अपनी बात

झारखण्ड विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन की कार्यवाही 13 मिनट विलम्ब से, पहली बार विधानसभा के मुख्यद्वारों-पोर्टिकों में नहीं लगा मजमा, राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान कई माननीयों का ध्यान मोबाइल पर रहा केन्द्रित

षष्ठम झारखण्ड विधानसभा के पंचम (बजट) सत्र के पहले दिन की कार्यवाही 13 मिनट विलम्ब से शुरू हुई। झारखण्ड विधानसभा के अध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो 11 बजकर 13 मिनट पर आसन पर विराजमान हुए। इधर सत्तापक्ष और विपक्ष के माननीय सदस्यों में सबसे पहले सदन में प्रवेश करनेवालों में सत्तापक्ष के स्टीफन मरांडी दिखे, जबकि विपक्ष में सबसे पहले सदन में प्रवेश करनेवाले लोजपा के जनार्दन पासवान रहे।

कभी मंत्री तो कभी स्पीकर का पद सुशोभित करनेवाले रांची के विधायक सीपी सिंह सदन में तब पहुंचे, जब राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार का अभिभाषण आधा समाप्त हो चुका था। जबकि सबसे ज्यादा विलम्ब से सदन में पहुंचने का रिकार्ड भाजपा की झरिया विधायक रागिनी सिंह के नाम रहा।

इधर राज्यपाल का अभिभाषण चल रहा था और दूसरी ओर कई माननीयों की रुचि राज्यपाल के अभिभाषण में नहीं थी। उनकी आंखें उनकी मोबाइल पर गड़ी थी और उनकी अंगुलियां मोबाइल पर अपना करिश्मा दिखाने में मशगूल थी। ऐसा करनेवालों में मंत्री, सचेतक और सदस्य सभी शामिल थे। जिन्होंने ऐसा करने में ज्यादा समय बिताया।

उनके नाम इस प्रकार है –  भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से अनुप सिंह, श्वेता सिंह, ममता देवी आदि, मंत्रियों में इरफान अंसारी, भाजपा की ओर से प्रदीप प्रसाद, मंजू कुमारी आदि, झामुमो से मथुरा महतो, निरेल तिर्की आदि, आजसू से निर्मल महतो और खुद को सर्वाधिक क्रांतिकारी विधायक कहलवाने में परमानन्द की प्राप्ति करनेवाले जयराम महतो प्रमुख थे। राज्यपाल के अभिभाषण के दौरान भाजपा की एक महिला विधायक मोबाइल पर बात करती हुई भी दिखी।

दूसरी ओर पहली बार झारखण्ड विधानसभा के प्रमुख द्वारों और पोर्टिकों में यू-ट्यूबरों/ चैनलों/ अवांछित तत्वों का मजमा नहीं दिखा। पहली बार लगा कि हम झारखण्ड विधानसभा नहीं, बल्कि किसी अन्य राज्य के विधानसभा के प्रमुख द्वार व पोर्टिकों से गुजर रहे हैं। जहां आम तौर पर अनुशासन के साथ-साथ शांति व्याप्त होती है।

आज झारखण्ड विधानसभा के प्रमुख द्वारों और पोर्टिकों में अद्भुत अनुशासन और शांति देखने को मिला। हालांकि जो लोग विधानसभा के प्रमुख द्वारों और पोर्टिकों में अशांति फैलाते और अनुशासन भंग करते हैं। वे आज भी सक्रिय दिखे। वे चाहते थे कि जैसे वे पहले की तरह मजमा लगाते रहे हैं। इस बार भी मजमा लगाये। विधानसभा की प्रमुख द्वारों पर बनी सीढ़ियों पर बेवजह बैठे, गप्पे लड़ाएं।

लेकिन आज ऐसे लोगों को निराशा हाथ लगी। क्योंकि पहली बार झारखण्ड विधानसभा के अधिकारियों व कर्मचारियों ने स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर झारखण्ड विधानसभा के गौरव को बढ़ाने में प्रमुख भूमिका निभा दी। कई लोग आज भी चाहते थे कि वे वो करें, जो करते आये हैं। लेकिन लगता है कि आज उन्हें दी गई अनुशासन की पाठ समझ में आ गई होगी। आज कई वैसे लोग तरंग-भरंग करते दिखे। लेकिन उनके सीनियर पत्रकारों और झारखण्ड विधानसभा के अधिकारियों ने समझा दिया कि अब वो नहीं होगा, जो पहले होता रहा है। मजमा लगाने नहीं दिया जायेगा।

आपको जहां जगह दिया गया है। वहीं रहना है। वहीं से समाचार इक्ट्ठे करने हैं। अनुशासन भंग करेंगे, अशांति फैलायेंगे तो कार्रवाई होगी। आज विधानसभा के प्रमुख द्वारों और पोर्टिकों में मजमा नहीं लगने से, वो वर्ग ज्यादा खुश था, जो चाहता है कि हर जगह अनुशासन दिखे, शांति दिखे। कई लोगों ने इसके लिए झारखण्ड विधानसभाध्यक्ष रबीन्द्र नाथ महतो की भूमिका को भी सराहा। लोगों का कहना था कि अगर उनका आदेश नहीं होता तो फिर ये अनुशासन, ये शांति, ये सुंदर माहौल देखने को नहीं मिलता।

जब अधिकारी दीर्घा में बैठे अधिकारियों का समूह राष्ट्र गान के सम्मान में नहीं खड़ा हुआ

अंत में आम तौर पर जब सदन में राज्यपाल बजट सत्र को संबोधित करने आते हैं, तो दो बार राष्ट्र गान धुन बजाये जाते हैं। जिस दौरान सभी सावधान की मुद्रा में खड़े हो जाते हैं। आज जैसे ही राज्यपाल सदन में आये और जैसे ही राष्ट्र गान का धुन बजने लगा। तब राष्ट्रगान के सम्मान में सदन के साथ-साथ अधिकारी दीर्घा छोड़कर सभी दीर्घाओं में उपस्थित व्यक्ति/अधिकारी/पत्रकार तक खड़े हो गये। लेकिन अधिकारी दीर्घा में जैसे ही कुछ अधिकारी राष्ट्र गान के सम्मान में खड़े होने लगे।

तो विद्रोही24 ने देखा कि वहां उपस्थित एक पुलिसकर्मी ने सभी को बिठा दिया। शायद, उसने अधिकारियों को कहा कि आप सभी को खड़ा होने की कोई जरुरत नहीं, बैठ जाये। सारे अधिकारी बैठ गये। जब पहली बार नहीं खड़े हुए तो दूसरी बार जब राष्ट्र गान का धुन बजा, तो ये अधिकारी दूसरी बार खड़ा नहीं हुए। जिसे देखकर पत्रकार दीर्घा में बैठे कई संवाददाताओं के बीच यह चर्चा का विषय बन गया कि अधिकारी दीर्घा में बैठे अधिकारी राष्ट्र गान के सम्मान में नहीं खड़े हुए। जबकि बात कुछ दूसरी ही थी।

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