क्या मजाक है, जिसने पूरे नगर निकाय चुनाव को भाड़ देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वो राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी लोगों से मतदान करने की अपील और शहर के भविष्य की दुहाई दे रही थी
क्या मजाक है, जिसने पूरे नगर निकाय चुनाव को भाड़ देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, वो राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी लोगों से मतदान करने की अपील और शहर के भविष्य की दुहाई दे रही थी। पिछले कई दिनों से राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी का मैसेज राज्य के मतदाताओं को मोबाइल के माध्यम से भेजा रहा था।
मैसेज था – आपके शहर का भविष्य आपके हाथ में है। दिनांक 23.02.2026 को अपने नगरपालिका क्षेत्र में परिवार सहित मताधिकार का प्रयोग अवश्य कीजिये और सही प्रतिनिधि चुनिये। राज्य निर्वाचन आयुक्त, झारखण्ड। यानी जिसने खुद नगर निकाय चुनाव को मजाक बनाकर रख दिया। वो लोगों से अपील कर रही थी कि लोग मतदान में भाग लें।
अरे भाई, जब आपने खुद ही ठान लिया कि मतदान को भाड़ देना है। जैसे मन करे, वैसे मतदान कराना है, तो फिर इस प्रकार की मैसेज भेजने की नौटंकी क्यों? क्या झारखण्ड का मतदाता मूर्ख है। वो नहीं जानता कि आपके दिमाग में क्या चल रहा है? पहले तो आपने कई मतदाताओं के वार्ड बदल दिये और आज क्या कर दिया।
कई-कई मतदाताओं को मतदान केन्द्र ही बदल दिये। परिवार एक और उनके सदस्यों के वोट विभिन्न मतदान केन्द्रों पर, वो भी किसी का इर घाट तो किसी का वीर घाट। ऐसे में मतदान की प्रतिशतता बढ़ेगी? क्या जो लोग चुनाव प्रक्रिया में भाग ले रहे हैं, उन्हें वोट देने का अधिकार नहीं? उनके लिए आपने व्यवस्था क्यों नहीं की?
क्या राज्य निर्वाचन आयुक्त बता सकती है कि उसके बीएलओ राज्य के कितने मतदाताओं से सम्पर्क किये। सच्चाई यह है कि ये बीएलओ कहीं नजर ही नहीं आये। आज जो भी वोट कहीं पड़ा तो उसमें राज्य निर्वाचन आयुक्त की कोई भूमिका नहीं दिखी। ये तो मतदाताओं की जागरुकता थी कि वो मतदान के लिए निकल पड़े और भारी गड़बड़ियों-परेशानियों के बीच भी अपने मतदान का प्रयोग किया।
खुद मैं ही वार्ड 46 का मतदाता हूं और मुझे वार्ड 13 में शिफ्ट कर दिया गया। अब मैं जिसे जानता ही नहीं, उसे कैसे वोट करुं। क्या राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी इसका डिक्टेशन या पाठ हमें/मतदाताओं को पढ़ा सकती है और अब राज्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा पूरे नगर निकाय चुनाव को मजाक बना देने की बानगी देखिये …
झारखण्ड हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अभय मिश्रा की व्यथा देखिये। अभय मिश्रा, अभय मिश्रा की माता जी व पिता जी का मतदान केन्द्र लिटिल हार्ट स्कूल हटिया रेलवे कालोनी में, उनकी बेटी का मतदान केन्द्र मिडिल स्कूल कल्याणपुर में और पत्नी का मतदान केन्द्र मिडिल स्कूल हेतु में। लिटिल हार्ट स्कूल हटिया रेलवे कालोनी से हेतु की दूरी पांच किलोमीटर। लिटिल हार्ट स्कूल हटिया रेलवे कालोनी से कल्याणपुर की दूरी दो किलोमीटर।
ये जनाब सुबह से अपने परिवार के एक-एक सदस्य को वोट दिलवाने के लिए इधर से उधर घूमते रहे। अभय मिश्रा तो साफ कहते है कि पता नहीं राज्य निर्वाचन आयोग को उनसे क्या दुश्मनी थी। जो पूरे परिवार का वोट एक मतदान केन्द्र पर न करवाकर कई मतदान केन्द्र में जाकर शिफ्ट करवा दिया।
एक पत्रकार ज्ञान रंजन फेसबुक पर लिखते हैं “भैया हम भी जिद्दी हैं। लाख कोशिश कर ले चुनाव आयोग वोटिंग तो करके ही रहेंगे। गजबे हाल है पति का मतदान केंद्र कहीं, तो पत्नी और बच्चे का कहीं, का सोचे थे वोट नहीं डालेंगे। बुरबक हो, वोटवा तो डाल आये। तुम भले ही लोकतंत्र को कमजोर करो हम करने देंगे तब ना। घबराइये मत अपने लोकतान्त्रिक अधिकार का प्रयोग कीजिये।” विद्रोही24 ने तो कई इलाकों में देखा कि ज्यादा मतदाता तो इसलिए वोट देने नहीं गये, क्योंकि उनका वार्ड ही बदल दिया गया था। ऐसे में वोट देने का सवाल कहां था? लोगों का कहना था कि जिसे जानते ही नहीं, पहचानते ही नहीं, उसे वोट कैसे दे सकते हैं?
