बार उन्हें सच के पक्ष में खड़ा होने को कहता, लेकिन उनका वचन उन्हें रोक देता।
एक दिन वह क्षण आया जब अन्याय अपनी सीमा पार कर गया। दरबार में एक स्त्री का अपमान हुआ, धर्म की आवाज दब गई और पूरे सभागार में सन्नाटा था। भीष्म भी वहीं थे — शक्तिशाली, सम्मानित, सबके गुरु — पर उस दिन उनके होंठ नहीं खुले। यही मौन आगे चलकर युद्ध का बीज बन गया।
समय ने करवट ली और महाभारत का युद्ध हुआ। भीष्म ने उसी सिंहासन के लिए युद्ध लड़ा, जिसके फैसलों से वे भीतर से सहमत नहीं थे। उन्होंने अपने ही प्रियजनों को युद्धभूमि में गिरते देखा। हर दिन उनकी आत्मा और भारी होती गई। आखिर वह भी दिन आया जब भीष्म स्वयं तीरों की शैया पर लेट गए।
शरीर घायल था, पर सबसे गहरा घाव मन में था। शर-शय्या पर पड़े-पड़े उन्होंने स्वीकार किया कि वचन निभाया, कर्तव्य निभाया — पर कई बार सही समय पर सच के लिए खड़े नहीं हो पाए और यही उनके जीवन की सबसे बड़ी पीड़ा बन गई। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों को एक अंतिम सीख दी —
वचन महान है, त्याग महान है, लेकिन यदि इनकी वजह से अन्याय बढ़े तो वह महानता अधूरी रह जाती है। गलत के सामने मौन रहना भी गलत का साथ देना है। सच्चा धर्म वही है जिसमें साहस हो — सही समय पर सही पक्ष चुनने का साहस। भीष्म की कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, वह हर युग में एक चेतावनी बनकर खड़ी रहती है — देर से बोला गया सच इतिहास नहीं बदलता, वह सिर्फ मन में पछतावा छोड़ जाता है।
